ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टुअर्ट स्टेन्स और उनके दो नाबालिग बेटों की हत्या के मामले में उम्रकैद काट रहे रवींद्र पाल उर्फ दारा सिंह की समय पूर्व रिहाई की अर्जी ओडिशा सरकार ने खारिज कर दी है। राज्य सरकार ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट को इस फैसले की औपचारिक जानकारी दी। इस पर शीर्ष अदालत ने दारा सिंह के वकील को सरकारी आदेश को चुनौती देने के लिए अपनी याचिका में संशोधन करने हेतु दो सप्ताह की मोहलत दी है।
जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए दारा सिंह के वकील से कहा कि वे इस फैसले को चुनौती देने के लिए जो भी आधार लेना चाहें, ले सकते हैं। पीठ ने निर्देश दिया कि वे अपनी याचिका में संशोधन करें और उसके बाद ही बहस करें। अदालत ने यह भी दर्ज किया कि याचिका खारिज किए जाने के आदेश की प्रति दारा सिंह के वकील को उपलब्ध करा दी गई है। पीठ ने संशोधन अर्जी दाखिल करने के लिए दो हफ्ते का समय देते हुए मामले की अगली सुनवाई तीन सप्ताह बाद तय की है।
इससे पूर्व की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने दारा सिंह की याचिका पर फैसला न लेने को लेकर ओडिशा सरकार को कड़ी फटकार लगाई थी।
24 साल से अधिक जेल काटने और पछतावे का दिया था हवाला
वर्तमान में 63 वर्षीय दारा सिंह पिछले 25 से अधिक वर्षों से जेल में बंद है। उसने वर्ष 2024 में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाकर समय पूर्व रिहाई की मांग की थी। याचिका में उसने दलील दी थी कि वह 24 वर्ष से अधिक की सजा भुगत चुका है। साथ ही उसने कहा था कि उस घटना के लिए उसे गहरा पछतावा है, जो उसने जवानी के गुस्से में आकर की थी।
1999 का तिहरा हत्याकांड और अदालती प्रक्रिया
यह सनसनीखेज मामला 22-23 जनवरी 1999 की दरम्यानी रात का है। ओडिशा के क्योंझर जिले के मनोहरपुर गांव में दारा सिंह की अगुवाई में एक भीड़ ने ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टेन्स और उनके दो बेटों—11 वर्षीय फिलिप और आठ वर्षीय टिमोथी—पर हमला कर दिया था। तीनों अपनी स्टेशन वैगन गाड़ी में सो रहे थे, तभी भीड़ ने वाहन में आग लगा दी, जिससे तीनों की जलकर मौत हो गई।
इस तिहरे हत्याकांड के मुख्य आरोपी दारा सिंह को 2003 में सीबीआई अदालत ने दोषी ठहराते हुए मौत की सजा सुनाई थी। इसके बाद 2005 में उड़ीसा हाईकोर्ट ने फांसी की सजा को उम्रकैद में बदल दिया। हाईकोर्ट के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने 2011 में बरकरार रखा था।
कुष्ठ रोगियों की सेवा और पत्नी का क्षमादान
ग्राहम स्टेन्स और उनकी पत्नी ग्लैडिस स्टेन्स मयूरभंज इवेंजेलिकल मिशनरी के साथ मिलकर कुष्ठ रोगियों की सेवा और देखभाल का कार्य करते थे। समाज सेवा में उल्लेखनीय योगदान के लिए ग्लैडिस स्टेन्स को वर्ष 2005 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया था। अपने पति और दोनों मासूम बेटों की नृशंस हत्या के बाद भी ग्लैडिस ने हत्यारों को माफ करने की बात कही थी और स्पष्ट किया था कि उनके दिल में किसी के प्रति कोई कड़वाहट या बैर नहीं है।

