कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक पति और उसकी 84 वर्षीय मां के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A के तहत चल रही आपराधिक कार्यवाही और चार्जशीट को रद्द कर दिया है। हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी की कि पति द्वारा अपने नाबालिग बच्चे को अपनी कस्टडी में लेने से पत्नी को हुई “मानसिक पीड़ा” धारा 498A के तहत दंडनीय क्रूरता के दायरे में नहीं आती है, विशेष रूप से तब जब बच्चे का कल्याण और पिता के साथ रहने की उसकी अपनी इच्छा स्थापित हो चुकी हो।
मामले की पृष्ठभूमि
इस मामले की शुरुआत 14 दिसंबर 2021 को पत्नी द्वारा दर्ज कराई गई एक लिखित शिकायत से हुई थी। उसने आरोप लगाया था कि 2005 में शादी के बाद, 2012 में बेटे के जन्म के बाद उसके पति और ससुराल वालों ने उस पर अत्याचार करना शुरू कर दिया जो समय के साथ बढ़ता गया।
उसकी शिकायत का मुख्य बिंदु 26 नवंबर 2021 की एक घटना थी। उसने दावा किया कि जब वह काम से वापस लौटी, तो उसने पाया कि उसका पति, सास और बेटा घर पर नहीं थे। उसने यह भी आरोप लगाया कि उसकी अलमारी से लगभग 91,000 रुपये नकद और दैनिक उपयोग के गहने गायब थे। इसके बाद, बिधाननगर दक्षिण पुलिस स्टेशन ने IPC की धारा 498A, 323, 34 और दहेज निषेध अधिनियम की धारा 3 और 4 के तहत मामला दर्ज किया।
पक्षों के तर्क
याचिकाकर्ता (पति और सास): याचिकाकर्ताओं के वकील ने दलील दी कि यह जोड़ा 2014 से एक ही छत के नीचे अलग-अलग रह रहा था। यह तर्क दिया गया कि पति 26 नवंबर 2021 को बच्चे के साथ पुश्तैनी घर छोड़ने के लिए मजबूर था क्योंकि पत्नी द्वारा उस पर, उसकी वृद्ध मां और बच्चे पर “लगातार शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना” की जा रही थी।
बचाव पक्ष ने इस बात पर जोर दिया कि पत्नी ने बाद में स्वीकार किया था कि “लापता” नकदी उसकी अपनी अलमारी में ही मिल गई थी। उन्होंने एक मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन और निचली अदालत की कार्यवाही के रिकॉर्ड भी पेश किए, जहां बच्चे ने अपनी मां के पास लौटने की तीव्र अनिच्छा व्यक्त की थी और शारीरिक हमले व डर का हवाला दिया था।
विपक्षी पक्ष (पत्नी): पत्नी की ओर से पेश वकील ने तर्क दिया कि पति द्वारा चोरी-छिपे बच्चे को ले जाना, बिना बताए पत्नी को छोड़ देना और उसे अपने ही बच्चे से मिलने न देना “मानसिक प्रताड़ना और क्रूरता” की श्रेणी में आता है। उन्होंने अलग से चल रही अवमानना कार्यवाही का हवाला दिया जहां अदालत ने मुलाकात के आदेशों के प्रति पिता के व्यवहार पर टिप्पणी की थी। उन्होंने तर्क दिया कि धारा 498A के तहत मानसिक क्रूरता एक जारी रहने वाला अपराध है।
पश्चिम बंगाल राज्य: राज्य सरकार ने तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट ने डिस्चार्ज की अर्जी को सही ढंग से खारिज किया था क्योंकि चार्जशीट और धारा 161 Cr.P.C. के तहत दर्ज गवाहों के बयानों में पर्याप्त “दोषारोपण सामग्री” मौजूद थी।
कोर्ट का विश्लेषण
जस्टिस अपूर्वा सिन्हा राय ने धारा 498A के तहत “क्रूरता” के दायरे की जांच की और सुप्रीम कोर्ट के भास्कर लाल शर्मा बनाम मोनिका मामले का उल्लेख किया, जिसमें कहा गया है कि मानसिक चोट पहुंचाने की संभावना वाला आचरण भी क्रूरता के दायरे में आता है।
हालांकि, हाईकोर्ट ने पाया कि FIR में लगाए गए आरोप “सामान्य और अस्पष्ट” (General and Omnibus) थे। कोर्ट ने टिप्पणी की कि हालांकि बच्चे को दूर ले जाने से मां को मानसिक सदमा लग सकता है, लेकिन इस मामले की परिस्थितियां “बिल्कुल अलग” थीं।
गवाहों के बयानों पर: कोर्ट ने पाया कि धारा 161 Cr.P.C. के तहत जिन पड़ोसियों से पूछताछ की गई, वे प्रत्यक्षदर्शी नहीं थे, बल्कि उन्होंने केवल प्रताड़ना के बारे में “सुना” था। कोर्ट ने नोट किया, “चूंकि पड़ोसी कथित घटना के प्रत्यक्षदर्शी नहीं थे… इसलिए अभियोजन पक्ष के लिए कथित शारीरिक प्रताड़ना को साबित करना बहुत कठिन होगा।”
बच्चे के कल्याण पर: कोर्ट ने एक एडिशनल डिस्ट्रिक्ट जज के उस आदेश को महत्वपूर्ण माना जिन्होंने व्यक्तिगत रूप से बच्चे से बातचीत की थी। हाईकोर्ट ने निचली अदालत की उस टिप्पणी को उद्धृत किया:
“जब मैंने उससे अपनी माँ के पास जाने के लिए कहा, तो बच्चा कांपने लगा और मेज के नीचे छिप गया… वह अपने पिता के साथ काफी खुश है और उसने मुझसे बार-बार अनुरोध किया कि उसे उसकी माँ के पास वापस न भेजा जाए।”
हाईकोर्ट ने कहा, “अदालत को पत्नी द्वारा लगाए गए मानसिक क्रूरता के आरोपों और बच्चे (संनिभ मोइत्रा) के कल्याण के बीच संतुलन बनाना होगा।” कोर्ट ने आगे स्पष्ट किया कि बच्चे के हित में उसे उसकी माँ की कस्टडी से अलग करने के आधार उचित हैं, और इसे पति द्वारा की गई आपराधिक क्रूरता नहीं माना जा सकता।
निराधार आरोपों पर: कोर्ट ने गौर किया कि चोरी के गहनों और नकदी के संबंध में पत्नी के आरोप बाद में निराधार निकले क्योंकि वे चीजें उसे अपनी ही अलमारी में मिल गई थीं। कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि इस मामले में अभियोजन की सफलता की संभावना बहुत कम (Bleak chance) है।
अदालत का निर्णय
हाईकोर्ट ने माना कि आपराधिक कार्यवाही को जारी रखने की अनुमति देना “अदालत की प्रक्रिया का दुरुपयोग” होगा।
हाईकोर्ट ने FIR और उसके बाद दाखिल चार्जशीट को रद्द कर दिया। कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के 8 जून 2023 के उस आदेश को भी दरकिनार कर दिया जिसमें आरोपियों को आरोपमुक्त करने से इनकार किया गया था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह फैसला संबंधित मंच पर लंबित बच्चे की कस्टडी के मामले को प्रभावित नहीं करेगा।
मामले का विवरण:
केस का शीर्षक: शांतनु मोइत्रा और अन्य बनाम पश्चिम बंगाल राज्य और अन्य
केस संख्या: CRR No. 2236 of 2023
बेंच: जस्टिस अपूर्वा सिन्हा राय
दिनांक: 05.05.2026

