सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को इस अहम कानूनी प्रश्न पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया कि क्या धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के तहत गठित निर्णायक प्राधिकरण (Adjudicating Authority) बिना किसी न्यायिक सदस्य के केवल एक सदस्यीय पीठ के रूप में संपत्तियों की कुर्की और जब्ती के आदेशों की पुष्टि कर सकता है। सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने भारी कार्यभार और सीमित पीठ संख्या के बीच फैसलों में न्यायिक विवेक के वास्तविक इस्तेमाल पर गंभीर सवाल खड़े किए।
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन सदस्यीय विशेष पीठ ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) को यह आधिकारिक डेटा पेश करने का भी निर्देश दिया कि एजेंसी द्वारा दर्ज कुल मुकदमों में से कितने मामलों में वास्तव में ट्रायल शुरू हुआ है, जबकि संपत्ति कुर्की की कार्रवाई सभी मामलों में लागू कर दी जाती है।
अत्यधिक कार्यभार और न्यायिक विवेक के इस्तेमाल पर पीठ के कड़े सवाल
सुनवाई के दौरान पीठ में शामिल जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने ईडी की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल अनिल कौशिक से सीधा सवाल किया कि भारी दबाव और कम समय में प्राधिकरण किस तरह निष्पक्षता और विवेक का इस्तेमाल कर पाता है।
जस्टिस बागची ने कहा कि अदालत एक ऐसे कानून को देख रही है जहां छह महीने (180 दिन) के भीतर एक ट्रिब्यूनल को 3,000 मामलों में अपने विवेक का इस्तेमाल करना होता है। उन्होंने कहा कि कानून सख्त होने की वजह से 180 दिनों की समयसीमा तय की गई है। ऐसे में 1, 2 या 3 सदस्यों वाले ट्रिब्यूनल पर छह महीने में 3,000 से 5,000 मामलों को देखने का कितना बड़ा दबाव होता होगा। जस्टिस बागची ने पूछा कि क्या इतने दबाव में विवेक का कोई वास्तविक इस्तेमाल हो पाता है या फिर यह सिर्फ पहले से तय रेखाओं पर दस्तखत करने भर की औपचारिकता बनकर रह गया है?
दर्ज 8,851 मुकदमों में से सिर्फ 60 मामलों में ही ट्रायल: याचिकाकर्ता
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणन ने ईडी के आधिकारिक आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि एक निश्चित अवधि के दौरान जांच एजेंसी द्वारा दर्ज 8,851 मामलों में से केवल 60 मुकदमों में ही अदालत के समक्ष ट्रायल शुरू हो सका।
उन्होंने दलील दी कि जहां एक तरफ सिर्फ 60 मामले मुकदमे की स्थिति तक पहुंचे, वहीं दूसरी तरफ संपत्ति कुर्की से जुड़े कड़े प्रावधान सभी 8,851 मामलों में लागू कर दिए गए। इसका सीधा परिणाम यह होता है कि मुकदमा शुरू हुए बिना ही प्रभावित पक्षों को दशकों तक गंभीर दीवानी परिणामों और संपत्तियों के नुकसान का सामना करना पड़ता है।
प्राधिकरण में न्यायिक सदस्य की अनिवार्यता और कानूनी प्रावधान
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकील विक्रम चौधरी ने दलील दी कि 180 दिनों की तय समयसीमा के भीतर अंतरिम कुर्की पर निर्णय लेना कोई प्रशासनिक कदम नहीं है, बल्कि यह एक अर्ध-न्यायिक (क्वासी-ज्यूडिशियल) प्रक्रिया है।
उन्होंने अदालत को बताया कि कानून के मुताबिक निर्णायक प्राधिकरण में एक अध्यक्ष और दो अन्य सदस्य होने चाहिए। चौधरी ने विजय मदनलाल चौधरी मामले के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि जब सुप्रीम कोर्ट ने पीएमएलए के तहत ईडी के अधिकारों को वैध ठहराया था, तब अदालत ने यह माना था कि यह प्राधिकरण तीन सदस्यीय निकाय है, जिसका नेतृत्व जिला जज स्तर के अधिकारी करते हैं।
चौधरी ने जोर देकर कहा कि प्राधिकरण में न्यायिक सदस्य की उपस्थिति अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि एक लंबा वक्त ऐसा रहा जब प्राधिकरण केवल एक ही सदस्य के सहारे काम करता रहा और हाल ही में इसमें एक अन्य विधि सदस्य को शामिल किया गया है, हालांकि कानून प्राधिकरण को 1 या 2 सदस्यों की पीठ में बैठने की भी अनुमति देता है।
सभी पक्षों की विस्तृत बहस पूरी होने के बाद सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया।

