पैकेज्ड फूड पर फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी लेबल: सुप्रीम कोर्ट ने FSSAI से 13 बिंदुओं पर मांगा स्पष्टीकरण; चरणबद्ध नीति, लाल रंग और पोषक तत्वों के मानकों पर उठाए सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने पैकेज्ड फूड उत्पादों पर फ्रंट-ऑफ-पैकेज लेबलिंग (एफओपीएल) लागू करने के मामले में भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) और केंद्र सरकार के प्रस्तावित मसौदे पर कई गंभीर सवाल उठाए हैं। जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने पैकेट के मुख्य भाग पर लाल रंग के षट्कोणीय (हेक्सागोनल) चेतावनी लेबल लगाने के एफएसएसएआई के प्रस्ताव की प्रगति को दर्ज किया, लेकिन साथ ही अमल की समयसीमा, पोषक तत्वों की सीमा, उपभोक्ताओं की समझ और पैकेजिंग डिजाइन से जुड़ी अस्पष्टताओं पर 13 स्पष्ट प्रश्न तैयार किए। शीर्ष अदालत ने एफएसएसएआई को इन सभी बिंदुओं पर 10 दिनों के भीतर स्पष्टीकरण हलफनामा दायर करने का निर्देश दिया है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला ‘3एस एंड अवर हेल्थ सोसाइटी’ द्वारा दायर एक रिट याचिका से जुड़ी विविध अर्जी (मिसलेनियस एप्लिकेशन) की सुनवाई के दौरान सामने आया। याचिका में मांग की गई थी कि वसा, चीनी या नमक की अधिक मात्रा वाले (एचएफएसएस) और अत्यधिक प्रसंस्कृत (अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स) खाद्य उत्पादों पर पैकेज के सामने स्पष्ट चेतावनी लेबल अनिवार्य किए जाएं। इससे पहले 13 अगस्त, 2026 के अपने आदेश में कोर्ट ने ऐसे अस्वास्थ्यकर खाद्य पदार्थों और मोटापा, मधुमेह, उच्च रक्तचाप व हृदय रोगों जैसी गैर-संचारी बीमारियों के बीच वैज्ञानिक रूप से सिद्ध संबंध को रेखांकित किया था। तब पीठ ने कहा था:

“अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार में स्वास्थ्य का अधिकार भी शामिल है। जब संविधान इस अधिकार की गारंटी देता है, तो यह राज्य पर न केवल स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाने वाले कार्यों से बचने का, बल्कि इसकी रक्षा के लिए सकारात्मक कदम उठाने का भी दायित्व डालता है। इसके अलावा, संविधान का अनुच्छेद 47 सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार को राज्य का प्राथमिक कर्तव्य मानता है।”

अदालत ने यह भी टिप्पणी की थी:

“पूरी दुनिया को यह पता होना चाहिए कि भारत अपने नागरिकों, खासकर बढ़ते बच्चों के संपूर्ण स्वास्थ्य को लेकर बेहद चिंतित है।”

