सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि यदि डिक्री-धारक अदालत द्वारा निर्धारित समय के भीतर बकाया विक्रय प्रतिफल (balance sale consideration) जमा करने में विफल रहता है, तो स्पेसिफिक परफॉरमेंस (विशिष्ट अनुपालन) की डिक्री निष्पादन योग्य (inexecutable) हो जाती है। जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी की पीठ ने कहा कि ऐसी डिक्री ‘सशर्त’ होती है और इसमें दोनों पक्षों के पारस्परिक दायित्व होते हैं। समय सीमा का पालन न करने का परिणाम मुकदमे की “स्वतः बर्खास्तगी” (deemed dismissal) के रूप में होता है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद हरियाणा के मेवात जिले के शिकारपुर गांव में स्थित 12 कनाल और 19 मरला कृषि भूमि की बिक्री के समझौते से शुरू हुआ था। 19 अक्टूबर 2005 को हुए इस समझौते के अनुसार, प्रतिवादी-अपीलकर्ता (हब्बन शाह) ने वादी-प्रतिवादी (शेरुद्दीन) को 5,00,000 रुपये प्रति एकड़ की दर से जमीन बेचने पर सहमति व्यक्त की थी और 80,000 रुपये अग्रिम राशि के रूप में प्राप्त किए थे।
निर्धारित तिथि (15 मार्च 2006) तक सेल डीड निष्पादित न होने पर, वादी ने स्पेसिफिक परफॉरमेंस के लिए मुकदमा दायर किया। 31 अक्टूबर 2012 को ट्रायल कोर्ट ने वादी के पक्ष में डिक्री जारी करते हुए प्रतिवादी को निर्देश दिया कि वह “निर्णय की तारीख से तीन महीने की अवधि के भीतर शेष विक्रय प्रतिफल प्राप्त करने के बाद” सेल डीड निष्पादित करे।
इस डिक्री को पहली और दूसरी अपील के माध्यम से चुनौती दी गई, जिन्हें अंततः 2017 तक खारिज कर दिया गया। हालांकि पहली अपील में संपत्ति के हस्तांतरण पर अल्पकालिक रोक थी, लेकिन राशि जमा करने पर कोई रोक नहीं थी। वादी तीन महीने की समय सीमा के भीतर बकाया राशि जमा करने में विफल रहा और उसने अंततः अक्टूबर 2015 में निष्पादन न्यायालय (Executing Court) की अनुमति के बाद 6,92,410 रुपये जमा किए। प्रतिवादी ने इस पर आपत्ति जताते हुए तर्क दिया कि अब डिक्री का निष्पादन नहीं किया जा सकता।
पक्षों के तर्क
अपीलकर्ता (प्रतिवादी) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता श्री मनोज स्वरूप ने तर्क दिया कि डिक्री में स्पष्ट रूप से तीन महीने के भीतर राशि जमा करने का निर्देश दिया गया था। चूंकि वादी ने न तो राशि जमा की और न ही उस अवधि के भीतर समय बढ़ाने का आवेदन किया, इसलिए स्पेसिफिक रिलीफ एक्ट, 1963 की धारा 28 के तहत अनुबंध रद्द हो गया। उन्होंने बलबीर सिंह बनाम बलदेव सिंह (2025) के मिसाल का हवाला देते हुए कहा कि अब डिक्री प्रभावहीन हो चुकी है।
प्रतिवादी (वादी) की ओर से: अधिवक्ता श्री दिव्येश प्रताप सिंह ने दलील दी कि वादी हमेशा अपनी जिम्मेदारी निभाने के लिए तैयार और इच्छुक था। उन्होंने तर्क दिया कि अपील लंबित होने और अंतरिम आदेश के कारण देरी हुई। उन्होंने यह भी दावा किया कि एक बार जब निष्पादन न्यायालय ने 2015 में देर से जमा करने की अनुमति दे दी, तो इसका मतलब है कि देरी को माफ कर दिया गया और समय सीमा को बढ़ा हुआ माना जाना चाहिए।
अदालत का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य रूप से इस प्रश्न पर विचार किया कि क्या निर्धारित समय में राशि जमा न करना डिक्री के निष्पादन के लिए घातक है।
