सुप्रीम कोर्ट ने 14 वर्ष तक की उम्र के बच्चों को औपचारिक अथवा धार्मिक तालीम देने वाले सभी संस्थानों की निगरानी और नियमन से जुड़े मामले में केंद्रीय स्कूल शिक्षा सचिव टी.के. अनिल कुमार को अवमानना का नोटिस जारी किया है। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने शिक्षा सचिव को चार सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।
यह आदेश अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा अधिवक्ता अश्वनी दुबे के माध्यम से दायर अवमानना याचिका पर आया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने 11 मई को उन्हें अपनी मांगों को लेकर केंद्र सरकार के समक्ष अभ्यावेदन देने का निर्देश दिया था, लेकिन शिक्षा सचिव ने उस पर कोई संज्ञान या कार्रवाई नहीं की।
संस्थानों के पंजीकरण और निगरानी की मांग
उपाध्याय ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत जनहित याचिका दायर कर मांग की थी कि 14 वर्ष तक के बच्चों को धर्मनिरपेक्ष शिक्षा या धार्मिक पाठ पढ़ाने वाले सभी संस्थानों के पंजीकरण, मान्यता, निरीक्षण और निगरानी के लिए समुचित कदम उठाए जाएं। याचिका में दलील दी गई है कि संविधान के अनुच्छेद 21A के साथ अनुच्छेद 39, 45 और 51-A की भावना के तहत इन संस्थानों की जवाबदेही तय करना आवश्यक है।
याचिका में अल्पसंख्यकों के अधिकारों से जुड़े अनुच्छेद 30 का भी उल्लेख किया गया है। याचिकाकर्ता के अनुसार, अनुच्छेद 30 अल्पसंख्यकों को अनुच्छेद 19 के तहत सभी नागरिकों को प्राप्त बुनियादी अधिकारों से अलग कोई विशेष या अतिरिक्त अधिकार, लाभ या विशेषाधिकार नहीं देता। याचिका में यह घोषित करने की मांग की गई है कि अनुच्छेद 30 वस्तुतः अनुच्छेद 19 का ही एक विशिष्ट दोहराव मात्र है।
राष्ट्रीय सुरक्षा और सीमावर्ती इलाकों में गैर-मान्यता प्राप्त संस्थान
याचिका में बच्चों के प्रति सरकार की विशेष जिम्मेदारी पर बल देते हुए कहा गया है कि बच्चे देश के विकास की रीढ़ हैं और अपनी कोमल उम्र के कारण वे आसानी से बहकावे में आ सकते हैं। याचिकाकर्ता ने चिंता जताई कि बिना किसी निगरानी के चल रहे संस्थानों में बच्चों को बरगलाया या उनके विचारों को प्रभावित किया जा सकता है, जो सीधे तौर पर राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा गंभीर विषय है।
इसके अलावा, याचिका में उपाध्याय द्वारा उत्तर प्रदेश की सीमा से लगे विभिन्न जिलों के व्यक्तिगत दौरों का हवाला दिया गया है। याचिका के अनुसार, सीमावर्ती इलाकों में भारी संख्या में बिना पंजीकरण और बिना मान्यता के संस्थान चलते पाए गए। याचिकाकर्ता ने कहा कि देश के सीमाई क्षेत्रों में बिना किसी प्रशासनिक निगरानी या नियामक व्यवस्था के ऐसे संस्थान लगातार बढ़ते जा रहे हैं।

