मानसिक बीमारी के आधार पर पत्नी को गुजारा भत्ता देने से नहीं बच सकता पति: झारखंड हाईकोर्ट

झारखंड हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि मानसिक बीमारी से पीड़ित किसी भी व्यक्ति को स्वतः ही आजीविका कमाने या निर्णय लेने में असमर्थ नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने साफ तौर पर कहा कि ऐसी बीमारी का निदान होने मात्र से कोई भी व्यक्ति अपनी अलग रह रही पत्नी को गुजारा भत्ता देने की कानूनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो जाता।

जस्टिस अनिल कुमार चौधरी की पीठ ने एक व्यक्ति की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उसने पारिवारिक अदालत के फैसले को चुनौती दी थी। पारिवारिक अदालत ने उसे अपनी पत्नी को हर महीने 3,000 रुपये का अंतरिम गुजारा भत्ता देना जारी रखने का निर्देश दिया था। हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले में कोई कानूनी खामी नहीं पाई और कहा कि हल्की, मध्यम या सीमांत मानसिक मंदता जैसी स्थितियों से पीड़ित लोग भी सामान्य सामाजिक परिस्थितियों में जीवन जीने में पूरी तरह सक्षम होते हैं।

हाईकोर्ट ने 7 जुलाई को जारी अपने आदेश में रेखांकित किया कि मानसिक बीमारी को एक ऐसी जन्मजात अक्षमता के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए जो किसी व्यक्ति को अपने व्यक्तिगत मामलों का प्रबंधन करने या अपने कानूनी मामलों की पैरवी करने से रोकती हो।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद दिसंबर 2021 के एक निर्देश से शुरू हुआ था, जिसमें पति को अपनी पत्नी को हर महीने 3,000 रुपये अंतरिम गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया गया था। अभियोजन पक्ष के अनुसार, पति ने जुलाई 2024 से इस भत्ते का भुगतान करना बंद कर दिया था।

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इसके बाद, उसने पारिवारिक अदालत में एक आवेदन दायर कर बकाया राशि के भुगतान से पूरी तरह छूट देने की गुहार लगाई। याचिकाकर्ता का तर्क था कि मानसिक बीमारी से पीड़ित होने के कारण उसे बकाया राशि का भुगतान करने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए और न ही भुगतान न करने पर उसके खिलाफ कोई प्रतिकूल कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए।

पारिवारिक अदालत ने अगस्त 2025 में इस याचिका को खारिज कर दिया था। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों और मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 का अध्ययन करने के बाद पाया कि यद्यपि पति को मानसिक बीमारी थी, लेकिन सही दवाओं के सेवन से उसकी स्थिति में काफी सुधार हुआ था। अदालत ने माना कि ऐसा कोई भी रिकॉर्ड या सबूत मौजूद नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि वह कमाने में अक्षम है या अपने हितों की रक्षा करने में असमर्थ है।

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अदालत में दोनों पक्षों की दलीलें

हाईकोर्ट में पति का पक्ष रखते हुए अधिवक्ता राहुल पांडेय ने दलील दी कि पारिवारिक अदालत ने याचिकाकर्ता की मानसिक बीमारी को स्वीकार करने के बावजूद उसकी अर्जी को बेहद यांत्रिक तरीके से खारिज कर दिया, जो कि न्यायिक रूप से त्रुटिपूर्ण है।

इसके विपरीत, राज्य सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे अपर लोक अभियोजक मनोज कुमार मिश्रा ने अदालत को बताया कि पेश किए गए चिकित्सकीय दस्तावेज केवल बीमारी के अस्तित्व को दर्शाते हैं। उन्होंने तर्क दिया कि अतीत या वर्तमान का कोई भी चिकित्सकीय निदान तब तक गुजारा भत्ता न देने का आधार नहीं बन सकता, जब तक कि स्पष्ट साक्ष्यों से यह साबित न हो जाए कि वह व्यक्ति अपनी आजीविका चलाने या अपने मामलों का प्रबंधन करने में पूरी तरह लाचार है।

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