क्या लिक्विडेशन के बाद धारा 138 NI एक्ट के तहत डायरेक्टर उत्तरदायी हो सकता है? दिल्ली हाईकोर्ट ने ‘कानूनी असंभावना’ और खाता संचालन पर सुनाया फैसला

दिल्ली हाईकोर्ट ने परक्राम्य लिखित अधिनियम (Negotiable Instruments Act), 1881 की धारा 138 के तहत दायर एक आपराधिक शिकायत को रद्द कर दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि अपराध के घटित होने से पहले ही कंपनी के बैंक खाते ‘प्रोविजनल लिक्विडेटर’ (Provisional Liquidator) के नियंत्रण में आ जाते हैं, तो चेक बाउंस के लिए डायरेक्टर को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। जस्टिस विकास महाजन ने कहा कि लिक्विडेटर की नियुक्ति के बाद डायरेक्टरों के पास कंपनी के खाते संचालित करने का अधिकार नहीं रह जाता है, जिससे भुगतान की मांग को पूरा करना उनके लिए “कानूनी और व्यावहारिक रूप से असंभव” हो जाता है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद M/S PRJ एंटरप्राइजेज लिमिटेड (प्रतिवादी संख्या 2) और M/S श्री बालाजी एंटरप्राइजेज (प्रतिवादी संख्या 1/शिकायतकर्ता) के बीच दिल्ली नगर निगम (MCD) को ‘ऑटो टिपर्स’ की आपूर्ति के लिए हुए एक समझौते (MOU) से उत्पन्न हुआ था। मतभेदों के बाद, प्रतिवादी संख्या 2 के डायरेक्टर याचिकाकर्ता राज कुमार जैन ने 45,00,000 रुपये की अग्रिम राशि वापस करने के लिए चेक जारी किए थे।

चेकों को कई बार प्रस्तुत किया गया और अंततः 15 जून, 2012 को “अपर्याप्त धन” के कारण वे बाउंस हो गए। इसके बाद 2 जुलाई, 2012 को डिमांड नोटिस जारी किया गया और 4 अगस्त, 2012 को शिकायत दर्ज की गई। हालांकि, महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि हाईकोर्ट ने 23 मई, 2012 को ही कंपनी के खिलाफ समापन (winding-up) याचिका स्वीकार कर ली थी और एक प्रोविजनल लिक्विडेटर नियुक्त कर दिया था, जिसने डायरेक्टरों को किसी भी संपत्ति या धन के लेन-देन से रोक दिया था।

पक्षों के तर्क

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि धारा 138 के तहत शिकायत का कारण तब उत्पन्न हुआ जब कंपनी पहले से ही लिक्विडेशन की प्रक्रिया में थी। चूंकि हाईकोर्ट के 23 मई के आदेश ने डायरेक्टरों से बैंक खातों को संचालित करने की शक्ति छीन ली थी, इसलिए याचिकाकर्ता यह सुनिश्चित करने की स्थिति में नहीं था कि चेक का भुगतान हो जाए।

शिकायतकर्ता ने लिक्विडेशन कार्यवाही की समयरेखा या इस तथ्य पर कोई विवाद नहीं किया कि चेक का बाउंस होना लिक्विडेटर द्वारा कार्यभार संभालने के बाद हुआ था।

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कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

कोर्ट ने कंपनी अधिनियम, 1956 की धाराओं 450, 456 और 457 के प्रभाव की जांच की। जस्टिस महाजन ने देखा कि प्रोविजनल लिक्विडेटर की नियुक्ति के बाद, कंपनी का बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स ‘फंक्टस ऑफिशियो’ (functus officio) हो जाता है, जिसका अर्थ है कि कानून की प्रक्रिया के तहत उनके अधिकार समाप्त हो जाते हैं।

जस्टिस महाजन ने कहा:

“इस न्यायिक व्यवस्था के तहत, कंपनी के व्यावसायिक संचालन, उसकी संपत्तियों का प्रशासन और उसके अनुबंधों की वैधता लिक्विडेटर की देखरेख और औपचारिक अधिकार के अधीन होती है, जो कॉर्पोरेट संपत्ति के संरक्षक के रूप में कार्य करता है।”

कोर्ट ने विशेष रूप से धारा 138 NI एक्ट में प्रयुक्त वाक्यांश “उसके द्वारा संचालित खाता” (an account maintained by him) की व्याख्या की। कोर्ट ने माना कि “खाता संचालित करने” का तात्पर्य वित्तीय लेनदेन को नियंत्रित करने के निरंतर और सकारात्मक अधिकार से है।

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कोर्ट ने आगे कहा:

“एक खाताधारक द्वारा खाता संचालित करने के लिए यह आवश्यक है कि वह उस खाते में पैसे जमा करने या निकालने की स्थिति में हो… वर्तमान मामले में, एक बार जब कोर्ट के आदेश से खाता कुर्क (attach) कर लिया गया, तो याचिकाकर्ता द्वारा उस खाते का संचालन नहीं किया जा सकता था।”

कोर्ट ने M.L. गुप्ता बनाम Ceat फाइनेंशियल सर्विसेज लिमिटेड और M/S Pec लिमिटेड बनाम M/S साबरी एक्जिम प्राइवेट लिमिटेड और अन्य जैसे कई पूर्व उदाहरणों का हवाला देते हुए पुष्टि की कि लिक्विडेशन के बाद डायरेक्टरों को उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि चेक का भुगतान न होना उनके नियंत्रण से बाहर था।

फैसला

कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि 23 मई, 2012 को प्रोविजनल लिक्विडेटर की नियुक्ति—जो अंतिम चेक बाउंस और डिमांड नोटिस से पहले हुई थी—ने प्रभावी रूप से याचिकाकर्ता को प्रबंधकीय नियंत्रण से वंचित कर दिया था।

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हाईकोर्ट ने कहा:

“चूंकि NI एक्ट की धारा 138 का वैधानिक जनादेश यह आवश्यक बनाता है कि अपराध के समय खाता आरोपी द्वारा ‘संचालित’ किया जा रहा हो, प्रोविजनल लिक्विडेटर को कार्यकारी शक्ति का हस्तांतरण याचिकाकर्ता के लिए डिमांड को पूरा करने या खातों को संचालित करने के लिए कानूनी और व्यावहारिक असंभवता पैदा करता है।”

यह पाते हुए कि अपराध के आवश्यक तत्व पूरे नहीं हुए हैं, हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार कर ली और राज कुमार जैन के खिलाफ शिकायत और सभी संबंधित कार्यवाहियों को रद्द कर दिया।

केस विवरण:

  • केस शीर्षक: राज कुमार जैन बनाम M/S श्री बालाजी एंटरप्राइजेज और अन्य
  • केस संख्या: CRL.M.C. 1665/2023 और CRL.M.A. 6359/2023
  • पीठ: जस्टिस विकास महाजन
  • तारीख: 4 मई, 2026

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