कोर्ट के इन निर्देशों के अनुपालन में एफएसएसएआई ने 28 अगस्त, 2026 को एक हलफनामा पेश किया। इसमें पैकेट के सामने लाल रंग का हेक्सागोनल चेतावनी लेबल लगाने का प्रस्ताव रखा गया, जिसका उद्देश्य उपभोक्ताओं को चिंताजनक पोषक तत्वों की अधिकता वाले उत्पादों के प्रति “एक सरल, प्रमुख और आसानी से समझ में आने वाली चेतावनी” देना था। एफएसएसएआई की योजना इसे दो चरणों में लागू करने की है: पहले चरण में उन उत्पादों को शामिल किया जाएगा जिनमें आईसीएमआर-एनआईएन के ‘भारतीयों के लिए आहार दिशानिर्देश, 2024’ के अनुसार तय सीमा से अधिक दो या उससे अधिक पोषक तत्व (एडेड सैचुरेटेड फैट, एडेड शुगर या नमक) मौजूद हैं, साथ ही निर्दिष्ट मीठे पेय पदार्थ भी इसमें आएंगे। दूसरे चरण में यह चेतावनी उन उत्पादों पर भी लागू होगी, जिनमें तय सीमा से अधिक कोई एक पोषक तत्व भी मौजूद होगा। इस प्रस्ताव में एकल-घटक उत्पादों और स्वाभाविक रूप से तेल, चीनी, नमक, घी व शहद जैसे उत्पादों को छूट दी गई है।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता संस्था ने 3 सितंबर, 2026 के अपने जवाब में एफएसएसएआई के दो-चरणीय ढांचे पर कड़ी आपत्ति जताई। याचिकाकर्ता का कहना था कि पहले चरण में ‘दो या अधिक’ पोषक तत्वों की मौजूदगी की शर्त रखना वैज्ञानिक रूप से अनुचित है और यह एचएफएसएस की मूल परिभाषा को ही बदल देता है। संस्था ने दलील दी कि अत्यधिक चीनी, अत्यधिक नमक और अत्यधिक सैचुरेटेड फैट शरीर पर अलग-अलग जैविक असर डालते हैं और स्वतंत्र रूप से नुकसानदेह हैं—चीनी मधुमेह और मेटाबॉलिक बीमारियों से जुड़ी है, नमक उच्च रक्तचाप से और सैचुरेटेड फैट हृदय रोग तथा हानिकारक कोलेस्ट्रॉल से जुड़ा है। ऐसे में दो पोषक तत्वों की अनिवार्यता लागू करने से पहले चरण के दायरे से अधिकांश हानिकारक उत्पाद बाहर हो जाएंगे।

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याचिकाकर्ता ने सुझाव दिया कि “उच्च सीमाओं से वैज्ञानिक रूप से उपयुक्त सीमाओं की ओर धीरे-धीरे बढ़ने के साधन के रूप में चरणबद्ध दृष्टिकोण को उचित ठहराया जा सकता है”। इसके लिए इज़राइल के नियामक मॉडल का उदाहरण दिया गया, जहां शुरुआती चरण में उच्च मानक रखे गए और फिर निश्चित समयसीमा के भीतर उन्हें घटाकर कड़ा किया गया। याचिकाकर्ता ने यह भी दलील दी कि 29 अक्टूबर, 2021 को हुई हितधारकों की बैठक की आम सहमति के अनुरूप सीमा की गणना केवल ‘एडेड शुगर’ और ‘एडेड फैट’ के आधार पर नहीं, बल्कि ‘टोटल शुगर’ और ‘टोटल फैट/सैचुरेटेड फैट’ के आधार पर होनी चाहिए। इसके अलावा प्रस्तावित फॉन्ट साइज को बहुत छोटा बताया गया, प्रत्येक पोषक तत्व के लिए अलग-अलग हेक्सागोनल चेतावनी लगाने की मांग की गई और नियम अधिसूचित होते ही इसे स्वैच्छिक रखने के बजाय तुरंत अनिवार्य बनाने पर जोर दिया गया।

दूसरी ओर, मामले में हस्तक्षेपकर्ता ‘ऑल इंडिया फूड प्रोसेसर्स एसोसिएशन’ (एआईएफपीए) ने पश्चिमी देशों की तर्ज पर ‘न्यूट्रिएंट रेफरेंस वैल्यू’ आधारित प्रति-सर्विंग (प्रति खुराक) डेटा मॉडल अपनाने की वकालत की।

केंद्र सरकार और एफएसएसएआई की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) ने सुनवाई के दौरान अदालत को आश्वस्त किया कि नियामक संस्था चरणों के विभाजन के आधार पर सुझावों पर विचार करने के लिए पूरी तरह तैयार है।

कोर्ट का विश्लेषण

एफएसएसएआई के प्रस्ताव का विस्तृत विश्लेषण करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने माना कि नियामक ने कदम आगे बढ़ाए हैं, लेकिन जमीनी क्रियान्वयन से जुड़े कई बुनियादी सवाल अभी अनुत्तरित हैं।

