कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की शिकायतों के लिए समानांतर जांच समितियां PoSH कानून के खिलाफ: दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 (PoSH एक्ट) की प्रक्रियात्मक निष्पक्षता पर एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि आंतरिक शिकायत समिति (ICC) को मामला सौंपने से पहले या उसके बदले में किसी भी तरह की समानांतर ‘फैक्ट-फाइंडिंग’ (तथ्य-खोज) कमेटी का गठन करना अवैध है और यह कानूनी ढांचे के दायरे से बाहर है।

जस्टिस पुरुषेंद्र कुमार कौरव ने अपने फैसले में कहा कि PoSH एक्ट यौन उत्पीड़न की शिकायतों से निपटने के लिए एक “स्व-निहित तंत्र” (self-contained mechanism) प्रदान करता है। इस निर्धारित कानूनी प्रक्रिया से हटकर अपनाया गया कोई भी दृष्टिकोण न केवल कानून के प्रावधानों का उल्लंघन करता है, बल्कि नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों के भी विरुद्ध है।

यह फैसला दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कॉलेज के प्रिंसिपल द्वारा दायर याचिका पर आया है। साल 2025 में, तीन सहायक प्रोफेसरों ने प्रिंसिपल पर यौन दुराचार के आरोप लगाए थे। इन शिकायतों के बाद, दिल्ली विश्वविद्यालय के डिप्टी रजिस्ट्रार ने आरोपों की जांच के लिए एक फैक्ट-फाइंडिंग कमेटी का गठन किया। इस समिति ने बाद में सिफारिश की कि शिकायतों को ICC के पास भेजा जाना चाहिए।

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इसके बाद, सितंबर 2025 में याचिकाकर्ता को निलंबित कर दिया गया। याचिकाकर्ता ने इस प्रारंभिक समिति के गठन और अपने निलंबन आदेश की वैधता को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

हाईकोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि जब विधायिका ने स्पष्ट रूप से ICC या स्थानीय समिति को ऐसी शिकायतों की जांच करने वाली संस्था के रूप में नामित किया है, तो कोई भी अन्य निकाय ‘गेटकीपिंग’ की भूमिका नहीं निभा सकता।

जस्टिस कौरव ने टिप्पणी की, “यह निर्धारित करने के लिए कि किसी दी गई शिकायत को ICC/स्थानीय समिति को भेजा जाना चाहिए या नहीं, एक फैक्ट-फाइंडिंग कमेटी बनाना PoSH अधिनियम के प्रावधानों के विपरीत और कानून में अस्वीकार्य है।”

कोर्ट ने आगे स्पष्ट किया कि जांच के चरण में नियोक्ता (employer) की भूमिका केवल प्रशासनिक निर्णयों तक सीमित है। नियोक्ता का काम यह देखना है कि क्या संबंधित कर्मचारी का सेवा में बने रहना जांच को प्रभावित करेगा या सार्वजनिक हित में अवांछनीय है। नियोक्ता स्वयं प्रारंभिक तौर पर आरोपों का न्यायनिर्णयन नहीं कर सकता।

हाईकोर्ट ने स्वीकार किया कि शिकायत के आलोक में नियोक्ता के पास जांच लंबित रहने तक कर्मचारी को निलंबित करने का “निहित अधिकार” है, लेकिन निलंबन आदेश में “कलंककारी” (stigmatic) भाषा के इस्तेमाल के खिलाफ चेतावनी दी।

कोर्ट ने पाया कि इस मामले में निलंबन आदेश में याचिकाकर्ता के चरित्र के बारे में “संपादकीय निर्णय” (editorial judgment) दिए गए थे, जो जांच पूरी होने से पहले ही उसे दंडित करने जैसा था। आदेश में “गंभीर कदाचार और उत्पीड़न” जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया था, जिसे कोर्ट ने पूर्वाग्रह से ग्रसित माना।

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हाईकोर्ट ने कहा, “किसी भी व्यक्ति के साथ ऐसा व्यवहार नहीं किया जाना चाहिए जब उसके आचरण या कार्यों के संबंध में जांच लंबित हो। यदि निलंबन आदेश के शब्द ही आरोपी के लिए सजा बन जाएं, तो निर्दोषता के अनुमान (presumption of innocence) की संवैधानिक गारंटी खतरे में पड़ जाएगी।”

दिल्ली हाईकोर्ट ने निलंबन आदेश को रद्द कर दिया और कहा कि यह अपनी कलंककारी प्रकृति और अनुचित प्रारंभिक जांच समिति के उपयोग के कारण कानूनी रूप से टिकने योग्य नहीं है। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कॉलेज प्रशासन कानूनी मानकों का पालन करते हुए और पूर्वाग्रही भाषा से बचते हुए निलंबन का नया आदेश जारी करने के लिए स्वतंत्र है।

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