मुकदमे में कभी न मांगी गई राहत के बदले वादी को मुआवजा स्वीकार करने के लिए अदालतें मजबूर नहीं कर सकतीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि हाईकोर्ट किसी निचली अदालत द्वारा अनिवार्य निषेधाज्ञा (Mandatory Injunction) के लिए पारित की गई डिक्री को रद्द करके वादी को उसकी सहमति या मांग के बिना जबरन मौद्रिक मुआवजा स्वीकार करने के लिए मजबूर नहीं कर सकता। जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की पीठ ने माना कि पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट द्वारा अवैध निर्माण को हटाने के आदेश वाली निचली अदालतों की डिक्री को बदलकर उसकी जगह मौद्रिक मुआवजा तय करने का तरीका पूरी तरह से अनुचित था। इस टिप्पणी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार कर ली और मामले को नए सिरे से मेरिट के आधार पर निर्णय लेने के लिए वापस हाईकोर्ट भेज दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह पूरा विवाद मूल वादी ओम प्रकाश द्वारा दायर किए गए दो अलग-अलग दीवानी मुकदमों से शुरू हुआ था। ओम प्रकाश की मृत्यु के बाद उनके कानूनी वारिस (रजत कुमार और अन्य) सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अपीलकर्ता हैं।

पहला मुकदमा (सिविल सूट नंबर 426 ऑफ 1996) एस डी आदर्श जैन कन्या महाविद्यालय सधौरा और अन्य (प्रतिवादियों) के खिलाफ दायर किया गया था। इस मुकदमे में वादी ने अपने घर के आगे बने एक साझा खुले स्थान पर प्रतिवादियों द्वारा अवैध रूप से दीवार बनाकर किए गए अतिक्रमण को हटाने के लिए अनिवार्य निषेधाज्ञा और वहां आगे कोई निर्माण न करने के लिए स्थायी निषेधाज्ञा की मांग की थी। वादी का कहना था कि इस निर्माण से उनके घर में आने वाली हवा और रोशनी बाधित हो रही थी और साझा रास्ते से पानी का बहाव भी रुक रहा था। 6 फरवरी 2006 को ट्रायल कोर्ट ने वादी के पक्ष में डिक्री पारित करते हुए प्रतिवादियों को अतिक्रमण हटाने का निर्देश दिया। पहली अपीलीय अदालत ने भी 5 सितंबर 2007 को इस निर्णय को बरकरार रखा।

इसके बाद प्रतिवादी इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट पहुंचे। 25 नवंबर 2011 को हाईकोर्ट ने अपील का निपटारा करते हुए प्रतिवादियों को निर्देश दिया कि वे निर्माण लागत की आधी राशि यानी 10,000 रुपये 12% वार्षिक ब्याज के साथ चुकाएं और इसके बाद उस दीवार को दोनों पक्षों के बीच ‘साझा’ मान लिया जाए।

दूसरा मुकदमा (सिविल सूट नंबर 148 ऑफ 2000) भी इसी वादी ने इन्हीं प्रतिवादियों के खिलाफ दायर किया था। इसमें वादी के घर की दीवार पर स्कूल भवन का लेंटर डालने के खिलाफ आपत्ति जताई गई थी और इसे हटाने के लिए अनिवार्य निषेधाज्ञा की मांग की गई थी। ट्रायल कोर्ट ने 8 नवंबर 2004 को इस मुकदमे को भी वादी के पक्ष में तय किया और लेंटर हटाने का निर्देश दिया। पहली अपीलीय अदालत ने 5 सितंबर 2007 को इसे बरकरार रखा। इसके बाद प्रतिवादियों ने फिर हाईकोर्ट में अपील की, जहां हाईकोर्ट ने 25 नवंबर 2011 को वैसा ही आदेश देते हुए प्रतिवादियों को 7,000 रुपये 12% ब्याज के साथ भुगतान करने का निर्देश दिया ताकि दीवार को ‘साझा’ माना जा सके।

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वादी के कानूनी वारिसों ने हाईकोर्ट के इन आदेशों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। 13 सितंबर 2013 को सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के इन फैसलों को रद्द कर दिया। सुप्रीम कोर्ट का कहना था कि बिना मेरिट की जांच किए और कानून का कोई ठोस प्रश्न तय किए बिना डिक्री में इस तरह का बदलाव करना गलत है। इसके बाद मामला वापस हाईकोर्ट भेज दिया गया।

रिमांड (वापस भेजे जाने) के बाद हाईकोर्ट ने फिर से वही दृष्टिकोण अपनाया। हाईकोर्ट का मानना था कि निर्माण काफी समय पहले हुआ था, रिकॉर्ड पर कोई मूल्यांकन रिपोर्ट नहीं थी और वादी का दावा पूरी तरह साबित नहीं हुआ था। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि दूसरे पक्ष को पैसे के रूप में मुआवजा दिया जा सकता है, इसलिए निचली अदालतों के फैसलों को रद्द करते हुए एग्जीक्यूटिंग कोर्ट (निष्पादन न्यायालय) को निर्माण की कीमत का आकलन करने और प्रतिवादियों को वह राशि वादी के वारिसों के लिए जमा करने का निर्देश दे दिया। हाईकोर्ट के इस दूसरे फैसले से असंतुष्ट होकर वादी के वारिसों ने एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ताओं की ओर से वकील सुश्री संगीता कुमार ने पैरवी की। उन्होंने दलील दी कि हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और पहली अपीलीय अदालत के सुसंगत फैसलों को पूरी तरह से अप्रासंगिक आधारों पर उलटकर एक गंभीर कानूनी भूल की है।