चरणबद्ध नीति और परिभाषा का विरोधाभास: पीठ ने कहा कि आईसीएमआर-एनआईएन 2024 के दिशानिर्देशों और 2022 के ड्राफ्ट लेबलिंग विनियमों के बीच तालमेल का अभाव है। 2024 के दिशानिर्देश एचएफएसएस खाद्य पदार्थों को ऐसे उत्पादों के रूप में परिभाषित करते हैं जिनमें अत्यधिक कुकिंग ऑयल/फैट या अधिक एडेड शुगर ‘और’ (तथा) नमक हो। जबकि 2022 के ड्राफ्ट विनियमों में सैचुरेटेड फैट ‘या’ टोटल शुगर ‘या’ सोडियम की अधिकता की बात कही गई है। कोर्ट ने कहा कि ‘और’ तथा ‘या’ के इस भ्रम को प्राथमिकता के आधार पर सुलझाया जाना चाहिए। इसके अलावा, चरण I और चरण II के बीच कोई निश्चित समयसीमा तय न होने पर चिंता जताते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उद्योग जगत को उत्पाद सुधारने का समय देने या उपभोक्ता स्वीकार्यता के नाम पर अनिश्चितकाल तक इंतजार नहीं किया जा सकता।

आईसीएमआर-एनआईएन दिशानिर्देशों का वर्गीकरण: अदालत ने रेखांकित किया कि 2024 के दिशानिर्देशों की तालिका 15.2 में खाद्य पदार्थों को प्रसंस्करण के आधार पर तीन समूहों (ग्रुप ए-न्यूनतम प्रसंस्कृत, ग्रुप बी-मध्यम प्रसंस्कृत और ग्रुप सी-अत्यधिक प्रसंस्कृत) में बांटा गया है, और फिर कैलोरी के आधार पर उन्हें श्रेणी 1, 2 और 3 में उप-वर्गीकृत किया गया है। कोर्ट ने पाया कि श्रेणी 2 और 3 दोनों को एचएफएसएस माना गया है, लेकिन वसा, चीनी और नमक की वास्तविक मात्रा के मामले में उनके बीच का अंतर स्पष्ट नहीं है। कोर्ट ने कहा:

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“इस अंतर को दूर करने का एक तरीका यह हो सकता है कि याचिकाकर्ता द्वारा सुझाए गए और इज़राइल द्वारा अपनाए गए वैकल्पिक चरणबद्ध दृष्टिकोण को लागू किया जाए। स्पष्ट रूप से कहें तो, खाद्य श्रेणी 3 को चरण I में लक्षित किया जा सकता है। इसके बाद, खाद्य श्रेणी 2 को चरण II में लक्षित किया जा सकता है।”

पीठ ने आगाह किया कि यदि बिना सोचे-समझे केवल तालिका 15.1 की न्यूनतम सीमाएं लागू कर दी गईं, तो बाजार के अधिकांश पैकेज्ड खाद्य पदार्थों पर चेतावनी लेबल लग जाएगा। इससे उपभोक्ता भ्रमित होंगे और उन्हें अपेक्षाकृत ‘स्वस्थ विकल्प’ चुनने में मदद नहीं मिल पाएगी। अदालत ने यह भी कहा कि ग्रुप बी (मध्यम प्रसंस्कृत) और ग्रुप सी (अल्ट्रा-प्रोसेस्ड) के बीच के पोषण संबंधी अंतर को भी चेतावनी लेबल के तंत्र में शामिल किया जाना चाहिए।

पोषक तत्वों का चयन और ‘अनहोली ट्रिनिटी’: स्वास्थ्य विशेषज्ञों द्वारा वसा, चीनी और नमक को ‘अनहोली ट्रिनिटी’ कहे जाने का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने पूछा कि एफएसएसएआई ने अक्टूबर 2021 की हितधारक बैठक में बनी सहमति (‘टोटल शुगर’ और ‘सैचुरेटेड फैट’) को बदलकर ‘एडेड शुगर’ और ‘एडेड फैट’ का रुख क्यों अपनाया? पीठ ने यह भी पूछा कि ट्रांस-फैट को इस चेतावनी प्रणाली में कैसे शामिल किया जाएगा।

