दिल्ली हाईकोर्ट ने करीब 15 साल पुराने एक मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए दोषी की जेल की सजा को घटाकर उसके द्वारा अब तक हिरासत में बिताई जा चुकी अवधि तक सीमित कर दिया है। अदालत ने पाया कि दोनों पक्षों के शरीर पर एक-दूसरे के नाम के टैटू गुदे होना और अनसुलझे पहलू यह दर्शाते हैं कि यह घटना एकतरफा अपराध के बजाय दोनों के बीच रहे आपसी संबंध से जुड़ी थी।
जस्टिस विमल कुमार यादव की पीठ ने 7 सितंबर को दिए अपने आदेश में कहा कि इतने वर्षों बाद उस व्यक्ति को दोबारा जेल भेजना पूरी तरह से न्याय का मखौल उड़ाना होगा। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि घटना के समय युवक की उम्र केवल 18 वर्ष थी और उसका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं रहा है। अब वह अपने जीवन के अंतिम पड़ाव की ओर बढ़ रहा है और दोनों ही पक्ष अपने-अपने जीवन में शादी कर बस चुके हैं।
टैटू बने फैसले का अहम आधार
इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण पहलू दोनों के शरीर पर बने पक्के टैटू रहे। अदालत ने रेखांकित किया कि शिकायतकर्ता महिला इस बात का कोई ठोस कारण नहीं बता सकी कि युवक का नाम उसके सीने पर कैसे गुदा था। इसके साथ ही उसने यह भी स्वीकार किया कि उसका नाम भी उस युवक के हाथ पर गुदा हुआ था।
अदालत ने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि महिला ने अब आत्ममंथन किया है, जहां सच्चाई पूरी तरह सामने आ जाती है। जस्टिस यादव ने कहा कि महिला भी अपने दिल की गहराइयों में उन टैटू और मनाली यात्रा से जुड़े सवालों के जवाब तलाश रही होगी। महिला ने अदालत में यह भी स्पष्ट किया कि वह अब इस कानूनी लड़ाई को आगे जारी नहीं रखना चाहती।
जून 2009 की घटना और विरोधाभासी बयान
यह पूरा विवाद जून 2009 का है, जब करीब 14 वर्ष की किशोरी अचानक अपने घर से लापता हो गई थी। परिजनों को उसकी गैरमौजूदगी का तुरंत पता चलने के बावजूद दो दिनों तक कोई एफआईआर दर्ज नहीं कराई गई थी। इसके बाद अपहरण का केस दर्ज हुआ और कुछ समय बाद वह घर लौट आई। इस दौरान वह 18 वर्षीय युवक के साथ दिल्ली के कनॉट प्लेस और फिर मनाली गई थी, जिसके बाद वे वापस लौटे।
युवक का शुरू से कहना था कि वह अपनी मर्जी से उसके साथ गई थी और उनके बीच जो कुछ भी हुआ, वह दोनों की सहमति से हुआ था। चिकित्सकीय जांच के दौरान दिए गए किशोरी के शुरुआती बयान में भी युवक की इस बात की पुष्टि हुई थी। हालांकि, बाद में निचली अदालत के समक्ष दिए गए बयान में वह अपनी इस बात से मुकर गई।
निचली अदालत ने उस समय पर्याप्त और विशेष कारणों का उल्लेख करते हुए कानून में तय न्यूनतम सजा से भी कम सजा सुनाई थी। इसके बाद दोषी ने दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाकर सजा में और राहत देने की गुहार लगाई थी।
‘रोमियो-जूलियट क्लॉज’ की दलील और कानूनी सुधार की मांग
हाईकोर्ट में युवक की ओर से पेश वकील साहिला लांबा ने कहा कि उनके मुवक्किल को अधिकतम संभव राहत दी जानी चाहिए और उसके द्वारा हिरासत में काटे जा चुके समय को ही पर्याप्त सजा माना जाना चाहिए। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की उन टिप्पणियों का भी हवाला दिया जिनमें कम उम्र के अंतर वाले सच्चे प्रेम संबंधों को संरक्षण देने के लिए कानून में ‘रोमियो-जूलियट क्लॉज’ जोड़े जाने पर विचार करने की बात कही गई थी।
दूसरी ओर, अतिरिक्त लोक अभियोजक राज कुमार ने सजा और कम करने का विरोध करते हुए तर्क दिया कि निचली अदालत पहले ही सभी परिस्थितियों पर विचार कर न्यूनतम से कम सजा दे चुकी है।
मामले के कानूनी पहलुओं पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि मौजूदा कानूनी प्रावधानों के तहत नाबालिग के साथ नजदीकी को वैध नहीं ठहराया जा सकता, और केवल लड़की की उम्र ही वह कारक थी जिसके आधार पर युवक को दोषी ठहराया गया। पीठ ने यह भी ध्यान दिलाया कि दिल्ली, मद्रास और बॉम्बे हाईकोर्ट सहित कई अदालतें किशोरों के बीच आपसी संबंधों की हकीकत को पहचान चुकी हैं और संसद से इस संबंध में उचित कानूनी संशोधन करने का आग्रह कर चुकी हैं।
पीठ ने निष्कर्ष निकाला कि मामले के कई सवाल अनुत्तरित रह गए हैं, जिससे स्पष्ट होता है कि जो कुछ हुआ उसके लिए अकेले उस युवक को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने अंततः उसकी सजा को अब तक जेल में बिताई गई अवधि तक घटाकर मामले का निस्तारण कर दिया।

