पटना हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि पति-पत्नी की आर्थिक स्थिति और आय के स्तर में बड़ा अंतर है, तो पत्नी की अपनी स्वतंत्र आय होना उसे स्थायी गुजारा भत्ता (Permanent Alimony) पाने से वंचित नहीं करता है। जस्टिस बिबेक चौधरी और जस्टिस चंद्र शेखर झा की खंडपीठ ने आरा की फैमिली कोर्ट के उस आदेश की पुष्टि की है, जिसमें दुबई में कार्यरत चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) पति को ₹25,00,000 का एकमुश्त भुगतान करने का निर्देश दिया गया था।
मामले की पृष्ठभूमि
अपीलकर्ता (पति) और प्रतिवादी (पत्नी) का विवाह 3 फरवरी, 2012 को हुआ था। वैवाहिक विवादों के बाद, आरा की फैमिली कोर्ट ने मैट्रिमोनियल केस संख्या 161/2006 (दिनांक 05-05-2016) में तलाक की डिक्री पारित की। विवाह विच्छेद के साथ ही, कोर्ट ने पति को पत्नी के लिए ₹20,00,000 और उनके नाबालिग बेटे के लिए ₹5,00,000 स्थायी गुजारे भत्ते के रूप में देने का आदेश दिया।
पति ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए तर्क दिया कि चूंकि पत्नी खुद कमा रही है और उसकी अपनी वित्तीय देनदारियां (दूसरा परिवार और वृद्ध माता-पिता) अधिक हैं, इसलिए यह राशि अनुचित है।
पक्षों के तर्क
अपीलकर्ता (पति) का पक्ष: पति के वकील ने दलील दी कि पत्नी एक “सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर”, “टैरो कार्ड रीडर” और लेखिका है, जो प्रति माह ₹60,000 से ₹80,000 कमाती है। उन्होंने तर्क दिया कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 25 के तहत गुजारा भत्ता बेसहारा होने से बचाने के लिए है, न कि आत्मनिर्भर जीवनसाथी के लिए कमाई का जरिया। उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट के रीता राज बनाम पवित्र रॉय चौधरी (2025) और सुप्रीम कोर्ट के रिंकू बाहेती बनाम संदेश शारदा (2024) के फैसलों का हवाला दिया।
प्रतिवादी (पत्नी) का पक्ष: पत्नी के वकील ने कहा कि हालांकि वह लगभग ₹80,000 प्रति माह कमाती है, लेकिन वह अपने 13 साल के बेटे की पढ़ाई और निजी खर्चों का पूरा बोझ उठा रही है, जो ₹35,000 प्रति माह से अधिक है। उन्होंने आरोप लगाया कि दुबई में सीए के रूप में कार्यरत पति ने अपनी वास्तविक आय छुपाई है, जो उसके द्वारा बताए गए ₹1.5 लाख प्रति माह से काफी अधिक है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की संपत्तियों और देनदारियों के हलफनामों की जांच की। कोर्ट ने पाया कि पत्नी की स्वतंत्र आय होने के बावजूद, धारा 25 की “न्यायसंगत प्रकृति” वित्तीय न्याय सुनिश्चित करने की मांग करती है। बेंच ने कहा:
“हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 25 मौलिक रूप से न्यायसंगत प्रकृति की है और इसका उद्देश्य जीवनसाथी के बीच वित्तीय न्याय सुरक्षित करना है, ताकि विवाह विच्छेद के बाद स्वतंत्र साधनों की कमी वाले पक्ष को बेसहारा न छोड़ा जाए। हालांकि, ऐसी राहत स्वतः प्राप्त नहीं होती; यह वास्तविक वित्तीय आवश्यकता और न्यायसंगत विचारों के प्रमाण पर निर्भर करती है।”
कोर्ट ने दोनों पक्षों की सामाजिक और पेशेवर स्थिति की तुलना की। पति दुबई में कार्यरत एक चार्टर्ड अकाउंटेंट है, जो उच्च आय वाला पेशा है। पति की आय के एक-तिहाई हिस्से के सिद्धांत को लागू करते हुए कोर्ट ने गणना की:
“1,50,000 का एक-तिहाई हिस्सा ₹50,000 प्रति माह और ₹6,00,000 प्रति वर्ष होता है। अपीलकर्ता के 60 वर्ष की आयु तक के कार्यकाल को देखते हुए, स्थायी गुजारे भत्ते की राशि ₹1,02,00,000 बनती है। ट्रायल कोर्ट ने केवल ₹25,00,000 देने का निर्देश दिया है… जो उस राशि से ₹77,00,000 कम है जिसका दावा पत्नी कर सकती थी।”
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि ट्रायल कोर्ट ने संभवतः पत्नी की स्वतंत्र कमाई को ध्यान में रखते हुए ही ₹25 लाख की यह अपेक्षाकृत कम राशि तय की थी।
फैसला
खंडपीठ ने पति की अपील को खारिज करते हुए कहा कि दोनों पक्षों की स्थिति को देखते हुए यह राशि “किसी भी तरह से अत्यधिक या अन्यायपूर्ण नहीं है।” हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट की डिक्री की पुष्टि की और अपीलकर्ता को 90 दिनों के भीतर पूरी राशि का भुगतान करने का निर्देश दिया।
केस विवरण
केस शीर्षक: पुनीत अग्रवाल @ पुनीत अग्रवाल बनाम अंकिता अग्रवाल @ अंकिता जैन @ अंकिता
केस संख्या: मिसलेनियस अपील संख्या 991 ऑफ 2017
बेंच: जस्टिस बिबेक चौधरी और जस्टिस चंद्र शेखर झा
दिनांक: 05-05-2026