लेबल का आकार, प्लेसमेंट और फॉन्ट: कोर्ट ने नोट किया कि एफएसएसएआई के प्रस्ताव में हेक्सागोनल लोगो के वास्तविक आकार, पैकेट के कुल क्षेत्रफल के अनुपात और उसकी स्थिति को लेकर कोई स्पष्टता नहीं है। 2020 के विनियमों के तहत बैक-ऑफ-पैक टेबल से केवल ‘एक पॉइंट बड़ा’ फॉन्ट रखना पर्याप्त नहीं हो सकता जब तक कि लोगो का समग्र आकार तय न हो।

लाल रंग पर शाकाहारी/मांसाहारी का भ्रम: अदालत ने चेतावनी लेबल के लिए प्रस्तावित ‘लाल’ रंग पर सवाल उठाते हुए कहा कि भारतीय उपभोक्ता वर्षों से पैकेजिंग पर लाल निशान को ‘मांसाहारी’ उत्पाद के प्रतीक के रूप में देखने के आदी हैं। ऐसे में चेतावनी के लिए लाल रंग का इस्तेमाल उपभोक्ताओं में असमंजस पैदा कर सकता है।

सचित्र प्रतीक (पिक्टोरियल सिंबल) की आवश्यकता: केवल शब्दों पर आधारित चेतावनी की आलोचना करते हुए पीठ ने टिप्पणी की:

“यह शब्दों से भरा एफओपीएल उपभोक्ता आबादी के सभी राज्यों/क्षेत्रों, स्थानीय भाषाओं, आयु वर्गों और साक्षरता स्तरों में समझ, साक्षरता और पढ़ने की एक निश्चित क्षमता मानकर चलता है। आदर्श रूप से, इस देश की विविधतापूर्ण आबादी को प्रभावी रूप से जागरूक करने वाले एक समावेशी एफओपीएल में शब्दों के साथ-साथ व्यक्तिगत हानिकारक पोषक तत्वों के सचित्र प्रतिनिधित्व का संयोजन होना चाहिए।”

प्रति-सर्विंग डेटा मॉडल खारिज: अदालत ने हस्तक्षेपकर्ता एआईएफपीए के प्रति-सर्विंग डेटा मॉडल को अस्वीकार करते हुए स्पष्ट किया:

“यद्यपि डेटा-आधारित जानकारी उपभोक्ता को सचेत करेगी और आवश्यक विवरण प्रदान करेगी, लेकिन जहां तक हानिकारक तत्वों का संबंध है, यह कोई खतरे का संकेत (रेड सिग्नल) नहीं दे सकती। कई बार यह सिर्फ एक भटकाव (रेड हेरिंग) साबित हो सकती है, जिस पर ध्यान दिए जाने के बजाय उसे नजरअंदाज किए जाने की संभावना अधिक रहती है।”

कृत्रिम एडिटिव्स का खतरा: अदालत ने इस गंभीर पहलू की ओर भी ध्यान दिलाया कि नमक, चीनी और वसा को घटाने के चक्कर में खाद्य कंपनियां स्वाद, बनावट और शेल्फ-लाइफ बरकरार रखने के लिए कृत्रिम प्रिजर्वेटिव्स, इमल्सीफायर्स और रसायनों का इस्तेमाल बढ़ा सकती हैं। नियामक को इसे रोकने के उपाय भी करने चाहिए।

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स्कूली बच्चों में पोषण साक्षरता: यूनिसेफ की बाल पोषण रिपोर्ट 2025 का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि 5 से 19 वर्ष के बच्चों में मोटापे की दर तेजी से बढ़ी है और स्कूलों के आसपास मिलने वाले 80 प्रतिशत खाद्य उत्पाद पैकेज्ड स्नैक्स होते हैं। पीठ ने केंद्र सरकार से स्कूलों के पाठ्यक्रम और कार्यशालाओं के जरिए पोषण साक्षरता बढ़ाने की योजना मांगी।

