सुप्रीम कोर्ट ने जाम्बिया में रहने वाले एक अनिवासी भारतीय (एनआरआई) के खिलाफ गुजरात में दर्ज आपराधिक मामले को निरस्त कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि रिश्ते की शुरुआत में शादी का वादा करने के बाद यदि परिवार या माँ की असहमति के कारण विवाह संभव नहीं हो पाता, तो इसे पहले दिन से धोखे की नीयत नहीं माना जा सकता।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने 7 सितंबर को यह फैसला सुनाते हुए गुजरात हाईकोर्ट के उस आदेश को पलट दिया, जिसमें वडोदरा में दर्ज एफआईआर को रद्द करने से इनकार कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रथम दृष्टया यह मामला दो वयस्कों के बीच आपसी सहमति से बने संबंध का प्रतीत होता है, न कि धोखे से स्थापित किए गए शारीरिक संबंध का।
बीएनएस की धारा 69 पर सुप्रीम कोर्ट की व्याख्या
शीर्ष अदालत ने भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 69 के प्रावधानों का विश्लेषण किया, जिसके तहत झूठे वादे या धोखे से शारीरिक संबंध बनाने पर 10 साल तक की जेल और जुर्माने का प्रावधान है।
भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) और नए कानून के प्रावधानों की तुलना करते हुए पीठ ने रेखांकित किया कि कानून में दो स्थितियों के बीच गहरा अंतर है—एक वह वादा जो नेक नीयत से किया गया हो लेकिन बाद में किन्हीं कारणों से पूरा न हो सका, और दूसरा वह वादा जिसे शुरू से ही न निभाने के इरादे से किया गया हो। अदालत ने कहा कि धारा 69 के तहत अपराध साबित करने के लिए यह दिखाना आवश्यक है कि आरोपी की मंशा पहले दिन से ही शादी न करने की थी, क्योंकि कानून केवल इरादतन धोखेबाजी को दंडित करता है।
पीठ ने यह भी टिप्पणी की कि शिकायतकर्ता के अनुसार युवक ने बाद में अपनी माँ की असहमति के चलते शादी से इनकार किया। अदालत के अनुसार, माँ के विरोध की वजह से शादी टूटना यह संकेत देता है कि शुरुआत में शादी की बात नेक नीयत से ही कही गई थी, न कि किसी दुर्भावना से।
सोशल मीडिया पर संपर्क से लेकर होटल में मुलाकात तक का घटनाक्रम
शिकायत के मुताबिक, महिला और आरोपी युवक का संपर्क नवंबर 2022 में फेसबुक के माध्यम से हुआ था। इसके बाद दोनों की पहली व्यक्तिगत मुलाकात फरवरी 2024 में वडोदरा के एक होटल में हुई, जहाँ वे दो दिनों तक साथ रहे। महिला का आरोप था कि युवक ने दिसंबर 2024 तक शादी करने की बात कही और इसी दौरान उनके बीच शारीरिक संबंध बने।
हालांकि, जनवरी 2025 में युवक ने महिला को बताया कि उसकी माँ इस रिश्ते के लिए राजी नहीं हैं, इसलिए वह विवाह नहीं कर सकता। इसके बाद महिला ने वडोदरा के संबंधित थाने में युवक के खिलाफ धोखाधड़ी और शारीरिक संबंध बनाने के आरोप में मामला दर्ज करा दिया।
युवक की ओर से आरोपों का खंडन करते हुए दलील दी गई कि संबंध पूरी तरह से सहमति पर आधारित थे और उसकी नीयत कभी गलत नहीं थी। हाईकोर्ट में प्रस्तुत रिकॉर्ड के अनुसार, युवक ने महिला की माँ को 40 हजार रुपये भेजे थे और मुंबई से लगभग 32 हजार रुपये के मोबाइल फोन व कपड़े भी उपहार स्वरूप दिए थे। इसके अलावा महिला के परिजनों से भी उसकी बातचीत होती रही थी।
हाईकोर्ट के रुख को सुप्रीम कोर्ट ने क्यों नकारा
इससे पहले मई के महीने में गुजरात हाईकोर्ट ने युवक की याचिका खारिज करते हुए कहा था कि माँ की असहमति शादी से मुकरने की कोई वाजिब वजह नहीं हो सकती। हाईकोर्ट का मानना था कि संबंध बनाने से पहले युवक को अपनी माँ की राय ले लेनी चाहिए थी और बाद में पीछे हटने से उसकी नीयत पर सवाल उठता है।
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के इस निष्कर्ष को खारिज कर दिया। शीर्ष अदालत ने कहा कि प्राथमिक शिकायत के अनुसार पहली ही मुलाकात में विवाह की इच्छा जताई गई और सहमति बनी, लेकिन रिकॉर्ड पर ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है जिससे साबित हो कि शारीरिक संबंध केवल शादी के झूठे झांसे की बुनियाद पर ही बनाए गए थे।
अदालत ने पाया कि युवक का आचरण शुरुआत से धोखे भरा नहीं था, जिसके चलते वडोदरा में दर्ज पूरी आपराधिक कार्यवाही और एफआईआर को निरस्त करने का आदेश दिया गया।

