माता-पिता से अलग रहने का दबाव बनाना और बार-बार मायके जाना क्रूरता, मद्रास हाईकोर्ट ने पति को तलाक की मंजूरी दी

मद्रास हाईकोर्ट ने एक पारिवारिक विवाद में अहम फैसला सुनाते हुए पति के पक्ष में दिए गए तलाक के आदेश को बरकरार रखा है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ससुराल छोड़कर बार-बार बिना किसी ठोस वजह के महीनों मायके में रहना और पति पर उसके बुजुर्ग माता-पिता से अलग रहने का अनुचित दबाव डालना मानसिक क्रूरता के दायरे में आता है।

जस्टिस पी. टी. आशा और जस्टिस एन. माला की खंडपीठ ने 27 अगस्त के अपने आदेश में पत्नी की ओर से दायर अपील को पूरी तरह खारिज कर दिया। महिला ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें पति की तलाक की अर्जी को क्रूरता के आधार पर स्वीकार कर लिया गया था।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में रेखांकित किया कि महिला यह भली-भांति जानते हुए विवाह बंधन में बंधी थी कि उसका पति अपने माता-पिता का इकलौता बेटा है और बुढ़ापे में उनकी देखभाल करने की नैतिक व पारिवारिक जिम्मेदारी उसी पर है। इसके बावजूद उसने पति पर अलग घर बसाने का अनुचित दबाव बनाया, जो कानूनन क्रूरता है।

दांपत्य में आपसी सामंजस्य जरूरी, एकतरफा शर्तों से नहीं चलता रिश्ता

अदालत ने पति-पत्नी के रिश्ते पर टिप्पणी करते हुए कहा कि वैवाहिक संबंध पूरी तरह से एक-दूसरे के प्रति समर्पण और पारस्परिक समझ पर आधारित होता है। यह रिश्ता किसी एक साथी की एकतरफा शर्तों या हुक्म पर नहीं चलाया जा सकता। शादी की नींव को दया, आपसी समझ और प्रेम से सींचा जाता है।

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पीठ ने यह भी कहा कि बिना किसी वैध कारण के पत्नी का बार-बार मायके चले जाना दूसरे पक्ष के मन में भारी असुरक्षा पैदा करता है। ऐसे व्यवहार से पति हमेशा इस भय और आशंका में जीता है कि पत्नी कभी भी मामूली सी बात पर झगड़ा शुरू कर सकती है और पलक झपकते ही घर छोड़कर जा सकती है।

समझौते के बाद भी नहीं सुधरे हालात

मामले के अनुसार, पति ने फैमिली कोर्ट में गुहार लगाई थी कि उसकी पत्नी बिना किसी ठोस कारण के बार-बार ससुराल छोड़ देती थी और महीनों तक अपने मायके में ही डेरा डाले रहती थी। वह संयुक्त परिवार में रहने के लिए तैयार नहीं थी और लगातार अलग घर लेने की जिद कर रही थी।

पति का कहना था कि खुद का मकान होने और माता-पिता का एकमात्र सहारा होने के बावजूद, उसने पारिवारिक शांति के लिए समझौता किया। उसने किराए पर अलग मकान लिया। इतना ही नहीं, पत्नी की सहूलियत को देखते हुए बाद में उसने ससुराल के नजदीक ही दूसरा घर भी किराए पर लिया। इसके बावजूद पत्नी का मायके जाने का सिलसिला थमा नहीं, जिसके बाद उसने तलाक की याचिका दायर की।

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आरोपों को साबित करने में नाकाम रही पत्नी

दूसरी ओर, महिला ने पति के दावों का विरोध करते हुए आरोप लगाया कि पति और ससुराल वालों की प्रताड़ना तथा दहेज की मांग के कारण उसे घर छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा। उसने यह भी आरोप लगाया कि उसके पति का किसी अन्य महिला के साथ अवैध संबंध है और वह गुजारा भत्ता देने से बचने तथा दूसरी शादी करने की नीयत से तलाक चाहता है।

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हालांकि, हाईकोर्ट ने पाया कि महिला ने फैमिली कोर्ट की सुनवाई में कोई खास सहयोग नहीं दिया। सबूत पेश करने और पति की दलीलों का विरोध करने के पर्याप्त अवसर मिलने के बावजूद उसने न तो अपने आरोपों के पक्ष में कोई साक्ष्य पेश किया और न ही वह खुद जिरह (क्रॉस-एग्जामिनेशन) के लिए पेश हुई। इसके विपरीत, महिला के अपने बयानों से भी यह साफ हुआ कि संयुक्त परिवार में न रहने की उसकी इच्छा के चलते ही पति ने दो बार अलग घर किराए पर लिया था।

फैमिली कोर्ट के दस्तावेजी व मौखिक साक्ष्यों से पूरी तरह सहमति जताते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि पत्नी की अपील में कोई दम नहीं है और तलाक के फैसले को बरकरार रखा।

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