दूसरी ओर, सुप्रीम कोर्ट द्वारा नोटिस जारी किए जाने के बावजूद, 23 अप्रैल 2019 के बाद से प्रतिवादियों की तरफ से अदालत में कोई भी उपस्थित नहीं हुआ।

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सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

सुप्रीम कोर्ट ने अपने विश्लेषण में पाया कि हाईकोर्ट ने निचली अदालतों के सुविचारित फैसलों को पलटने में बड़ी गलती की है।

अदालत ने रेखांकित किया कि मूल वादी ने केवल अनिवार्य और स्थायी निषेधाज्ञा की मांग करते हुए मुकदमा दायर किया था। ट्रायल कोर्ट ने स्पष्ट रूप से पाया था कि प्रतिवादी उस जमीन पर अपना कोई अधिकार, स्वामित्व या हित साबित नहीं कर पाए थे और उन्होंने अवैध रूप से वादी की दीवार पर लेंटर डाला था। सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि वादी ने कभी भी नुकसान या मौद्रिक मुआवजे की मांग नहीं की थी और न ही उनके कानूनी वारिस इस तरह के समझौते के लिए सहमत थे।

राहत के इस जबरन बदलाव पर सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की: “मूल वादी द्वारा ऐसी किसी राहत की मांग न किए जाने की स्थिति में, उसके पक्ष में पारित डिक्री को हाईकोर्ट द्वारा उसके कानूनी वारिसों को एक मूल्यांकनकर्ता द्वारा आकलित मुआवजे को स्वीकार करने के लिए मजबूर करके रद्द नहीं किया जा सकता था।”

पीठ ने आगे कहा: “इसलिए, हाईकोर्ट बिना किसी प्रार्थना या मांग के एक पक्ष को दूसरे पक्ष की कीमत पर मुआवजा देने का ऐसा प्रयास नहीं कर सकता था।”

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के निर्देशों में मौजूद प्रक्रियात्मक विसंगति को भी उजागर किया। ट्रायल कोर्ट की डिक्रियों को पूरी तरह रद्द करने के बाद एग्जीक्यूटिंग कोर्ट के पास निष्पादित करने के लिए कुछ बचा ही नहीं था। इस बिंदु पर सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की: “एक बार जब वादी के पक्ष में ट्रायल कोर्ट द्वारा पारित डिक्री को रद्द कर दिया गया, तो निष्पादन न्यायालय के लिए निष्पादन की कार्यवाही को आगे बढ़ाने का कोई अवसर नहीं रह जाता, क्योंकि निष्पादन के लिए कोई डिक्री अस्तित्व में ही नहीं बचेगी।”

अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि: “वास्तव में, हाईकोर्ट द्वारा अपनाया गया यह तरीका सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के आदेश XXI के तहत समर्थित नहीं है।”

इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट को इस बात के लिए भी आड़े हाथों लिया कि उसने ठीक वही गलती दोहराई जिसे सुप्रीम कोर्ट ने साल 2013 के अपने आदेश में खारिज किया था। पीठ ने यह भी दर्ज किया कि हाईकोर्ट का यह फैसला इस गलत तथ्य पर आधारित था कि ट्रायल कोर्ट ने दीवार को ‘साझा दीवार’ माना था, जबकि वास्तव में ट्रायल कोर्ट ने ऐसा कोई निष्कर्ष नहीं दिया था।

अंत में, अदालत ने कहा कि यद्यपि हाईकोर्ट ने उन कानूनी प्रश्नों का उल्लेख किया था जिन्हें प्रतिवादियों ने कानून के महत्वपूर्ण प्रश्न के रूप में पेश किया था, लेकिन हाईकोर्ट के आदेश से यह कहीं भी स्पष्ट नहीं होता कि उन प्रश्नों को वास्तव में कानून का ठोस प्रश्न माना गया था या नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकालते हुए कहा: “इस प्रकार, यह स्पष्ट है कि विचार के लिए कानून का कोई ठोस प्रश्न उपलब्ध न होने और एक नई प्रार्थना खुद से ही तैयार करके, मूल वादी के पक्ष में पारित डिक्रियों को रद्द कर दिया गया। वादी के कानूनी वारिसों को वह मौद्रिक राहत स्वीकार करने के लिए मजबूर किया गया, जिसकी कभी मांग ही नहीं की गई थी। इस तरह के कदम के परिणामस्वरूप न्याय का हनन हुआ है।”

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के 2 मई 2016 के इस संयुक्त फैसले को पूरी तरह से असमर्थनीय पाते हुए खारिज कर दिया। चूंकि इन अपीलों पर हाईकोर्ट में मेरिट के आधार पर विचार नहीं किया गया था, इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने दोनों अपीलों (आरएसए संख्या 363 और 364 ऑफ 2008) को सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 100 के प्रावधानों के तहत नए सिरे से विचार के लिए पुनः हाईकोर्ट भेज दिया।

यह ध्यान में रखते हुए कि ये दूसरी अपीलें वर्ष 2008 से लंबित हैं, सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट से अनुरोध किया है कि वह इन मामलों पर जल्द से जल्द विचार कर फैसला करे। सुप्रीम कोर्ट ने बिना किसी अदालती खर्च के इन सिविल अपीलों को स्वीकार कर लिया।

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मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: रजत कुमार और अन्य बनाम एस डी आदर्शजैन कन्या महाविद्यालय सधौरा और अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 19552-19553 ऑफ 2017
पीठ: जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर
निर्णय की तिथि: 19 जून, 2026

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