“तारीख मिलती रही है….. लेकिन इंसाफ नहीं मिला”: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ‘दामिनी’ के डायलॉग के ज़रिए राज्य और पुलिस को दी कड़ी फटकार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हत्या के एक मामले में आरोपी की जमानत याचिका खारिज करते हुए न्यायिक प्रणाली में देरी पर गहरी चिंता व्यक्त की है। जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि मुकदमों के निपटारे में होने वाली देरी के लिए अक्सर न्यायिक अधिकारियों को दोषी ठहराया जाता है, जबकि असल समस्या राज्य सरकार की ओर से संसाधनों की कमी और पुलिस के असहयोग में निहित है।

मामले का संक्षिप्त विवरण और हाईकोर्ट का रुख

यह मामला फतेहपुर जिले के थाना हुसैनगंज (केस अपराध संख्या 290/2025) से संबंधित है, जिसमें आरोपी मेवालाल प्रजापति पर भारतीय न्याय संहिता (B.N.S.) की धारा 103(1), 238, 309(6) और 317(2) के तहत मुकदमा दर्ज है। हाईकोर्ट ने साक्ष्यों की गंभीरता को देखते हुए जमानत देने से इनकार कर दिया, लेकिन साथ ही उत्तर प्रदेश की जिला अदालतों में मुकदमों के भारी बोझ और उनके लंबित होने के कारणों पर एक विस्तृत रिपोर्ट भी प्रस्तुत की।

केस का बैकग्राउंड और दलीलें

अभियोजन पक्ष के अनुसार, मृतक 16 अक्टूबर 2025 से लापता था। पुलिस ने सीडीआर (CDR) लोकेशन के आधार पर आरोपी को 19 अक्टूबर 2025 को गिरफ्तार किया। आरोपी की निशानदेही पर मृतक का ई-रिक्शा और खून से सना एक पेचकस बरामद किया गया।

  • आवेदक के वकील की दलील: उन्होंने कहा कि घटना का कोई चश्मदीद गवाह नहीं है और बरामदगी को फर्जी तरीके से दिखाया गया है। आवेदक का कोई पिछला आपराधिक इतिहास नहीं है और वह अक्टूबर 2025 से जेल में है।
  • राज्य सरकार (A.G.A.) की दलील: सरकारी वकील ने जमानत का विरोध करते हुए कहा कि सीडीआर साक्ष्य आरोपी की उपस्थिति घटनास्थल के पास दर्शाते हैं। इसके अलावा, बरामद पेचकस पोस्टमार्टम रिपोर्ट में आई चोटों की पुष्टि करता है।
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‘दामिनी’ का डायलॉग और वास्तविकता: पैरा 19 का विश्लेषण

कोर्ट ने मुकदमों में मिलने वाली ‘तारीख’ के प्रति जनता के आक्रोश को संबोधित करने के लिए 1993 की प्रसिद्ध फिल्म ‘दामिनी’ का संदर्भ लिया। निर्णय के पैरा 19 में कहा गया है:

“1993 में रिलीज हुई फिल्म ‘दामिनी’ का एक फिल्मी डायलॉग कि ‘तारीख पे तारीख, तारीख पे तारीख मिलती रही है….. लेकिन इंसाफ नहीं मिला माई लॉर्ड, इंसाफ नहीं मिला! मिली है तो सिर्फ तारीख’। यह डायलॉग बहुत लोकप्रिय हुआ क्योंकि यह एक आम आदमी की धारणा थी, लेकिन इसका कारण केवल न्यायिक अधिकारी नहीं है, बल्कि राज्य और उसकी पुलिस है। एक न्यायिक अधिकारी पर्याप्त कर्मचारी, पुलिस के सहयोग और उचित एफएसएल रिपोर्ट के बिना मामलों का फैसला नहीं कर सकता।”

जस्टिस देशवाल ने कहा कि कई ईमानदार और मेहनती युवा न्यायिक अधिकारी बुनियादी ढांचे की कमी के कारण खुद को असहाय महसूस करते हैं और कुंठित हो जाते हैं।

लंबित मामलों के मुख्य कारण (पैरा 11)

हाईकोर्ट ने आगरा, गाजियाबाद और मथुरा जैसे जिलों के फीडबैक के आधार पर देरी के 14 प्रमुख कारणों को सूचीबद्ध किया है:

  1. अभियुक्तों का समय पर पेश न होना।
  2. स्टाफ की भारी कमी (लिपिक, स्टेनोग्राफर और रीडर की अनुपलब्धता)।
  3. पुलिस द्वारा समन और वारंट की तामीली न करना।
  4. गवाहों (विशेषकर पुलिस और डॉक्टरों) का पेश न होना।
  5. अदालतों में मुकदमों की अत्यधिक संख्या (प्रतिदिन 100-150 मामले)।
  6. एफएसएल (FSL) रिपोर्ट मिलने में देरी।
  7. वकीलों द्वारा बार-बार स्थगन (Adjournment) की मांग।
  8. पुराने मामलों को प्राथमिकता न मिलना।
  9. पुलिस, अभियोजन और न्यायपालिका के बीच समन्वय का अभाव।
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डिजिटल बदलाव और नए निर्देश

कोर्ट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 और उत्तर प्रदेश इलेक्ट्रॉनिक प्रोसेस रूल्स, 2026 का हवाला देते हुए कहा कि अब तकनीक के माध्यम से सुनवाई तेज की जा सकती है। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और डीजीपी (DGP) को 11 सूत्रीय निर्देश जारी किए हैं:

  • जिला अदालतों में अतिरिक्त स्टाफ और बुनियादी ढांचा उपलब्ध कराया जाए।
  • यूपी एफएसएल (U.P. FSL) को गृह मंत्रालय के तहत एक स्वायत्त विभाग बनाने पर विचार हो।
  • सभी जिला पुलिस प्रमुख व्यक्तिगत रूप से मासिक मॉनिटरिंग मीटिंग में शामिल हों।
  • आईओ (I.O.) को निर्देशित किया जाए कि वे एफएसएल भेजते समय डीएनए मैचिंग की मांग अनिवार्य रूप से करें।
  • गवाहों के बयान दर्ज करने के लिए ‘स्पीच-टू-टेक्स्ट एआई (AI) मॉड्यूल’ का उपयोग शुरू किया जाए।
  • पंजाब और हरियाणा की तर्ज पर सभी जिला जज और न्यायिक अधिकारियों को व्यक्तिगत सुरक्षा अधिकारी (PSO) प्रदान करने पर विचार किया जाए।
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हाईकोर्ट का निर्णय

मामले के गुण-दोषों पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि सीडीआर लोकेशन और खून से सने पेचकस की बरामदगी आरोपी के खिलाफ गंभीर साक्ष्य हैं।

कोर्ट ने कहा, “प्रस्तुत दलीलों और साक्ष्यों को देखते हुए, यह अदालत इस स्तर पर आवेदक को जमानत देने की इच्छुक नहीं है।”

केस विवरण ब्लॉक

  • केस का शीर्षक: मेवालाल प्रजापति बनाम उत्तर प्रदेश राज्य
  • केस संख्या: क्रिमिनल मिसलेनियस बेल एप्लीकेशन संख्या 11476/2026
  • पीठ: जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल
  • दिनांक: 7 मई, 2026

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