‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’: रामायण और लव-कुश का उदाहरण देते हुए हाईकोर्ट ने 10 साल की बच्ची को कनाडा भेजने से किया इनकार

एक महत्वपूर्ण फैसले में, बच्चे की भावनात्मक स्थिरता को अंतरराष्ट्रीय कानूनी आदेशों से ऊपर रखते हुए, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने 10 साल की बच्ची को उसके पिता के पास कनाडा भेजने से इनकार कर दिया है। पिता द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण (habeas corpus) याचिका को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि बच्चे का कल्याण “सर्वोपरि विचार” है, जो विदेशी अदालतों के आदेशों (doctrine of comity of courts) पर भारी पड़ता है।

हाईकोर्ट के समक्ष मुख्य कानूनी सवाल यह था कि क्या कनाडा की ओंटारियो सुपीरियर कोर्ट ऑफ जस्टिस द्वारा पारित कस्टडी आदेश को भारत में ‘रिट ऑफ हेबियस कॉर्पस’ के माध्यम से यांत्रिक रूप से लागू किया जाना चाहिए। कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि हालांकि विदेशी आदेश प्रासंगिक होते हैं, लेकिन वे अंतिम नहीं हैं। बच्ची की अपनी मां के साथ रहने की इच्छा और इंदौर में उसकी वर्तमान शैक्षणिक स्थिरता को प्राथमिकता देते हुए, कोर्ट ने पिता की कस्टडी की मांग को ठुकरा दिया।

याचिका के अनुसार, बच्ची के माता-पिता का विवाह 2014 में महाराष्ट्र में हुआ था, जिसके बाद वे अमेरिका चले गए। बच्ची का जन्म 2016 में शिकागो में हुआ, जिससे उसे जन्म से ही अमेरिकी नागरिकता मिल गई। बाद में यह परिवार टोरंटो, कनाडा शिफ्ट हो गया। जनवरी 2022 में, मां अपनी बेटी के साथ भारत आई, लेकिन वापस लौटने के बजाय उसने बच्ची का दाखिला इंदौर के एक स्कूल में करा दिया।

वैवाहिक विवाद बढ़ने के बाद, पिता ने ओंटारियो (कनाडा) की फैमिली कोर्ट से कस्टडी का आदेश प्राप्त किया। इसी आदेश के आधार पर उन्होंने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर पीठ में याचिका दायर कर बच्ची को वापस कनाडा भेजने की मांग की थी।

याचिकाकर्ता (पिता) का तर्क था कि मां ने विदेशी अदालत के आदेश का उल्लंघन करते हुए बच्ची को भारत में “अवैध रूप से” रखा है। उन्होंने दलील दी कि बच्ची कनाडा की निवासी और अमेरिकी नागरिक है, इसलिए उसे कानूनी तौर पर पिता को सौंपा जाना चाहिए।

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वहीं, मां की ओर से तर्क दिया गया कि बच्ची के कल्याण के लिए उसका इंदौर के वर्तमान परिवेश में रहना ही बेहतर है। उन्होंने बताया कि बच्ची स्कूल में अच्छी तरह घुल-मिल गई है और अपने विकास के शुरुआती वर्षों में वह भावनात्मक रूप से पूरी तरह अपनी मां पर निर्भर है।

जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस बिनोड कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने ‘वेलफेयर प्रिंसिपल’ (कल्याणकारी सिद्धांत) के आधार पर मामले का विश्लेषण किया। जजों ने बच्ची से चेंबर में अकेले बात की, जहां उसने अपनी मां के प्रति गहरा लगाव व्यक्त किया।

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हाईकोर्ट ने कहा कि कस्टडी के मामलों में बच्चे का “सर्वोपरि हित” माता-पिता के कानूनी अधिकारों से ऊपर होता है। विदेशी आदेशों पर टिप्पणी करते हुए पीठ ने कहा:

“अदालतों के सौहार्द (comity of Courts) का सिद्धांत बच्चे के कल्याण के सर्वोपरि विचार को ओवरराइड नहीं कर सकता। भारतीय अदालत किसी विदेशी आदेश को यांत्रिक रूप से लागू करने के लिए बाध्य नहीं है, यदि ऐसा करना बच्चे के कल्याण के विपरीत हो।”

सांस्कृतिक और आध्यात्मिक उदाहरण देते हुए कोर्ट ने वाल्मीकि रामायण और लव-कुश के पालन-पोषण का उल्लेख किया। जजों ने कहा:

“माता सीता के श्री राम से अलग होने के बाद, महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में लव और कुश का पालन-पोषण उनकी माता द्वारा ही किया गया था। श्री राम के अयोध्या के राजा और उनके पिता होने के बावजूद, बच्चे माता के साथ रहे, जो भावनात्मक सुरक्षा, नैतिक परवरिश और मातृ संरक्षण के महत्व को दर्शाता है।”

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फैसले में प्रसिद्ध संस्कृत श्लोक “जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी” (माता और मातृभूमि स्वर्ग से भी श्रेष्ठ हैं) का भी उल्लेख किया गया। कोर्ट ने बच्ची की उम्र, इस स्तर पर मां की ममता की आवश्यकता और उसकी शैक्षणिक स्थिरता को फैसले का आधार बनाया।

हाईकोर्ट ने पिता की याचिका को खारिज कर दिया और कहा कि विदेशी अदालत का आदेश केवल एक कारक है, अंतिम फैसला नहीं। कोर्ट ने माना कि बच्ची का कल्याण उसकी मां के साथ भारत में रहने में ही है, जहां वह अपनी स्कूली शिक्षा और सामाजिक जीवन में पूरी तरह सामंजस्य बिठा चुकी है।

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