केरल हाईकोर्ट ने एक महिला को दहेज के लिए प्रताड़ित करने और नवजात बेटी की मौत के बाद उसे मानसिक व शारीरिक रूप से प्रताड़ित करने के आरोपी पति और उसके चार परिजनों की याचिका खारिज कर दी है। याचिकाकर्ताओं ने अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर और ट्रायल कोर्ट में लंबित फाइनल रिपोर्ट को रद्द करने की मांग की थी।
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस जोबिन सेबेस्टियन ने 3 अगस्त के अपने आदेश में कहा कि प्राथमिक शिकायत में लगाए गए आरोप काफी गंभीर प्रकृति के हैं। ये आरोप भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 498ए के तहत क्रूरता का अपराध तय करने के लिए पर्याप्त हैं।
बेटे को जन्म न देने और नक्षत्र को लेकर प्रताड़ना
अदालत में पेश रिकॉर्ड के अनुसार, पीड़िता का विवाह जनवरी 2019 में हुआ था और वह अपने ससुराल में रह रही थी। महिला का आरोप है कि कम दहेज लाने की बात कहकर पति और उसके रिश्तेदार लगातार उसे परेशान करते थे।
शिकायत में बताया गया कि नवजात बेटी के निधन के बाद प्रताड़ना और बढ़ गई। ससुराल वालों ने बेटा न पैदा करने पर महिला को ताने दिए और कहा कि ‘अथम नक्षत्र’ में जन्मी बेटी उसके पति के लिए अभागिन थी। शिकायत में फरवरी 2020 की एक घटना का भी उल्लेख है, जब एक आरोपी ने पीड़िता के साथ मारपीट की और बीच-बचाव करने आए उसके माता-पिता पर भी हमला कर दिया।
मामला रद्द करने की न्यायिक सीमाएं
हाईकोर्ट ने आपराधिक कार्यवाहियों को रद्द करने के कानूनी मानकों को स्पष्ट करते हुए कहा कि इस स्तर पर अदालत मिनी-ट्रायल नहीं चला सकती और न ही आरोपों की सत्यता का मूल्यांकन कर सकती है। जस्टिस सेबेस्टियन ने स्पष्ट किया कि किसी मामले को केवल तभी रद्द किया जा सकता है जब शिकायत के सभी आरोपों को स्वीकार करने के बाद भी आरोपी के खिलाफ कोई मामला न बनता हो।
बचाव और अभियोजन पक्ष की दलीलें
याचिकाकर्ताओं के वकील अज़ीम सालेह ने तर्क दिया कि प्रथम सूचना बयान में केवल अस्पष्ट और सामान्य दावे किए गए हैं। बचाव पक्ष का कहना था कि यदि इन कथनों को सच भी मान लिया जाए, तब भी यह धारा 498ए के तहत क्रूरता के दायरे में नहीं आता।
दूसरी ओर, वरिष्ठ लोक अभियोजक मेघा के. ज़ेवियर ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि जांच के दौरान दर्ज गवाहों के बयानों और एफआईआर में प्रताड़ना की स्पष्ट घटनाओं का ब्योरा है। अभियोजन पक्ष ने तर्क दिया कि धारा 498ए के तहत अपराध के आवश्यक तत्व मौजूद हैं, इसलिए मामले को रद्द नहीं किया जाना चाहिए।
अदालत ने यह निष्कर्ष निकालते हुए याचिका खारिज कर दी कि इन आरोपों का मूल्यांकन मुकदमे के दौरान ही होना चाहिए। इसके साथ ही पांचों आरोपियों के खिलाफ कानूनी प्रक्रिया जारी रहने का रास्ता साफ हो गया।