कोर्ट का निर्णय और निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और एफएसएसएआई को निम्नलिखित 13 प्रमुख बिंदुओं पर स्थिति स्पष्ट करने का निर्देश दिया:

  1. प्रस्तावित दोनों चरणों को लागू करने के लिए एफएसएसएआई द्वारा सोची गई निश्चित और तर्कसंगत समयसीमा क्या है?
  2. चरण I में ‘दो या अधिक’ पोषक तत्वों की अधिकता और निर्दिष्ट पेय पदार्थों को रखने तथा चरण II में ‘किसी एक’ पोषक तत्व की अधिकता को शामिल करने का वैज्ञानिक आधार क्या है?
  3. चरण I के तहत निर्दिष्ट मीठे पेय पदार्थों की पहचान कैसे की जाएगी और उनके लिए क्या सीमाएं होंगी?
  4. क्या पोषक तत्वों की सीमा तय करते समय खाद्य श्रेणी 2 और 3 के बीच के अंतर को एफओपीएल में शामिल किया जाएगा?
  5. क्या मध्यम प्रसंस्कृत (ग्रुप बी) और अत्यधिक प्रसंस्कृत/अल्ट्रा-प्रोसेस्ड (ग्रुप सी) खाद्य पदार्थों के अंतर को लेबलिंग में ध्यान में रखा जाएगा?
  6. क्या फैट और शुगर की सीमा 29 अक्टूबर, 2021 की सहमति के अनुसार ‘टोटल शुगर’ और ‘सैचुरेटेड फैट’ के आधार पर तय होगी, और ट्रांस-फैट को कैसे शामिल किया जाएगा?
  7. भारतीय उपभोक्ताओं द्वारा लाल रंग को मांसाहारी उत्पाद से जोड़ने की आदत को देखते हुए, क्या एफओपीएल के रंग पर पुनर्विचार करना आवश्यक है?
  8. लाल हेक्सागोन के आयाम क्या होंगे? क्या यह मानकीकृत होगा या पैकेट के क्षेत्रफल के अनुपात में तय होगा, और इसका प्लेसमेंट कैसे होगा?
  9. प्रत्येक पोषक तत्व के लिए अलग सचित्र प्रतीक (चित्र) शामिल किए बिना, एफएसएसएआई विभिन्न साक्षरता स्तरों वाले उपभोक्ताओं तक यह जानकारी कैसे पहुंचाएगा?
  10. प्रत्येक पोषक तत्व के लिए अलग हेक्सागोन लगाने के बजाय दो या अधिक पोषक तत्वों के लिए एक ही संयुक्त हेक्सागोन क्यों प्रस्तावित किया गया है?
  11. एफओपीएल लागू होने के परिणामस्वरूप कृत्रिम प्रिजर्वेटिव्स और रसायनों के संभावित बढ़ते उपयोग को एफएसएसएआई कैसे नियंत्रित करेगा?
  12. अनिवार्य विनियमन अधिसूचित होने के बाद क्या कंपनियों को अनुपालन के लिए कोई स्वैच्छिक अवधि दी जाएगी? यदि हां, तो कितने समय के लिए?
  13. स्कूली स्तर पर पैकेज्ड फूड की पोषण संबंधी जानकारी और एफओपीएल को समझने के लिए केंद्र सरकार पाठ्यक्रम और कार्यशालाओं के माध्यम से क्या कदम उठाने की योजना बना रही है?

अदालत ने एफएसएसएआई को आदेश की तारीख से 10 दिनों के भीतर इन सवालों के जवाब में हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। याचिकाकर्ता को इस हलफनामे का जवाब अगली सुनवाई से पहले दाखिल करने की छूट दी गई है। मामले की अगली सुनवाई 28 सितंबर, 2026 को होगी।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: 3एस एंड अवर हेल्थ सोसाइटी बनाम भारत संघ व अन्य
वाद संख्या: मिसलेनियस एप्लिकेशन संख्या 1177/2025, रिट याचिका (सिविल) संख्या 437/2024 में
पीठ: जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन
निर्णय की तिथि: 10 सितंबर, 2026

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