हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के जस्टिस राकेश कैंथला ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा कि यदि किसी चेक के जारी होने और बैंक में प्रस्तुत किए जाने के बीच चेक जारीकर्ता द्वारा आंशिक भुगतान कर दिया जाता है, और फिर भी चेक पूरी राशि के लिए बैंक में लगाया जाता है, तो परक्राम्य लिखत अधिनियम (एनआई एक्ट) की धारा 138 के तहत अपराध आकर्षित नहीं होता। ट्रायल कोर्ट और अपीलीय अदालत द्वारा दी गई दोषसिद्धि और सजा के आदेश को निरस्त करते हुए हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता-आरोपी को बरी कर दिया। कोर्ट ने रेखांकित किया कि चेक को बैंक में प्रस्तुत किए जाने से पहले ही कानूनी रूप से लागू होने वाली देनदारी कम हो चुकी थी।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला मनाली (जिला कुल्लू) के ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास की अदालत में शिकायतकर्ता-मकान मालिक द्वारा एनआई एक्ट की धारा 138 के तहत दायर एक शिकायत से शुरू हुआ था। शिकायतकर्ता के अनुसार, आरोपी उसका किरायेदार था और उसने कमरे के 1,34,600 रुपये के किराये, बिजली बिल तथा मरम्मत व रखरखाव के खर्च को मिलाकर 1,40,000 रुपये का एक चेक 29 अक्टूबर 2018 को जारी किया था।
शिकायतकर्ता ने जब 23 जनवरी 2019 को यह चेक अपने बैंक में प्रस्तुत किया, तो बैंक ने ‘अपर्याप्त निधि’ (फंड्स इंसफिशिएंट) के मेमो के साथ इसे अनादृत (डिशऑनर) कर दिया। इसके बाद शिकायतकर्ता ने आरोपी को कानूनी नोटिस भेजकर 15 दिनों के भीतर भुगतान करने की मांग की। नोटिस तामील होने के बावजूद भुगतान न मिलने पर ट्रायल कोर्ट में यह आपराधिक शिकायत दर्ज कराई गई।
मनाली के ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास ने 30 मई 2023 को अपने फैसले में कहा कि चेक जारी करने पर कोई विवाद नहीं है, जिससे आरोपी के खिलाफ कानूनी उपधारणाएं लागू होती हैं। ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को धारा 138 के तहत दोषी ठहराते हुए 6 महीने के साधारण कारावास और 1,84,000 रुपये के मुआवजे की सजा सुनाई। मुआवजा न देने की स्थिति में एक महीने के अतिरिक्त साधारण कारावास का आदेश दिया गया था।
सत्र न्यायाधीश, कुल्लू ने 12 दिसंबर 2023 को आरोपी की अपील खारिज करते हुए दोषसिद्धि और सजा को बरकरार रखा। इसके बाद आरोपी ने हाईकोर्ट में क्रिमिनल रिवीजन पिटीशन दायर की।
पक्षों की दलीलें
हाईकोर्ट के समक्ष याचिकाकर्ता-आरोपी के वकील ने तर्क दिया कि दोनों निचली अदालतें इस तथ्य को समझने में विफल रहीं कि चेक केवल सुरक्षा (सिक्योरिटी) के तौर पर दिया गया था और देनदारी पहले ही चुकता कर दी गई थी। यह दलील दी गई कि शिकायतकर्ता ने अपनी जिरह (क्रॉस-एग्जामिनेशन) में स्वीकार किया था कि उसे 20 नवंबर 2018 को 1,20,000 रुपये, 29 नवंबर 2018 को 50,000 रुपये और 27 जून 2017 को याचिकाकर्ता की पत्नी के खाते से ऑनलाइन 1,40,000 रुपये प्राप्त हुए थे। वकील का कहना था कि जब शिकायतकर्ता को पर्याप्त भुगतान मिल चुका था, तो इस चेक को भुनाने के लिए बैंक में नहीं लगाया जा सकता था और धारा 138 के जरूरी तत्व पूरे नहीं होते।
