ट्रेन डकैती पर उपभोक्ता आयोग का सख्त फैसला: रेलवे की सेवा में कमी करार, 22 साल बाद यात्रियों को मुआवजे का आदेश

चलती ट्रेन के आरक्षित कोच में यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित न कर पाने को राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (एनसीडीआरसी) ने रेलवे की सेवा में गंभीर कमी माना है। आयोग ने 22 साल पुराने एक मामले में फैसला सुनाते हुए पीड़ित पिता-पुत्री को छह फीसदी ब्याज सहित 20,000 रुपये का एकमुश्त मुआवजा देने का आदेश दिया है।

एनसीडीआरसी के अध्यक्ष जस्टिस ए. पी. साही और सदस्य भरतकुमार पंड्या की पीठ ने यह फैसला 31 अगस्त को सुनाया। आयोग उत्तर प्रदेश राज्य उपभोक्ता आयोग के एक पूर्व आदेश के खिलाफ सुरेंद्र पाल सिंह और उनकी बेटी प्रीति द्वारा दायर निगरानी याचिका पर सुनवाई कर रहा था।

आरक्षित कोच में यात्रियों की पुख्ता सुरक्षा जरूरी

यह वारदात 28 अगस्त 2004 के तड़के घटी थी, जब दोनों यात्री अवध-असम एक्सप्रेस के स्लीपर कोच एस-8 में हापुड़ से गुवाहाटी का सफर कर रहे थे। उसी दौरान हथियारबंद लुटेरे कोच में घुस आए और उन्होंने लूटपाट की। आयोग ने टिप्पणी की कि आरक्षित डिब्बे में यात्रा करने वाले मुसाफिरों की यह वाजिब उम्मीद होती है कि रेलवे प्रशासन उनकी हिफाजत के लिए उचित और ठोस बंदोबस्त करेगा।

उपभोक्ता मामलों में लागू संभावनाओं के संतुलन के सिद्धांत के आधार पर पीठ ने पाया कि घटना के वक्त कोच में न तो कोई अटेंडेंट मौजूद था और न ही कोई सुरक्षा एस्कॉर्ट। इसके अलावा हथियारबंद गिरोह काफी देर तक कोच के भीतर बेखौफ बना रहा और डकैती के बाद बिना किसी रोकटोक के फरार हो गया। आयोग ने माना कि ये तथ्य रेलवे प्रशासन की तरफ से सेवा में कोताही साबित करने के लिए पर्याप्त आधार हैं।

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उपभोक्ता फोरम के अधिकार क्षेत्र पर मुहर

मुकदमे के दौरान रेलवे प्रशासन ने तर्क दिया था कि डकैती की यह घटना रेलवे एक्ट के तहत ‘अप्रिय घटना’ की श्रेणी में आती है, लिहाजा इस तरह के मामलों पर सुनवाई का विशेषाधिकार केवल रेलवे दावा अधिकरण के पास है। रेलवे ने इस आधार पर उपभोक्ता आयोग के अधिकार क्षेत्र पर सवाल उठाया।

राष्ट्रीय आयोग ने रेलवे की इस दलील को खारिज कर दिया। आयोग ने स्पष्ट किया कि जब विवाद आरक्षित डिब्बों के भीतर सुरक्षा देने में रेलवे की नाकामी से जुड़ा हो, तो पीड़ित यात्रियों को उपभोक्ता संरक्षण कानून के तहत शिकायत दर्ज करने का पूरा कानूनी हक है। पीठ ने यह भी रेखांकित किया कि राज्य आयोग ने भी पूर्व में उपभोक्ता मंच के अधिकार क्षेत्र को सही ठहराया था।

रात के सुरक्षा नियमों का उल्लंघन

फैसले के आधार में आयोग ने रात के समय यात्रियों की हिफाजत को लेकर रेलवे के अपने प्रशासनिक निर्देशों का हवाला दिया। इन नियमों के मुताबिक रात 10 बजे से सुबह 6 बजे के बीच आरक्षित कोचों के दरवाजों को बंद और सुरक्षित रखना अनिवार्य है। साथ ही डिब्बों में टीटीई और रेलवे सुरक्षा बल (आरपीएफ) के जवानों की मौजूदगी भी जरूरी है।

आयोग ने निष्कर्ष निकाला कि रेलवे के आंतरिक सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन नहीं किया गया, जिससे बुनियादी सुरक्षा तंत्र पूरी तरह चरमरा गया। सुरक्षा की इस चूक के चलते प्रभावित यात्री उपभोक्ता मंच से राहत पाने के हकदार हैं।

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सबूत के अभाव में दावे की पूरी राशि नामंजूर

रेलवे की जवाबदेही तय करने के बावजूद एनसीडीआरसी ने याचिकाकर्ताओं द्वारा मांगी गई 59,725 रुपये की पूरी क्षतिपूर्ति राशि को स्वीकार नहीं किया। यात्रियों ने लूटी गई नकदी और आभूषणों के बदले इस रकम का दावा किया था।

पीठ ने पाया कि शिकायतकर्ता लूटी गई संपत्ति का सही मूल्यांकन तय कानूनी मानकों के अनुरूप सिद्ध नहीं कर सके। साथ ही, दावों में विसंगतियां थीं, लूटा गया सामान बरामद नहीं हो सका था और मूल्य निर्धारण के लिए आवश्यक दस्तावेजी प्रमाण भी मौजूद नहीं थे।

आयोग ने कहा कि रेलवे की प्रशासनिक खामी, यात्रियों द्वारा झेली गई लंबी मानसिक प्रताड़ना व असुविधा तथा चोरी गए सामान के सही मूल्य पर बनी अनिश्चितता को देखते हुए 20,000 रुपये का मुश्त मुआवजा पूरी तरह न्यायसंगत, उचित और आनुपातिक है। यह राशि सामान के नुकसान, मानसिक संताप और मुकदमेबाजी के खर्च की भरपाई के रूप में छह प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ अदा की जाएगी।

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