सुप्रीम कोर्ट ने एक तलाक मामले में अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि एक शिक्षित महिला द्वारा अपना करियर बनाने के प्रयास को ‘क्रूरता’ (Cruelty) या ‘परित्याग’ (Desertion) नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने फैमिली कोर्ट और हाईकोर्ट के उस दृष्टिकोण को “दकियानूसी” और “प्रतिगामी” करार दिया, जिसमें पत्नी द्वारा क्लिनिक चलाने और बच्चे के स्वास्थ्य के लिए अलग रहने को वैवाहिक अपराध माना गया था।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने विवाह विच्छेद की डिक्री को ‘रिश्ते के पूरी तरह टूटने’ (Irretrievable Breakdown of Marriage) के आधार पर बरकरार रखा, लेकिन पत्नी के खिलाफ की गई तमाम प्रतिकूल टिप्पणियों को रिकॉर्ड से हटाने का आदेश दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
अपीलकर्ता एन सौरभ दत्त, जो एक डेंटिस्ट हैं, और प्रतिवादी लेफ्टिनेंट कर्नल सौरभ इकबाल बहादुर दत्त का विवाह 2009 में हुआ था। पति सेना में कार्यरत थे। 2011 में जब पति की पोस्टिंग कारगिल में हुई, तो पत्नी अपना पुणे स्थित डेंटल क्लिनिक बंद कर उनके साथ वहां रहने चली गईं।
कारगिल प्रवास के दौरान अपीलकर्ता गर्भवती हुईं, लेकिन वहां चिकित्सा सुविधाओं की कमी के कारण वह अहमदाबाद लौट आईं। 2012 में बेटी के जन्म के बाद, जब वे दोबारा कारगिल गईं, तो बच्ची की तबीयत बिगड़ गई और उसे दौरे पड़ने लगे। कारगिल में विशेषज्ञों की कमी के कारण, बच्ची के इलाज के लिए अपीलकर्ता को अहमदाबाद में रहना पड़ा।
इस बीच आपसी विवाद बढ़ने पर सेना ने पत्नी और बच्ची के लिए भरण-पोषण (Maintenance) के आदेश दिए। इसके बाद पति ने तलाक की अर्जी दाखिल की। 2022 में अहमदाबाद की फैमिली कोर्ट ने पत्नी द्वारा अपना क्लिनिक चलाने को आधार बनाकर “क्रूरता और परित्याग” के आधार पर तलाक मंजूर कर लिया। हाईकोर्ट ने भी इस फैसले की पुष्टि की थी।
फैमिली कोर्ट की वे टिप्पणियां जिन पर सुप्रीम कोर्ट ने आपत्ति जताई
फैमिली कोर्ट ने अपनी डिक्री में पत्नी को इन आधारों पर दोषी माना था:
- उन्होंने अपने करियर को शादी से ऊपर प्राथमिकता दी और अहमदाबाद में क्लिनिक खोला।
- क्लिनिक के उद्घाटन कार्ड पति या ससुराल वालों की जानकारी के बिना छपवाए गए।
- अहमदाबाद प्रवास के दौरान उन्होंने ससुराल के बजाय मायके में रहने को प्राथमिकता दी।
- कोर्ट का मानना था कि पत्नी का “परम कर्तव्य” है कि वह अपने पति के साथ वहीं रहे जहां पति चाहे।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों के इस तर्क को पूरी तरह खारिज कर दिया। जस्टिस संदीप मेहता ने अपने फैसले में लिखा:
“हम 21वीं सदी में काफी आगे बढ़ चुके हैं, फिर भी एक योग्य महिला द्वारा अपना करियर बनाने और बच्चे के लिए सुरक्षित वातावरण सुनिश्चित करने के प्रयास को निचली अदालतों ने क्रूरता और परित्याग माना है। यह दृष्टिकोण न केवल कानूनी रूप से अस्थिर है, बल्कि विचलित करने वाला भी है।”
अदालत ने कहा कि शादी किसी महिला की व्यक्तिगत पहचान को खत्म नहीं करती है। कोर्ट के अनुसार:
“यह अपेक्षा करना कि एक महिला हमेशा अपने करियर की बलि दे दे और एक आज्ञाकारी पत्नी की पारंपरिक धारणाओं के अनुरूप चले, एक ऐसी विचारधारा को दर्शाता है जो बेहद दकियानूसी है और आज के दौर में स्वीकार्य नहीं है।”
खंडपीठ ने यह भी कहा कि अगर यही स्थिति पुरुष के साथ होती—यानी पत्नी सेना में होती और पति डॉक्टर होता—तो कभी भी पति से यह उम्मीद नहीं की जाती कि वह अपना करियर छोड़ दे, और न ही ऐसा करने पर उसे ‘क्रूर’ कहा जाता।
झूठी गवाही और धर्म परिवर्तन के आरोपों पर रुख
कोर्ट ने पति द्वारा अपनी पूर्व पत्नी के खिलाफ झूठी गवाही (Perjury) के लिए धारा 340 CrPC के तहत मुकदमा चलाने की मांग को भी खारिज कर दिया। अदालत ने इसे “व्यक्तिगत प्रतिशोध और द्वेषपूर्ण दृष्टिकोण” से प्रेरित बताया। इसके अलावा, पति द्वारा लगाए गए धर्म परिवर्तन के दबाव के आरोपों को भी निराधार माना गया।
अंतिम निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने अपील को आंशिक रूप से स्वीकार किया। चूंकि पति ने दूसरी शादी कर ली थी और पत्नी भी अब साथ रहने की इच्छुक नहीं थी, इसलिए तलाक की डिक्री को रद्द नहीं किया गया। हालांकि, डेंटिस्ट पत्नी के चरित्र और आचरण पर की गई ‘क्रूरता’ और ‘परित्याग’ की सभी टिप्पणियों को रिकॉर्ड से हटा दिया गया। अब यह तलाक केवल ‘विवाह के अपूरणीय विच्छेद’ के आधार पर प्रभावी माना जाएगा।
मामले का विवरण:
- केस का शीर्षक: एन सौरभ दत्त बनाम लेफ्टिनेंट कर्नल सौरभ इकबाल बहादुर दत्त
- केस नंबर: सिविल अपील @ SLP(Civil) No. 25076 of 2024
- पीठ: जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता
- दिनांक: 12 मई, 2026

