दिल्ली राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि साइबर धोखाधड़ी के मामलों में बैंक तब तक अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकते, जब तक वे यह साबित न कर दें कि ग्राहक की तरफ से कोई लापरवाही हुई थी। इसके साथ ही आयोग ने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) की उस अपील को खारिज कर दिया, जिसमें जिला उपभोक्ता फोरम के आदेश को चुनौती दी गई थी। आयोग ने बैंक को निर्देश दिया है कि वह धोखाधड़ी के शिकार हुए एक बुजुर्ग ग्राहक को मुआवजे के रूप में 55,000 रुपये का भुगतान करे।
धोखाधड़ी और बैंक की टालमटोल
यह मामला दिल्ली के रहने वाले और पेशे से वकील एक वरिष्ठ नागरिक जी नटराजन से जुड़ा है, जिनका साल 2011 से एसबीआई में बचत खाता है। 12 जुलाई 2021 को उनके पास ग्राहक प्रोफाइल (केवाईसी) अपडेट करने का झांसा देकर एक फर्जी लिंक भेजा गया। इस लिंक पर क्लिक करते ही उनके खाते से झारखंड के जमशेदपुर में एक एटीएम से 20,000 रुपये निकाल लिए गए और इसके कुछ ही मिनटों के भीतर उनके खाते से 25,000 रुपये ऑनलाइन ट्रांसफर कर दिए गए। कुल मिलाकर उनके खाते से 45,000 रुपये की डिजिटल चोरी हुई। नटराजन ने बताया कि इस घटना के समय वे दिल्ली में ही थे और उन्हें इस खाते के लिए कभी कोई एटीएम कार्ड भी जारी नहीं किया गया था।
शिकायत पर कार्रवाई में देरी
नटराजन ने घटना वाले दिन ही बैंक को इसकी जानकारी दी और उन्हें शिकायत दर्ज होने की रसीद भी मिल गई। इसके बावजूद बैंक ने मामले को सुलझाने के लिए कोई कदम नहीं उठाया। घटना के सात महीने से भी अधिक समय बीत जाने के बाद, बैंक ने उनसे गृह शाखा (होम ब्रांच) में जाकर कागजात जमा करने को कहा। उन्होंने 7 अप्रैल 2022 को औपचारिक दावा फॉर्म भरा और बैंक को कानूनी नोटिस भी भेजा, लेकिन बैंक ने न तो उनके पैसे लौटाए और न ही इस धोखाधड़ी के लिए जिम्मेदारी तय की। आखिरकार, उन्होंने जिला उपभोक्ता विवाद निवारण फोरम का दरवाजा खटखटाया।
जिला फोरम का आदेश और एसबीआई की दलील
जिला उपभोक्ता फोरम ने 5 दिसंबर 2023 को दिए अपने फैसले में बैंक को सेवा में कोताही (डेफिशिएंसी इन सर्विस) का दोषी पाया। जिला फोरम ने एसबीआई को आदेश दिया कि वह चोरी की गई 45,000 रुपये की राशि पर चोरी की तारीख से सात प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ ग्राहक को लौटाए। इसके अलावा, मानसिक परेशानी और अदालती खर्च के मुआवजे के रूप में 10,000 रुपये का भुगतान करने का भी निर्देश दिया गया। फोरम ने यह भी चेतावनी दी थी कि यदि इस राशि का भुगतान 30 दिनों के भीतर नहीं किया गया, तो बैंक को नौ प्रतिशत की दर से ब्याज देना होगा।
एसबीआई ने इस फैसले के खिलाफ राज्य उपभोक्ता आयोग में अपील दायर की। बैंक का तर्क था कि जिला फोरम ने अनधिकृत इलेक्ट्रॉनिक बैंकिंग लेनदेन से जुड़े भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के 6 जुलाई 2017 के दिशानिर्देशों की गलत व्याख्या की है। बैंक ने दावा किया कि नटराजन ने खुद अपनी बैंकिंग जानकारी किसी अनजान व्यक्ति के साथ साझा की थी और चूंकि वे एक वकील हैं, इसलिए उन्हें अधिक सावधानी बरतनी चाहिए थी। बैंक ने पूरी जिम्मेदारी ग्राहक की लापरवाही पर डालने की कोशिश की।
राज्य आयोग का फैसला और एसबीआई को फटकार
राज्य आयोग की अध्यक्ष जस्टिस संगीता धींगड़ा सहगल और सदस्य बिमला कुमारी की पीठ ने एसबीआई के इन दावों को पूरी तरह खारिज कर दिया। आयोग ने कहा कि बैंक के दावे केवल मौखिक आरोपों की तरह हैं, जिन्हें साबित करने के लिए कोई ठोस दस्तावेजी सबूत पेश नहीं किया गया। बैंक यह दिखाने में पूरी तरह नाकाम रहा कि ग्राहक ने किसी के साथ अपना पासवर्ड, पिन या वन-टाइम पासवर्ड (ओटीपी) साझा किया था।
आयोग ने आरबीआई के 6 जुलाई 2017 के सर्कुलर की धारा 12 का हवाला देते हुए दोहराया कि अनधिकृत लेनदेन के मामलों में ग्राहक की लापरवाही साबित करने की पूरी जिम्मेदारी बैंक की होती है। चूंकि ग्राहक ने घटना के दिन ही धोखाधड़ी की रिपोर्ट दर्ज करा दी थी, इसलिए वे आरबीआई के ‘शून्य देयता’ (जीरो लायबिलिटी) नियम के तहत पूरी सुरक्षा के हकदार हैं। पीठ ने बैंक की इस बात के लिए भी आलोचना की कि उसने तय 90 दिनों के भीतर न तो शिकायत की जांच की और न ही इस पर कोई अंतिम फैसला लिया। आयोग ने माना कि बैंक का यह ढुलमुल रवैया उपभोक्ता संरक्षण कानूनों के तहत सेवा में गंभीर कमी को दर्शाता है।
उपभोक्ताओं के लिए मददगार जानकारी
यदि कोई उपभोक्ता इस तरह की धोखाधड़ी या सेवा में कमी का सामना कर रहा है, तो वह अपने राज्य के उपभोक्ता हेल्पलाइन से संपर्क कर सकता है। इसके अलावा, राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन के टोल-फ्री नंबर 1800-11-4000 या शॉर्ट कोड 1915 पर कॉल करके भी मदद ली जा सकती है।