1. डिक्री की प्रकृति: अदालत ने कहा कि स्पेसिफिक परफॉरमेंस की डिक्री एक प्रारंभिक डिक्री की प्रकृति की होती है और इसे पारित करने के बाद अदालत अपनी शक्ति (functus officio) नहीं खोती है। हालांकि, यह एक सशर्त डिक्री है। जस्टिस मित्तल ने कहा:
“सशर्त डिक्री स्वतः संचालित होती है, इसलिए किसी भी शर्त का पालन न करने से मुकदमा स्वतः ही खारिज हो जाता है… जब डिक्री के तहत शर्तों का पालन नहीं किया जाता है, तो स्पेसिफिक परफॉरमेंस के अनुबंध का मुकदमा स्वतः ही खारिज माना जाता है।”
2. स्पेसिफिक रिलीफ एक्ट की धारा 28: अदालत ने स्पष्ट किया कि धारा 28 विक्रेता को चूक होने पर अनुबंध रद्द करने के लिए आवेदन करने की अनुमति देती है, लेकिन डिक्री को निष्पादन अयोग्य बनाने के लिए विक्रेता का ऐसा आवेदन करना अनिवार्य नहीं है। प्रेम जीवन बनाम के.एस. वेंकट रमन (2017) का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि यदि समय पर जमा नहीं किया जाता है और कोई विस्तार नहीं मांगा जाता है, तो डिक्री समाप्त हो जाती है।
3. तत्परता और इच्छा (Readiness and Willingness): पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि “तत्परता और इच्छा” निरंतर होनी चाहिए। अदालत ने टिप्पणी की:
“वादी द्वारा ऐसी शर्त का पालन न करना इंगित करता है कि वह वास्तव में डिक्री के तहत अपने दायित्व को निभाने के लिए तैयार और इच्छुक नहीं था, जो दायित्व अनिवार्य रूप से समझौते की एक शर्त का रूप ले चुका था।”
4. साम्या (Equity) और विवेक: अदालत ने रेखांकित किया कि स्पेसिफिक परफॉरमेंस एक साम्यपूर्ण और विवेकाधीन राहत है। कोर्ट ने कहा कि वर्षों की देरी को माफ करना अनुचित होगा, खासकर जब जमीन की कीमतें कई गुना बढ़ गई हों। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि वादी का आचरण उसे इस राहत का हकदार नहीं बनाता।
अदालत का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के 24 मार्च 2025 के आदेश और निष्पादन न्यायालय के आदेश को रद्द कर दिया। अदालत ने प्रतिवादी की आपत्तियों को स्वीकार करते हुए निष्पादन कार्यवाही को बंद करने का निर्देश दिया।
न्याय के संतुलन को बनाए रखने के लिए अदालत ने आदेश दिया:
- प्रतिवादी-अपीलकर्ता को वादी को 80,000 रुपये की बयाना राशि 19 अक्टूबर 2005 से वापसी की तारीख तक 8% वार्षिक साधारण ब्याज के साथ वापस करनी होगी।
- यदि प्रतिवादी राशि वापस करने में असमर्थ है, तो वह भुगतान पूरा करने के लिए अपनी 1/2 एकड़ जमीन वादी को या किसी तीसरे पक्ष को तीन महीने के भीतर बेच सकता है।
अदालत ने निष्कर्ष निकाला:
“31.10.2012 की स्पेसिफिक परफॉरमेंस की डिक्री तीन महीने के भीतर बकाया विक्रय प्रतिफल जमा करने की शर्त का पालन न करने के कारण निष्पादन अयोग्य हो गई है और अधिनियम की धारा 28 के तहत अनुबंध पूरी तरह से रद्द माना जाता है।”
केस विवरण:
- केस शीर्षक: हब्बन शाह बनाम शेरुद्दीन
- केस संख्या: सिविल अपील संख्या ___ / 2026 (SLP (C) सं. 14479 / 2025 से उत्पन्न)
- पीठ: जस्टिस पंकज मित्तल, जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी
- दिनांक: 6 मई, 2026

