राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (एनसीडीआरसी) ने केरल में 2007 में ओवेरियन सिस्ट (अंडाशय की गांठ) की सर्जरी के बाद एक महिला की मौत के मामले में मुआवजे की राशि बढ़ाकर 6 लाख रुपये कर दी है। आयोग ने इलाज करने वाले डॉक्टर और नर्सिंग होम को ऑपरेशन के बाद मरीज की समुचित देखभाल और समय पर जरूरी कदम न उठाने (डेफिशिएंसी इन सर्विस) का जिम्मेदार माना है।
आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) ए. पी. साही और सदस्य भरतकुमार पंड्या की पीठ ने यह फैसला डॉक्टर और नर्सिंग होम की अपील पर 14 अगस्त को सुनाया। इससे पहले केरल राज्य उपभोक्ता आयोग ने 19 मई 2012 को दिए अपने फैसले में डॉक्टर और अस्पताल को चिकित्सकीय लापरवाही का दोषी मानते हुए पीड़िता के बच्चों को 3.75 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया था। राष्ट्रीय आयोग ने राज्य आयोग के आदेश में आंशिक संशोधन करते हुए मुआवजे की रकम में बढ़ोतरी कर दी।
सर्जरी के दौरान लगी चोट सीधे तौर पर लापरवाही नहीं, लेकिन बाद की देखरेख में विफलता: आयोग
एनसीडीआरसी ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि सर्जरी के दौरान यूरेटर (मूत्र नली) में लगी अंदरूनी चोट के लिए सीधे तौर पर डॉक्टर को कानूनी रूप से लापरवाह नहीं ठहराया जा सकता। पीठ ने मेडिकल साहित्यों और दर्ज बयानों का हवाला देते हुए कहा कि पेट या स्त्री रोग संबंधी ऑपरेशनों में यूरेटर को आकस्मिक नुकसान पहुंचना एक ज्ञात चिकित्सीय जोखिम है, विशेषकर तब जब मरीज की पहले भी दो बार एब्डॉमिनल सर्जरी हो चुकी हो और अंदरूनी ऊतकों में खिंचाव या जमाव (डेंस एडिशन्स) मौजूद हो। डॉक्टर को मरीज के इस मेडिकल इतिहास की पूरी जानकारी थी।
हालांकि, आयोग ने रेखांकित किया कि डॉक्टर और नर्सिंग होम इस तथ्य से अनजान नहीं रह सकते थे कि इस तरह की सर्जरी में यूरेटर इंजरी, पेशाब या मवाद का रिसाव और उसके चलते गंभीर संक्रमण फैलने की पूरी आशंका रहती है।
पीठ ने माना कि डॉक्टर के स्तर पर पेशेवर सतर्कता बरतने में स्पष्ट विफलता रही। आयोग के अनुसार, जब मरीज को दोबारा भर्ती कराया गया, तब स्थिति की गंभीरता को भांपते हुए तुरंत किसी यूरोलॉजिस्ट से परामर्श नहीं लिया गया और न ही यूरेटर लीकेज की पुष्टि के लिए तेजी से जरूरी जांचें कराई गईं। पीठ ने कहा कि यद्यपि महिला की मौत के लिए पूरी तरह से अकेले डॉक्टर को उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन इस दुखद अंत में डॉक्टर और नर्सिंग होम के लचर रवैये की भूमिका को पूरी तरह नकारा भी नहीं जा सकता।
मरीज की बिगड़ती हालत और इलाज का घटनाक्रम
शिकायतकर्ता बच्चों के अनुसार, उनकी मां 11 अप्रैल 2007 को पेट में हल्के दर्द की शिकायत लेकर संबंधित स्त्री रोग विशेषज्ञ के पास गई थीं। अल्ट्रासाउंड जांच में उनके दाहिने अंडाशय में एक छोटी गांठ पाई गई। परिजनों का आरोप है कि डॉक्टर ने स्थिति को अत्यंत गंभीर बताते हुए तुरंत सर्जरी कराने की सलाह दी।