शिकायतकर्ता के वकील ने इस रिवीजन का विरोध करते हुए कहा कि आरोपी ने एक हलफनामा देकर किराया देनदारी स्वीकार की थी और सीआरपीसी की धारा 313 के बयानों में भी चेक जारी करने की बात मानी थी। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट को अपनी पुनरीक्षण (रिवीजनल) शक्तियों के तहत साक्ष्यों का दोबारा मूल्यांकन नहीं करना चाहिए और याचिका खारिज की जानी चाहिए।
राज्य की ओर से पेश अतिरिक्त महाधिवक्ता ने कहा कि यह विवाद दो निजी पक्षों के बीच का है और राज्य को इस पर कोई अलग दलील नहीं देनी है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
रिवीजनल अधिकार क्षेत्र के दायरे पर चर्चा करते हुए जस्टिस राकेश कैंथला ने सुप्रीम कोर्ट के कुंतेगौड़ा बनाम थुरुबैया (2026) मामले का हवाला दिया। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि रिवीजनल कोर्ट अपीलीय अदालत की तरह काम नहीं करती और धारा 397 सीआरपीसी (अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 438) के तहत उसकी भूमिका केवल आदेश की शुद्धता, वैधता और औचित्य की जांच तक सीमित है। हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र राज्य बनाम जगमोहन सिंह कुलदीप सिंह आनंद (2004), केरल राज्य बनाम पुट्टुमना इल्लथ जथावेदन नंबूदरी (1999), सदर्न सेल्स एंड सर्विसेज बनाम सॉयरमिल्च डिजाइन एंड हैंडल्स जीएमबीएच (2008), और संजाबिज तारी बनाम किशोर एस. बोरकर (2025) के फैसलों का भी उल्लेख किया और कहा कि जब तक कोई स्पष्ट विकृति (परवर्सिटी), गंभीर अवैधता या मनमानापन न दिखे, तब तक अदालतों के समवर्ती निष्कर्षों में दखल नहीं दिया जा सकता।
एनआई एक्ट के तहत कानूनी उपधारणाओं पर कोर्ट ने एपीएस फॉरेक्स सर्विसेज (पी) लिमिटेड बनाम शक्ति इंटरनेशनल फैशन लिंकर्स (2020), एन. विजय कुमार बनाम विश्वनाथ राव एन. (2025), और बीर सिंह बनाम मुकेश कुमार (2019) के निर्णयों का उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि जब चेक जारी करने और उस पर हस्ताक्षर करने की बात स्वीकार कर ली जाती है, तो धारा 118(ए) और धारा 139 के तहत शिकायतकर्ता के पक्ष में कानूनी उपधारणा बनती है और यह साबित करने का भार आरोपी पर आ जाता है कि उसने एक संभावित बचाव पेश किया है।
हालांकि, रिकॉर्ड पर मौजूद गवाही की समीक्षा करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि शिकायतकर्ता ने खुद जिरह में स्वीकार किया था कि उसे आरोपी और उसकी पत्नी से कई बार रकम मिली थी। इसमें 29 नवंबर 2018 को आरोपी द्वारा शिकायतकर्ता के खाते में सीधे ट्रांसफर किए गए 50,000 रुपये भी शामिल थे। यह भुगतान चेक जारी होने की तारीख (29 अक्टूबर 2018) के बाद और चेक बैंक में पेश होने की तारीख (23 जनवरी 2019) से पहले किया गया था। शिकायतकर्ता ने अपनी मूल शिकायत में इस रकम की प्राप्ति का कोई जिक्र नहीं किया था।
