दिल्ली दंगों में 22 वर्षीय युवक की मौत का मामला: दिल्ली हाईकोर्ट ने पांच दोषियों की सात साल की सजा बरकरार रखी

दिल्ली हाईकोर्ट ने फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए सांप्रदायिक दंगों के दौरान 22 वर्षीय युवक मोहसिन की मौत के मामले में पांच दोषियों की सात साल की जेल की सजा बरकरार रखी है। कोर्ट ने कहा कि साक्ष्यों से स्पष्ट है कि पांचों आरोपी हथियारबंद भीड़ में आगे रहकर अन्य लोगों को पीड़ित पर हमला करने के लिए उकसा रहे थे।

जस्टिस मधु जैन ने 27 अक्टूबर को दिए फैसले में अमन कश्यप, देविंदर कुमार, प्रदीप राय, आशीष और अरुण कुमार की अपीलें खारिज कर दीं। इन सभी ने निचली अदालत द्वारा सुनाई गई सजा और दोषसिद्धि को चुनौती दी थी।

हाईकोर्ट ने पाया कि आरोपी केवल हिंसक भीड़ में मौजूद नहीं थे, बल्कि उन्होंने मोहसिन पर हमले में सक्रिय भूमिका निभाई थी।

घातक चोट किसने पहुंचाई, यह स्पष्ट न होने से आरोपी बरी नहीं हो सकते

अपीलकर्ताओं ने दलील दी थी कि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर सका कि भीड़ में शामिल किस व्यक्ति ने मोहसिन के सिर पर वह चोट पहुंचाई, जिससे उसकी मौत हुई।

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हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि केवल इस आधार पर दोषियों को बरी नहीं किया जा सकता कि घातक चोट पहुंचाने वाले व्यक्ति की अलग से पहचान नहीं हो सकी।

कोर्ट ने विशेष रूप से अभियोजन पक्ष के गवाह पीडब्ल्यू-10, जो एक बीट कांस्टेबल था, की गवाही पर भरोसा किया। उसने पांचों आरोपियों की पहचान हथियारबंद भीड़ में सबसे आगे मौजूद लोगों के रूप में की थी, जो अन्य लोगों को मोहसिन पर हमला करने के लिए उकसा रहे थे।

साक्ष्यों के अनुसार, मोहसिन का पीछा किया गया और उसे घेरकर पीटा गया। पुलिस बैरिकेड के पास गिर जाने के बाद भी उस पर हमला जारी रहा।

हाईकोर्ट ने कहा कि आरोपियों का आचरण, भीड़ के सदस्यों के पास मौजूद हथियार और पीड़ित पर लगातार किया गया हमला इस निष्कर्ष का आधार हैं कि गैरकानूनी जमावड़े का साझा उद्देश्य मोहसिन पर हमला करना और उसे शारीरिक चोट पहुंचाना था।

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स्वतंत्र गवाहों के समर्थन नहीं करने की दलील खारिज

दोषियों ने अपनी अपील में कहा था कि स्वतंत्र गवाहों ने अभियोजन पक्ष के आरोपों का समर्थन नहीं किया। उनका तर्क था कि उनके खिलाफ मामला संदेह से परे साबित नहीं हुआ है।

हालांकि, हाईकोर्ट ने पाया कि उपलब्ध साक्ष्य आरोपियों की हिंसक भीड़ में सक्रिय भागीदारी साबित करने के लिए पर्याप्त थे।

कोर्ट ने प्रत्यक्षदर्शी की गवाही को महत्वपूर्ण माना, जिससे यह स्थापित हुआ कि पांचों आरोपी भीड़ का नेतृत्व कर रहे थे और अन्य लोगों को पीड़ित पर हमला करने के लिए उकसा रहे थे।

25 फरवरी 2020 को हुई थी मोहसिन की मौत

यह घटना 25 फरवरी 2020 को उत्तर-पूर्वी दिल्ली के चांद बाग इलाके में सांप्रदायिक हिंसा के दौरान हुई थी।

अभियोजन पक्ष के अनुसार, पीर बाबा मजार के पास घातक हथियारों से लैस भीड़ ने 22 वर्षीय मोहसिन पर हमला किया था। हमले में लगी चोटों के कारण उसकी मौत हो गई थी।

निचली अदालत ने 20 नवंबर 2024 को पांचों आरोपियों को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 304 भाग-I (हत्या की श्रेणी में न आने वाला गैर इरादतन मानव वध) और धारा 148 (घातक हथियारों के साथ दंगा करना) के तहत दोषी ठहराया था।

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निचली अदालत ने पाया था कि अभियोजन पक्ष के गवाहों की गवाही से यह साबित होता है कि पांचों आरोपी उस हिंसक भीड़ का हिस्सा थे, जिसने मोहसिन पर हमला किया था।

इसके बाद 13 जनवरी 2025 को अदालत ने सभी पांचों दोषियों को सात साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी और 30,000 रुपये का जुर्माना लगाया था।

दिल्ली हाईकोर्ट ने अब उनकी अपीलें खारिज करते हुए निचली अदालत के दोषसिद्धि और सजा संबंधी फैसले को बरकरार रखा है।

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