गंभीर बीमारी या आपात स्थिति के दौरान इलाज से जुड़े अहम फैसले लेने के लिए समलैंगिक या क्वीयर पार्टनर को अपना प्रतिनिधि चुनने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने दिल्ली हाईकोर्ट में हलफनामा पेश कर स्पष्ट किया है कि केवल लिंग या सेक्शुअल ओरिएंटेशन के आधार पर किसी भी बालिग व्यक्ति को अपने साथी को मेडिकल प्रतिनिधि नामित करने से नहीं रोका जा सकता।
मंत्रालय ने यह जवाब 9 सितंबर को अदालत में दाखिल किया। इससे पहले 20 अगस्त को हुई पिछली सुनवाई में हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार से इस मामले पर जवाब देने में हुई देरी को लेकर सवाल किया था। अदालत में इस मामले की अगली सुनवाई गुरुवार को तय है।
यह पूरा मामला जुलाई 2025 में दाखिल एक याचिका से जुड़ा है। यह याचिका एक समलैंगिक जोड़े ने दायर की थी, जिन्होंने दिसंबर 2023 में न्यूजीलैंड में विवाह किया था। याचिकाकर्ताओं ने अदालत के समक्ष तर्क दिया था कि मौजूदा नियमों में ऐसा कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है, जो गैर-विषमलैंगिक (नॉन-हेटरोसेक्सुअल) जोड़ों को आपात स्थिति या गंभीर इलाज के समय अपने साथी का मेडिकल प्रतिनिधि बनने का कानूनी अधिकार प्रदान करता हो।
कानूनी प्रावधान और मरीज की स्वायत्तता का आधार
स्वास्थ्य मंत्रालय ने अपने जवाब में कहा कि कानूनी और न्यायिक दोनों ही स्तरों पर यह स्पष्ट है कि मेडिकल प्रतिनिधि का केवल जीवनसाथी या सगा संबंधी होना अनिवार्य नहीं है। मानसिक स्वास्थ्य देखभाल कानून (मेंटल हेल्थकेयर एक्ट), 2017 का उदाहरण देते हुए मंत्रालय ने कहा कि कानून किसी भी सक्षम वयस्क को अपने इलाज से जुड़े फैसलों के लिए किसी भी व्यक्ति को अधिकृत करने की अनुमति देता है।
मंत्रालय के अनुसार, यदि कोई सक्षम वयस्क व्यक्ति अपनी असमर्थता की स्थिति के लिए अपने साथी को नामित करता है, तो महज लिंग, सेक्शुअल ओरिएंटेशन या पारंपरिक विवाह के दायरे में न आने के कारण उसे इस अधिकार से बाहर रखने का कोई नैतिक या चिकित्सकीय आधार नहीं बनता, बशर्ते तय कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया जाए।
प्रशासनिक फैसलों में रिश्तों को मिली मान्यता का हवाला
केंद्र सरकार ने इस रुख के समर्थन में विभिन्न मंत्रालयों द्वारा लिए गए पिछले प्रशासनिक फैसलों का भी उल्लेख किया। स्वास्थ्य मंत्रालय ने बताया कि वित्त मंत्रालय ने 2024 में साफ किया था कि समलैंगिक जोड़ों के संयुक्त बैंक खाता खोलने पर कोई कानूनी रोक नहीं है। इसी तरह खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग ने भी ऐसे जोड़ों को राशन कार्ड के उद्देश्य से एक ही परिवार का हिस्सा मानने की मंजूरी दी थी।
मंत्रालय ने कहा कि ये कदम दिखाते हैं कि प्रशासनिक स्तर पर देखभाल, आपसी निर्भरता और जिम्मेदारी के रिश्तों को पारंपरिक पारिवारिक या रक्त संबंधों से परे भी स्वीकार किया गया है। इसी सिद्धांत को आगे बढ़ाते हुए समलैंगिक जोड़ों को मेडिकल प्रतिनिधि नामित करने का अधिकार देना मरीज की व्यक्तिगत स्वायत्तता का सम्मान करने की दिशा में एक स्वाभाविक और तार्किक कदम है।
विवाह और कानूनी ‘स्पाउस’ के दर्जे से अलग है यह अधिकार
स्वास्थ्य मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि इलाज संबंधी फैसलों में अधिकार देने का यह मतलब नहीं है कि इसे वैवाहिक मान्यता माना जाए। भारतीय विवाह कानूनों के तहत ‘स्पाउस’ (जीवनसाथी) शब्द केवल विषमलैंगिक जोड़ों पर ही लागू होता है। इस संबंध में मंत्रालय ने समलैंगिक विवाह को कानूनी दर्जा देने से इनकार करने वाले सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ के 2023 के फैसले का भी हवाला दिया।
इससे पहले आयकर विभाग भी बॉम्बे और कर्नाटक हाईकोर्ट में दायर उन याचिकाओं का विरोध कर चुका है, जिनमें जीवनसाथी के बीच उपहारों पर टैक्स छूट के नियम के तहत ‘स्पाउस’ शब्द के दायरे को बढ़ाने की मांग की गई थी। आयकर विभाग ने भी यही रेखांकित किया था कि भारतीय वैवाहिक कानूनों में यह दर्जा केवल विषमलैंगिक जोड़ों तक ही सीमित है।

