अदालती आदेश के उल्लंघन का मामला: कर्नाटक हाईकोर्ट ने पावर टीवी के एमडी की सजा घटाकर एक दिन की, माफी मांगने और हर्जाना देने का निर्देश

कर्नाटक हाईकोर्ट ने पावर टीवी के प्रबंध निदेशक (एमडी) राकेश संजीव शेट्टी को सुनाई गई तीन महीने की जेल की सजा को घटाकर केवल एक दिन कर दिया है। यह सजा उन्हें एक अंतरिम अदालती आदेश की अवहेलना करने के मामले में दी गई थी, जिसमें चैनल को आईपीएस अधिकारी डॉ. बी. आर. रविकांतगौड़ा के खिलाफ किसी भी तरह की अपमानजनक सामग्री प्रसारित करने से रोका गया था। 10 जुलाई को मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस के. एस. हेमालेखा की एकल पीठ ने सजा में यह राहत कुछ कड़े दिशा-निर्देशों और शर्तों के साथ दी है।

सजा में कटौती के लिए अदालत की शर्तें

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि राकेश संजीव शेट्टी की सजा में यह कटौती तभी लागू होगी जब वे निम्नलिखित शर्तों का पालन करेंगे:

  • उन्हें ट्रायल कोर्ट के समक्ष एक हलफनामा दायर करना होगा, जिसमें वे 8 सितंबर 2023 को जारी निषेधाज्ञा आदेश का कड़ाई से पालन करने का वचन देंगे।
  • पावर टीवी चैनल पर उन्हें एक माफीनामा प्रसारित करना होगा, जिसमें अदालत के आदेश का उल्लंघन करने और पूर्व में दिखाए गए अपमानजनक कार्यक्रमों के लिए खेद प्रकट किया जाएगा।
  • उन्हें पीड़ित आईपीएस अधिकारी डॉ. रविकांतगौड़ा को चार सप्ताह के भीतर हर्जाने के रूप में 50,000 रुपये का भुगतान करना होगा।
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क्या है पूरा मामला

यह विवाद तब शुरू हुआ जब बेंगलुरु ग्रामीण की एक सिविल कोर्ट ने 8 सितंबर 2023 को एक अंतरिम आदेश जारी कर पावर टीवी को आईपीएस अधिकारी डॉ. रविकांतगौड़ा के खिलाफ मानहानि करने वाली सामग्री प्रसारित करने से रोक दिया था। इसके बावजूद, चैनल ने 22 और 23 सितंबर 2023 को उनके खिलाफ कथित रूप से आपत्तिजनक कार्यक्रम दिखाए।

आईपीएस अधिकारी की शिकायत पर सुनवाई करते हुए, ट्रायल कोर्ट ने 6 जनवरी को राकेश संजीव शेट्टी को जानबूझकर अदालती आदेश की अवहेलना करने का दोषी पाया। कोर्ट ने सिविल प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) के आदेश 39 नियम 2ए और धारा 151 के तहत उन्हें तीन महीने के लिए सिविल जेल भेजने का आदेश दिया था। शेट्टी ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

दायित्व से बचने की दलीलें खारिज

शेट्टी ने हाईकोर्ट में दलील दी कि मूल मुकदमा मुख्य रूप से चैनल के संपादकीय कामकाज के खिलाफ था, न कि व्यक्तिगत रूप से उनके खिलाफ। उन्होंने कहा कि चूंकि वे प्रबंध निदेशक हैं और संपादकीय निर्णयों में सीधे तौर पर उनकी भूमिका साबित करने वाले कोई सबूत नहीं हैं, इसलिए उन्हें व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जाना चाहिए।

हालांकि, जस्टिस हेमालेखा ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने ध्यान दिलाया कि शेट्टी इस मुकदमे में प्रतिवादी नंबर 52 के रूप में शामिल थे और उन्होंने स्वयं लिखित जवाब दाखिल करने के साथ-साथ अंतरिम रोक हटाने की अर्जी भी दी थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब किसी संस्था के खिलाफ निषेधाज्ञा लागू होती है, तो उसके प्रबंधन और संचालन के लिए जिम्मेदार हर व्यक्ति पर आदेश का पालन करने का दायित्व होता है।

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पत्रकारिता के अधिकार की सीमाएं

चैनल की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि यह प्रसारण उन्हें मिली शिकायतों के आधार पर जनहित में की गई पत्रकारिता का हिस्सा था। अदालत ने इस दलील को भी खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि यदि कोई अदालती आदेश प्रभावी है, तो केवल शिकायतों के मिलने मात्र से किसी मीडिया संस्थान को किसी व्यक्ति की छवि बिगाड़ने का अधिकार नहीं मिल जाता। यदि चैनल को किसी प्रकार का संदेह था, तो उसे अपनी मर्जी से व्याख्या करने के बजाय स्पष्टीकरण के लिए कोर्ट से संपर्क करना चाहिए था।

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अभिव्यक्ति की आजादी बनाम प्रतिष्ठा का अधिकार

अदालत ने अपने फैसले में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यक्तिगत सम्मान के बीच संतुलन की आवश्यकता को रेखांकित किया। कोर्ट ने कहा कि हालांकि संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत प्रेस की स्वतंत्रता लोकतंत्र के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, लेकिन यह अधिकार असीमित नहीं है और इस पर उचित प्रतिबंध लागू होते हैं।

कोर्ट ने जोर देकर कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाले सम्मानजनक जीवन जीने के अधिकार में प्रतिष्ठा का अधिकार भी शामिल है। अदालत ने चेतावनी दी कि यदि पक्षों को अपनी मर्जी से न्यायिक आदेशों की अनदेखी करने की अनुमति दी गई, तो इससे कानून का शासन गंभीर रूप से प्रभावित होगा और न्याय प्रणाली में जनता का विश्वास कमजोर होगा।

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