यह ऑपरेशन पहले 3 मई 2007 को तय किया गया था, लेकिन अस्पताल ने इसे निर्धारित समय से एक दिन पहले ही 2 मई को कर दिया। परिजनों ने आरोप लगाया कि सर्जरी जरूरी विशेषज्ञों की गैर-मौजूदगी में की गई। ऑपरेशन के फौरन बाद महिला को असहनीय पेट दर्द और लगातार उल्टियों की शिकायत शुरू हो गई।
उचित देखभाल के अभाव के बीच महिला की तबीयत लगातार बिगड़ती रही, इसके बावजूद नर्सिंग होम ने 9 मई 2007 को उन्हें छुट्टी दे दी। घर पर हालत और बिगड़ने पर 14 मई को परिजन उन्हें दोबारा उसी नर्सिंग होम लेकर पहुंचे।
इसके बाद 17 मई 2007 को कराए गए स्कैन में यह सामने आया कि सर्जरी के दौरान उनकी मूत्र नली (यूरेटर) क्षतिग्रस्त हो चुकी थी। अत्यंत नाजुक हालत में उन्हें तत्काल दूसरे अस्पताल में ले जाया गया, जहां उनका सुधारात्मक ऑपरेशन हुआ। इसके बाद भी स्थिति नियंत्रण में नहीं आई और 2 जून को उन्हें तीसरे अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां 6 जून 2007 को सेप्टिसीमिया (रक्त में गंभीर संक्रमण) के कारण उन्होंने दम तोड़ दिया।
आयोग के समक्ष दोनों पक्षों की दलीलें
अपील में डॉक्टर और नर्सिंग होम की पैरवी कर रहे वकील एस. प्रकाश और एन. जी. महेश ने तर्क दिया कि ओवेरियन सिस्ट और पेट दर्द के लिए की गई यह सर्जरी पूरी तरह से स्थापित चिकित्सा मानकों के अनुरूप थी। वकीलों का कहना था कि ऑपरेशन के बाद पैदा हुई जटिलताएं इस तरह के मामलों में पहले से दर्ज मेडिकल रिस्क का हिस्सा थीं, जिन्हें सेवा में कमी या लापरवाही नहीं कहा जा सकता। उन्होंने यह भी दलील दी कि शिकायतकर्ता पक्ष लापरवाही साबित करने के लिए कोई ठोस विशेषज्ञ साक्ष्य पेश नहीं कर सका।
दूसरी ओर, मृतका के बच्चों की ओर से पेश वकील राजन पी. कालियाथ ने राज्य आयोग द्वारा तय किए गए 3.75 लाख रुपये के मुआवजे को बेहद अपर्याप्त बताते हुए इसे बढ़ाने की मांग की। उन्होंने दलील दी कि डॉक्टर और नर्सिंग होम ने यूरेटर के डैमेज होने की बात छुपाई और समय रहते सुधारात्मक उपचार शुरू नहीं किया। यदि समय पर इस क्षति की जानकारी देकर इलाज किया जाता, तो महिला की जान बचाई जा सकती थी।
राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग ने जोर देकर कहा कि चिकित्सकों का यह प्राथमिक कर्तव्य है कि वे मरीजों का सही इलाज सुनिश्चित करें और उनके प्रति पूरी संवेदनशीलता बरतें ताकि उन्हें अनावश्यक पीड़ा न झेलनी पड़े।
उपभोक्ता हेल्पलाइन से सहायता की अपील
उपभोक्ता मामलों के जानकारों के अनुसार, चिकित्सा सेवाओं या अन्य उपभोक्ता सेवाओं में कमी से जुड़ी शिकायतों के समाधान के लिए नागरिक अपने-अपने राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों के उपभोक्ता सेवा केंद्रों से संपर्क कर सकते हैं या राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन (एनसीएच) के टोल-फ्री नंबर 1915 पर सीधे शिकायत दर्ज करा सकते हैं।

