राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए स्वेच्छा से सरकारी सेवा से इस्तीफा देने वाला कर्मचारी चुनाव हारने के बाद केंद्रीय सिविल सेवा नियमों के तहत बहाली या इस्तीफा वापस लेने की मांग नहीं कर सकता। जस्टिस इंद्रजीत सिंह और जस्टिस संदीप तनेजा की खंडपीठ ने पूर्व सीनियर ऑडिटर द्वारा दायर उस रिट याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें स्वीकृत इस्तीफा वापस लेने के उनके अनुरोध को ठुकराए जाने को चुनौती दी गई थी। हाईकोर्ट ने सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (कैट), जयपुर बेंच के फैसले की पुष्टि करते हुए कहा कि चुनाव में हार का सामना करना सीसीएस (पेंशन) नियम, 2021 के नियम 26(5) के तहत “परिस्थितियों में महत्वपूर्ण बदलाव” या कोई “बाध्यकारी कारण” नहीं माना जा सकता। इसके अतिरिक्त, पीठ ने यह भी माना कि सक्रिय राजनीति में भाग लेना सीसीएस (आचरण) नियम, 1964 के तहत अनिवार्य राजनीतिक तटस्थता का उल्लंघन है।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता नीरज बिश्नोई उत्तर पश्चिम रेलवे, अजमेर में उप निदेशक (ऑडिट) के कार्यालय में सीनियर ऑडिटर के पद पर कार्यरत थे। नवंबर 2023 में होने वाले राजस्थान विधानसभा चुनाव लड़ने की इच्छा से उन्होंने 10 अक्टूबर 2023 को अपने पद से इस्तीफा दे दिया। सक्षम प्राधिकारी ने उनका इस्तीफा 1 नवंबर 2023 से स्वीकार कर लिया।
इसके बाद बिश्नोई ने बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के आधिकारिक उम्मीदवार के तौर पर रतनगढ़ विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा। हालांकि, वह चुनाव हार गए। चुनाव में पराजय के बाद, उन्होंने 1 जनवरी 2024 को एक आवेदन देकर अपना इस्तीफा वापस लेने और सेवा में बहाल करने का अनुरोध किया।
रेलवे प्रशासन ने 29 जनवरी 2024 को सीसीएस (पेंशन) नियम, 2021 के नियम 26(5) तथा सीसीएस (आचरण) नियम, 1964 के नियम 3(1)(vii) और नियम 5 का हवाला देते हुए उनका अनुरोध अस्वीकार कर दिया। इसके बाद याचिकाकर्ता द्वारा दिया गया 19 फरवरी 2024 का अभ्यावेदन भी 22 फरवरी 2024 को खारिज कर दिया गया। इन आदेशों के खिलाफ बिश्नोई ने सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल, जयपुर बेंच का दरवाजा खटखटाया। ट्रिब्यूनल ने 27 फरवरी 2026 को उनकी मूल याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी कि इस्तीफा देना उनका एक सोचा-समझा व्यक्तिगत निर्णय था, न कि किसी बाध्यकारी परिस्थिति का परिणाम। साथ ही, सक्रिय राजनीति में शामिल होना आचरण नियमों का उल्लंघन था। ट्रिब्यूनल के इसी फैसले को याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।
पक्षकारों की दलीलें
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील अमित माथुर ने दलील दी कि इस्तीफा वापसी का आवेदन पेंशन नियम 2021 के नियम 26(5) के तहत निर्धारित 90 दिनों की अवधि के भीतर दिया गया था। उन्होंने कहा कि इस्तीफा देते समय याचिकाकर्ता को यह जानकारी नहीं थी कि इस्तीफा स्वीकार होने से वह पेंशन और सेवानिवृत्ति लाभों से वंचित हो जाएंगे। चुनाव हारने के बाद जब उन्हें इस बात का पता चला, तो इससे एक बाध्यकारी कारण और परिस्थितियों में महत्वपूर्ण बदलाव उत्पन्न हुआ, जिसके आधार पर इस्तीफा वापस लेने की अनुमति मिलनी चाहिए थी।
याचिकाकर्ता के वकील ने यह भी तर्क दिया कि अधिकारियों ने 1964 के आचरण नियमों के नियम 3(1)(vii) और नियम 5(1) व (4) को गलत तरीके से लागू किया है। उनका कहना था कि ये नियम केवल सक्रिय सेवा के दौरान राजनीतिक तटस्थता की मांग करते हैं, जबकि याचिकाकर्ता चुनाव लड़ने के दौरान सरकारी सेवा में नहीं थे। अपनी दलीलों के समर्थन में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के दो फैसलों—बलराम गुप्ता बनाम भारत संघ एवं अन्य (1987) और गवर्नमेंट ऑफ एनसीटी ऑफ दिल्ली एवं अन्य बनाम कमलेश रानी भटला (2023) का हवाला दिया।
