तलाक के बाद भी पूर्व पत्नी को गुजारा भत्ता देना पति का कानूनी कर्तव्य: कलकत्ता हाईकोर्ट

कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि शादी टूटने या तलाक होने मात्र से किसी व्यक्ति की अपनी पूर्व पत्नी को गुजारा भत्ता (मेंटेनेंस) देने की कानूनी जिम्मेदारी खत्म नहीं होती। कोर्ट ने कहा कि यदि महिला ने दूसरा विवाह नहीं किया है और वह अपना खर्च चलाने में असमर्थ है, तो पति को उसका भरण-पोषण करना ही होगा।

जस्टिस उदय कुमार की एकल पीठ ने महिला को मिलने वाले 1,500 रुपये के मासिक अंतरिम भरण-पोषण को बरकरार रखा, जबकि परिवार की बालिग बेटी के पक्ष में तय किए गए 2,000 रुपये के मासिक भत्ते को खारिज कर दिया। इसके साथ ही अदालत ने पति के खिलाफ जारी वसूली की दंडात्मक कार्रवाई और डिस्ट्रेस वारंट पर रोक लगाते हुए निर्देश दिया कि वह चार सप्ताह के भीतर केवल पत्नी के हिस्से के वास्तविक बकाए का 50 प्रतिशत जमा करे।

तलाकशुदा महिला को कानून का संरक्षण

यह मामला पति की ओर से दायर एक निगरानी (रिवीजन) याचिका पर सामने आया। पति ने निचली अदालत के भरण-पोषण आदेश और उसके बाद शुरू हुई वसूली प्रक्रिया को इस आधार पर चुनौती दी थी कि 2022 में उसे अदालत से एकतरफा (एक्स-पार्टे) तलाक की डिक्री मिल चुकी है, जिससे वैवाहिक संबंध और उससे जुड़ी जिम्मेदारियां समाप्त हो चुकी हैं।

अदालत ने पति के इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि कानून की मंशा पूरी तरह स्पष्ट है। शादी का विघटन—भले ही वह पति द्वारा हासिल की गई डिक्री के तहत हुआ हो—पत्नी के भरण-पोषण के वैधानिक दायित्व को अपने आप खत्म नहीं करता। हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि संबंधित कानून के तहत ‘पत्नी’ की परिभाषा में वह महिला भी शामिल है जिसका पति से तलाक हो चुका है और जिसने दोबारा शादी नहीं की है।

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बालिग बेटी को भरण-पोषण का आदेश अधिकार क्षेत्र से बाहर

हाईकोर्ट ने निचली अदालत द्वारा बेटी को भरण-पोषण दिए जाने के फैसले को अधिकार क्षेत्र से बाहर करार दिया। रिकॉर्ड के अनुसार, बेटी अक्टूबर 2017 में ही बालिग हो चुकी थी, जबकि भरण-पोषण की याचिका 2019 में दाखिल की गई थी।

जस्टिस कुमार ने स्पष्ट किया कि कानूनी प्रावधानों के मुताबिक कोई संतान बालिग होने के बाद केवल तभी मेंटेनेंस की हकदार हो सकती है जब वह किसी शारीरिक या मानसिक अक्षमता अथवा गंभीर चोट के कारण अपना भरण-पोषण करने में लाचार हो। चूंकि बेटी पूरी तरह स्वस्थ थी और उस पर ऐसी कोई अक्षमता लागू नहीं होती थी, इसलिए कोर्ट ने उसके 2,000 रुपये के मासिक भत्ते और उससे जुड़ी वसूली की कार्रवाई को निरस्त कर दिया। अदालत ने यह भी जोड़ा कि एक अविवाहित हिंदू बेटी पर्सनल लॉ के तहत अलग से दीवानी (सिविल) मुकदमा दायर कर पिता से भरण-पोषण की मांग कर सकती है।

कड़े कानूनी कदमों पर सशर्त रोक

वसूली प्रक्रिया पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि अदालती निष्पादन (एक्जीक्यूशन) की कार्यवाही किसी को प्रताड़ित करने का अंधाधुंध जरिया नहीं बननी चाहिए। हालांकि, अदालत ने यह भी साफ किया कि बकाएदार पक्ष अपनी नेकनीयती साबित किए बिना कानूनी प्रक्रिया को रोक नहीं सकता।

मूल भरण-पोषण आदेश 15 अक्टूबर 2019 को पारित हुआ था, जिसमें कुल 3,500 रुपये (पत्नी के लिए 1,500 रुपये और बेटी के लिए 2,000 रुपये) तय किए गए थे। यह आदेश संपत्तियों और देनदारियों के अनिवार्य खुलासे से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देश आने से पहले का था। हाईकोर्ट ने कहा कि पति की वित्तीय स्थिति को लेकर दोनों पक्षों के विरोधाभासी दावों का निपटारा अनुमानों के आधार पर नहीं हो सकता। रिहायशी मकान, बेदखली और व्यापारिक आमदनी से जुड़े विवादित तथ्य नियमित सुनवाई (ट्रायल) का हिस्सा हैं, जिन्हें निगरानी याचिका के दौरान संक्षिप्त सुनवाई में तय नहीं किया जा सकता।

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विवाद और मुकदमों की पृष्ठभूमि

दंपति का विवाह 1995 में हिंदू रीति-रिवाज से हुआ था और उनके दो बच्चे हैं। परिवार शुरुआत में किराए के मकान में रहा। इसके बाद 2001 से 2003 के बीच पत्नी के मायके से मिली आर्थिक मदद से जमीन खरीदी गई और मकान का निर्माण हुआ, जबकि पति ने अपना कारोबार शुरू किया।

आगे चलकर पारिवारिक रिश्तों में गंभीर तनाव पैदा हो गया। जुलाई 2018 में हुए एक विवाद के बाद पत्नी ने मारपीट और तेजाब हमले के आरोपों के तहत पुलिस में मामला दर्ज कराया। इसके जवाब में पति ने भी घर से निकाले जाने का आरोप लगाते हुए क्रॉस-केस किया। इसके बाद संपत्ति और बैंक में बंधक संपत्तियों को लेकर कानूनी विवाद बढ़ गए।

पत्नी ने 2019 में भरण-पोषण की याचिका दाखिल की, जिस पर मजिस्ट्रेट ने अंतरिम आदेश पारित किया। दूसरी तरफ, पति ने विवाह विच्छेद की अर्जी लगाई और 20 जून 2022 को उसके पक्ष में तलाक की एकतरफा डिक्री जारी हो गई। पत्नी ने इस डिक्री को रद्द कराने के लिए अलग अर्जी दी है, जो फिलहाल विचाराधीन है।

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भरण-पोषण की बकाया राशि जमा न होने पर पति ने तलाक का हवाला देकर मामला बंद करने की गुहार लगाई थी, जिसे निचली अदालत ने 6 अक्टूबर 2023 और 2 मार्च 2024 को खारिज कर दिया। इसके बाद 4 अप्रैल 2024 को पति के खिलाफ डिस्ट्रेस वारंट जारी हुए। हाईकोर्ट में पति ने दलील दी कि उसका काम-धंधा छिन चुका है और वह अपनी वृद्ध मां की पेंशन पर आश्रित है, जबकि पत्नी के वकील ने इसका विरोध करते हुए कहा कि वह अब भी अपना कारोबार चला रहा है।

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