बॉम्बे हाईकोर्ट ने सोमवार को बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) को एक बच्ची का नया जन्म प्रमाण पत्र जारी करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने आदेश दिया कि बच्ची के जन्म प्रमाण पत्र के पिता वाले कॉलम से महिला के पूर्व पति का नाम हटाया जाए और उसकी जगह उसके जैविक पिता का नाम दर्ज किया जाए। हाईकोर्ट ने यह फैसला बच्ची के डीएनए टेस्ट (पितृत्व जांच) की रिपोर्ट और उसके जैविक माता-पिता के संयुक्त हलफनामे को आधार मानते हुए सुनाया।
एक्टिंग चीफ जस्टिस रवींद्र घुगे और जस्टिस रंजीतसिन्हा भोंसले की खंडपीठ ने महिला की याचिका को स्वीकार करते हुए यह आदेश जारी किया। बीएमसी द्वारा जन्म प्रमाण पत्र में सुधार के आवेदन को खारिज किए जाने के बाद, महिला ने अपने वकील उदय वारुंजिकर के माध्यम से हाईकोर्ट का रुख किया था।
आपसी अनबन और तलाक का घटनाक्रम
न्यायालय में पेश किए गए दस्तावेजों के अनुसार, याचिकाकर्ता महिला की शादी फरवरी 2006 में हुई थी, लेकिन इस शादी से कोई संतान नहीं हुई। आपसी मतभेदों के चलते जल्द ही दोनों अलग रहने लगे। इसी अलगाव के दौरान, कानूनी रूप से तलाक की डिक्री मिलने से पहले ही महिला अपने एक पुरुष मित्र के साथ रिश्ते में आ गई।
दिसंबर 2009 में महिला ने एक बच्ची को जन्म दिया। चूंकि बच्ची के जन्म के समय महिला कानूनी रूप से विवाहित थी, इसलिए मार्च 2010 में जारी हुए जन्म प्रमाण पत्र में उसने पिता के स्थान पर अपने तत्कालीन पति का नाम दर्ज कराया था।
डीएनए रिपोर्ट से साबित हुई सच्चाई
साल 2013 में महिला का अपने पहले पति से कानूनी रूप से तलाक मंजूर हो गया। इसके बाद उसने अपने उस साथी से शादी कर ली, जिससे उसकी बेटी पैदा हुई थी। शादी के बाद महिला ने बच्ची के जन्म प्रमाण पत्र में जैविक पिता का नाम दर्ज कराने के लिए बीएमसी से संपर्क किया।
बीएमसी द्वारा इस मांग को ठुकराए जाने के बाद महिला ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की। अपनी बात को साबित करने के लिए उन्होंने अदालत में बच्ची की डीएनए जांच रिपोर्ट और एक संयुक्त हलफनामा प्रस्तुत किया, जिसमें उनके वर्तमान पति को बच्ची का जैविक पिता बताया गया था। हाईकोर्ट ने इन सबूतों को स्वीकार करते हुए बीएमसी को तुरंत रिकॉर्ड में सुधार करने का आदेश दिया।

