सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि मोटर दुर्घटना के दावों से जुड़े मामलों का फैसला ‘संभावनाओं की प्रबलता’ (प्रीपॉन्डरेंस ऑफ प्रोबेबिलिटीज) के आधार पर किया जाना चाहिए, न कि आपराधिक मुकदमों की तरह ‘संदेह से परे सबूत’ के सख्त मानक पर। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट और मोटर दुर्घटना दावा ट्रिब्यूनल, जालौन (उरई) के दावों को खारिज करने वाले पुराने आदेशों को रद्द कर दिया। कोर्ट ने साल 2002 में एक सड़क दुर्घटना में अपनी जान गंवाने वाले तीन शिक्षकों के परिवारों को बड़ी राहत देते हुए भारी मुआवजे का भुगतान करने का निर्देश दिया है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 30 जनवरी 2002 की रात करीब 10:00 बजे हुए एक भयानक सड़क हादसे से जुड़ा है। एक मारुति कार (रजिस्ट्रेशन नंबर UP-92A-2223) इलाहाबाद से उरई की तरफ जा रही थी। कार को माता प्रसाद चला रहे थे और उसमें अजीत सिंह, रूप सिंह और डॉ. दिलीप कुमार कटियार सवार थे। सरसौल थाने के पास कार की टक्कर एक भारी टैंकर (रजिस्ट्रेशन नंबर UP-81E-6258) से हो गई, जिसे विनोद कुमार चला रहा था।
यह टक्कर इतनी भीषण थी कि माता प्रसाद, अजीत सिंह और रूप सिंह की दुर्घटना के कारण लगी चोटों की वजह से मौत हो गई, जबकि डॉ. दिलीप कुमार कटियार गंभीर रूप से घायल हो गए। मृत तीनों व्यक्ति स्कूल शिक्षक थे और अपने-अपने परिवारों के एकमात्र कमाने वाले थे। उस समय उनकी मासिक आय क्रमशः 10,071 रुपये, 10,345 रुपये और 9,708 रुपये थी। उनके कानूनी वारिसों ने मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की धारा 166 के तहत मुआवजे के लिए अलग-अलग दावा याचिकाएं दायर की थीं।
पक्षों की दलीलें
दावेदारों का शुरू से ही यह तर्क था कि दुर्घटना पूरी तरह से टैंकर चालक की लापरवाही और तेज गति से गाड़ी चलाने के कारण हुई थी, और मारुति कार के चालक की इसमें कोई गलती नहीं थी।
इसके विपरीत, प्रतिवादियों (टैंकर मालिक और बीमा कंपनी) का दावा था कि टैंकर सड़क के बाईं ओर खड़ा था क्योंकि उसका कंडक्टर शौच के लिए गया हुआ था। उन्होंने आरोप लगाया कि मारुति कार गलत दिशा में बहुत तेज गति और लापरवाही से चलाई जा रही थी, जिसके कारण वह सीधे खड़े टैंकर से टकरा गई।
ट्रिब्यूनल ने प्रतिवादियों की दलीलों को स्वीकार करते हुए दावों को खारिज कर दिया और केवल ‘बिना किसी गलती के दायित्व’ (नो फॉल्ट लायबिलिटी) के तहत एक मूल राहत राशि देने का आदेश दिया। ट्रिब्यूनल ने इसके लिए मुख्य रूप से दुर्घटना के बाद की तस्वीरों (प्रदर्श 3 और 4) को आधार बनाया, जिसमें टैंकर सड़क के बाईं ओर और कार गलत दिशा में खड़ी दिखाई दे रही थी। बाद में हाईकोर्ट ने भी इसी फैसले की पुष्टि की थी।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर गहराई से विचार किया कि मोटर दुर्घटना के दावों में सबूत का मानक क्या होना चाहिए। कोर्ट ने रेखांकित किया कि ट्रिब्यूनल कोई आपराधिक अदालत नहीं है, इसलिए उसे नागरिक दायित्व तय करते समय आपराधिक मानकों को लागू नहीं करना चाहिए। अदालत ने ‘सिथारा एन.एस. बनाम साई राम जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड (2025)’ और ‘प्रभावती बनाम प्रबंध निदेशक, बैंगलोर मेट्रोपॉलिटन ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन (2025)’ जैसे मामलों का हवाला दिया। पीठ ने ‘सुनीता बनाम राजस्थान एसआरटीसी (2020)’ और ‘राजवती उर्फ रज्जो बनाम यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड (2022)’ के सिद्धांतों को दोहराते हुए कहा कि:
“मोटर दुर्घटना दावों के मामलों में ध्यान रखने योग्य सबूत का मानक संभावनाओं की प्रबलता का होना चाहिए, न कि संदेह से परे सबूत का सख्त मानक, जो आपराधिक मामलों में अपनाया जाता है।”
इस मानक के आधार पर कोर्ट ने एकमात्र जीवित प्रत्यक्षदर्शी डॉ. कटियार की गवाही को पूरी तरह से विश्वसनीय माना। उन्होंने गवाही दी थी कि कार अपनी सही दिशा में नियंत्रित गति से चल रही थी और सामने से आ रहे तेज रफ्तार टैंकर ने उसे टक्कर मार दी थी।
इसके विपरीत, सुप्रीम कोर्ट ने प्रतिवादियों के सबूतों को पूरी तरह से संदेहास्पद पाया। टैंकर के मालिक ने स्वीकार किया था कि दुर्घटना स्थल की तस्वीरें हादसे के 10 से 12 घंटे बाद ली गई थीं, जिसका मतलब है कि वे टक्कर के समय वाहनों की वास्तविक स्थिति को नहीं दर्शाती थीं। इसके अलावा, प्रतिवादी इस मामले के सबसे महत्वपूर्ण गवाह—टैंकर के कंडक्टर—को गवाही के लिए कोर्ट में पेश करने में विफल रहे और इसका कोई स्पष्टीकरण भी नहीं दिया। इस पर कोर्ट ने प्रतिवादियों के खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष निकाला।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अगर मान लिया जाए कि टैंकर सड़क पर खड़ा था, तो भी जनवरी की अंधेरी रात में बिना किसी पार्किंग लाइट, हैजर्ड इंडिकेटर या चेतावनी संकेतक के एक भारी वाहन को हाईवे पर खड़ा करना गंभीर लापरवाही है। कोर्ट ने टिप्पणी की:
“रात के समय किसी सार्वजनिक सड़क पर बिना पर्याप्त चेतावनी संकेत के एक भारी वाहन खड़ा करना, जैसा कि इस मामले में है, अपने आप में लापरवाही है।”
न्यायालय ने ‘रेस इप्सा लोक्विटुर’ (घटना स्वयं बोलती है) का सिद्धांत लागू करते हुए कहा कि अब यह साबित करने की जिम्मेदारी प्रतिवादियों पर थी कि उन्होंने पर्याप्त सुरक्षा उपाय किए थे, जिसे वे साबित नहीं कर पाए। पुलिस द्वारा टैंकर चालक के खिलाफ चार्जशीट दाखिल किया जाना भी दावेदारों के पक्ष को मजबूत करता है।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
यह मानते हुए कि “ट्रिब्यूनल द्वारा दर्ज किए गए और हाईकोर्ट द्वारा पुष्टि किए गए समवर्ती निष्कर्ष कानून की नजर में विकृत और असमर्थनीय हैं”, सुप्रीम कोर्ट ने पुराने फैसलों को निरस्त कर दिया।
मुआवजे की राशि तय करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने ‘सरला वर्मा बनाम दिल्ली ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन (2009)’ और ‘नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम प्रणय सेठी (2017)’ के स्थापित दिशा-निर्देशों का पालन किया। कोर्ट ने 22 फरवरी 2026 तक की अवधि के लिए 9% ब्याज शामिल करते हुए (नो फॉल्ट लायबिलिटी के तहत मिले 50,000 रुपये घटाकर) निम्नलिखित अंतिम मुआवजा तय किया:
- मंजू सिंह (एसएलपी सी संख्या 10565/2025): कुल 65,58,449.30 रुपये का मुआवजा।
- एसएलपी सी संख्या 33539/2025: कुल 41,66,829.68 रुपये का मुआवजा।
- एसएलपी सी संख्या 33538/2025: कुल 35,36,132.78 रुपये का मुआवजा।
सुप्रीम कोर्ट ने प्रतिवादी बीमा कंपनी को निर्देश दिया कि वह आठ सप्ताह के भीतर मुआवजे की यह राशि सीधे दावेदारों के बैंक खातों में जमा करे। इसके साथ ही दावेदार अपनी याचिका दायर करने की तिथि से लेकर पूरी राशि मिलने तक 6% वार्षिक की दर से ब्याज पाने के भी हकदार होंगे।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: मंजू सिंह बनाम अविनाश सिंह और अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 2026 एसएलपी सी संख्या 10565 /2025
पीठ: जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली
निर्णय की तिथि: 13 जुलाई 2026