दूसरी ओर, प्रतिवादी विभाग की ओर से वकील वी.पी. माथुर ने ट्रिब्यूनल और प्रशासनिक आदेशों का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता ने राजनीति में कदम रखने के लिए सोच-समझकर इस्तीफा दिया था और चुनाव में हार के बाद वे जनहित के नाम पर सेवा में बहाली का दावा नहीं कर सकते।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
सीसीएस (पेंशन) नियम, 2021 के नियम 26(5) के कानूनी प्रावधानों का विश्लेषण करते हुए हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि सक्षम प्राधिकारी जनहित में इस्तीफा वापस लेने की अनुमति केवल तभी दे सकता है जब दो अनिवार्य शर्तें पूरी हों: पहली, सरकारी कर्मचारी ने किसी बाध्यकारी कारण से इस्तीफा दिया हो; और दूसरी, जिन परिस्थितियों ने उसे इस्तीफा देने के लिए बाध्य किया था, उनमें कोई महत्वपूर्ण बदलाव आया हो।
याचिकाकर्ता की दलीलों को खारिज करते हुए खंडपीठ ने टिप्पणी की:
“वर्तमान मामले में, यह निर्विवाद है कि याचिकाकर्ता ने राजस्थान विधानसभा का चुनाव लड़ने के लिए अपना इस्तीफा दिया था। यह याचिकाकर्ता की ओर से एक स्वैच्छिक कदम था। ऐसी परिस्थितियों में, हमें याचिकाकर्ता के विद्वान वकील के इस तर्क में कोई दम नहीं दिखता कि पेंशन परिलाभों की अपात्रता याचिकाकर्ता के लिए इस्तीफा वापस लेने का कोई बाध्यकारी कारण बनती है। इसके अलावा, हमारा मानना है कि इस्तीफा देते समय जो परिस्थितियां मौजूद थीं, उनमें कोई महत्वपूर्ण बदलाव नहीं आया था।”
आचरण नियमों और याचिकाकर्ता के उस तर्क पर विचार करते हुए कि चुनाव लड़ते समय वह सेवा में नहीं थे, हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल के निष्कर्षों को सही ठहराया। पीठ ने स्पष्ट किया कि पेंशन नियमों के नियम 26(5)(ii) के अनुसार, इस्तीफे और वापसी के अनुरोध के बीच की अवधि में संबंधित व्यक्ति का आचरण अनुचित नहीं होना चाहिए:
“1964 के नियमों का नियम 3(1)(vii) यह प्रावधान करता है कि एक सरकारी कर्मचारी हर समय राजनीतिक तटस्थता बनाए रखेगा। इसके अलावा, उक्त नियमों का नियम 5(1) यह प्रावधान करता है कि कोई भी सरकारी कर्मचारी किसी भी राजनीतिक दल या राजनीति में भाग लेने वाले संगठन का सदस्य नहीं होगा और न ही उससे जुड़ा रहेगा। हमारा मानना है कि विद्वान ट्रिब्यूनल ने सही माना है कि याचिकाकर्ता का आचरण उक्त नियमों के उल्लंघन में था, जो राजनीतिक गतिविधियों को प्रतिबंधित करते हैं और हर समय राजनीतिक तटस्थता बनाए रखने का निर्देश देते हैं। एक राजनीतिक दल के आधिकारिक उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ने के बाद याचिकाकर्ता राजनीतिक रूप से तटस्थ नहीं रह सकता था। इसके अलावा, उसका इस्तीफा वापस स्वीकार किए जाने पर याचिकाकर्ता को बिना किसी ब्रेक के निरंतर सरकारी सेवा में माना जाता, जिसका अर्थ यह होता कि सेवा अवधि के दौरान याचिकाकर्ता द्वारा पूर्वोक्त प्रतिबंधित गतिविधियों में भाग लिया गया माना जाता।”
याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्तुत सुप्रीम कोर्ट के फैसलों पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि वे मामले तथ्यों के आधार पर पूरी तरह भिन्न हैं। गवर्नमेंट ऑफ एनसीटी ऑफ दिल्ली बनाम कमलेश रानी भटला में फैसला उस मामले की विशिष्ट परिस्थितियों और हाईकोर्ट के पूर्व निर्देशों के आलोक में आया था। वहीं, बलराम गुप्ता बनाम भारत संघ मामले में कर्मचारी ने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति प्रभावी होने से पहले ही अपना आवेदन वापस ले लिया था और सहयोगियों के व्यक्तिगत आग्रह को परिस्थितियों में बदलाव माना गया था। इसलिए, ये निर्णय याचिकाकर्ता के पक्ष को कोई मजबूती नहीं देते।
अदालत का फैसला
सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल के 27 फरवरी 2026 के आदेश में किसी भी प्रकार की कानूनी त्रुटि न पाते हुए, राजस्थान हाईकोर्ट ने रिट याचिका को आधारहीन मानते हुए खारिज कर दिया तथा सभी लंबित आवेदनों का निस्तारण कर दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: नीरज बिश्नोई बनाम भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक एवं अन्य
वाद संख्या: डी.बी. सिविल रिट याचिका संख्या 8941/2026
पीठ: जस्टिस इंद्रजीत सिंह और जस्टिस संदीप तनेजा
निर्णय की तिथि: 01/09/2026