सुप्रीम कोर्ट के दशरथभाई त्रिकमभाई पटेल बनाम हितेश महेंद्रभाई पटेल (2023) के ऐतिहासिक फैसले को लागू करते हुए हाईकोर्ट ने जोर दिया कि चेक परिपक्वता या प्रस्तुति की तिथि पर मौजूदा कानूनी रूप से लागू होने वाले ऋण का प्रतिनिधित्व करना चाहिए:
“34.1. धारा 138 के तहत अपराध बनने के लिए, अनादृत हुए चेक को परिपक्वता या प्रस्तुति की तारीख पर कानूनी रूप से लागू होने वाले ऋण का प्रतिनिधित्व करना चाहिए।”
“34.2. यदि चेक जारीकर्ता चेक काटे जाने और परिपक्वता पर उसके भुनाए जाने के बीच की अवधि में राशि का कोई हिस्सा या पूरी राशि चुका देता है, तो परिपक्वता की तारीख पर कानूनी रूप से लागू ऋण वह राशि नहीं होगी जो चेक पर दर्शाई गई है।”
“34.3. जब चेक पर दर्शाई गई राशि का कोई हिस्सा या पूरा हिस्सा चेक जारीकर्ता द्वारा चुका दिया जाता है, तो इसे अधिनियम की धारा 56 के अनुसार चेक पर पृष्ठांकित (एंडोर्स) किया जाना चाहिए। भुगतान के अंकन वाला ऐसा चेक शेष राशि (यदि कोई हो) के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। यदि ऐसा पृष्ठांकित चेक परिपक्वता पर पेश किए जाने के बाद अनादृत होता है, तो धारा 138 के तहत अपराध बनेगा।”
जस्टिस कैंथला ने टिप्पणी की कि चूंकि चेक काटे जाने के बाद शिकायतकर्ता को 50,000 रुपये ट्रांसफर किए गए थे, इसलिए देनदारी कम हो गई थी:
“इसलिए, आरोपी द्वारा भुगतान की गई राशि से देनदारी कम हो गई थी और चेक को पूरी राशि के लिए प्रस्तुत नहीं किया जा सकता था।”
कोर्ट ने शिकायतकर्ता की उस दलील को भी खारिज कर दिया जो आरोपी द्वारा धारा 313 सीआरपीसी के तहत दी गई स्वीकृति पर आधारित थी:
“आरोपी ने चेक जारी होने की तारीख पर 1,40,000 रुपये की देनदारी में से 50,000 रुपये का भुगतान कर दिया था, और देनदारी के संबंध में स्वीकारोक्ति शिकायतकर्ता की कोई मदद नहीं करेगी।”
निचली अदालतों की त्रुटि की ओर इशारा करते हुए हाईकोर्ट ने कहा:
“विद्वान निचली अदालतें चेक जारी होने के बाद और उसकी प्रस्तुति से पहले शिकायतकर्ता को मिले भुगतान के कानूनी प्रभाव को देखने में विफल रहीं और यह मानकर गलती की कि चेक वैध था और इसे पूरी राशि के लिए प्रस्तुत किया जा सकता था। इसलिए, निचली अदालतों द्वारा पारित निर्णय और आदेश टिकने योग्य नहीं हैं।”
हाईकोर्ट का निर्णय
रिवीजन पिटीशन को स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और अपीलीय अदालत के निर्णयों को निरस्त कर दिया और आरोपी को एनआई एक्ट की धारा 138 के अपराध से बरी कर दिया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि यदि अपील दाखिल करने की समय सीमा के भीतर कोई अपील दायर नहीं की जाती है, तो आरोपी द्वारा जमा की गई जुर्माने की राशि उसे वापस कर दी जाए। इसके अलावा धारा 437-ए सीआरपीसी (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 481) के अनुपालन में आरोपी को ट्रायल कोर्ट के समक्ष 50,000 रुपये का निजी मुचलका और उतनी ही राशि की एक जमानत पेश करने का निर्देश दिया गया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: चेत राम बनाम रंजीत
वाद संख्या: क्रिमिनल रिवीजन संख्या 627 / 2024
पीठ: जस्टिस राकेश कैंथला
निर्णय की तिथि: 10 सितंबर 2026

