अशोक स्वैन ‘ब्लैकलिस्टिंग’ मामला: दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र को जवाब दाखिल करने के लिए दिया दो सप्ताह का समय

दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार को केंद्र सरकार को उस याचिका पर जवाब दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का अंतिम समय दिया है, जिसमें स्वीडन स्थित शिक्षाविद अशोक स्वैन ने खुद को ‘ब्लैकलिस्ट’ किए जाने के आदेश को चुनौती दी है। स्वैन का तर्क है कि इस कथित आदेश के कारण वह पिछले कई वर्षों से भारत नहीं आ पा रहे हैं, जिसके चलते वह अपनी बीमार मां से भी नहीं मिल सके हैं।

जस्टिस पुरुषेंद्र कुमार कौरव ने केंद्र सरकार के वकील के अनुरोध को स्वीकार करते हुए यह समय प्रदान किया। हाईकोर्ट अब इस मामले की अगली सुनवाई 23 जुलाई, 2024 को करेगा। गौरतलब है कि हाईकोर्ट ने नवंबर 2025 में इस याचिका पर नोटिस जारी किया था और गृह मंत्रालय, विदेश मंत्रालय, स्वीडन एवं लातविया स्थित भारतीय दूतावास और आप्रवासन ब्यूरो (Bureau of Immigration) से तीन सप्ताह के भीतर जवाब मांगा था।

अशोक स्वैन स्वीडन की उप्साला यूनिवर्सिटी में ‘पीस एंड कॉन्फ्लिक्ट रिसर्च’ विभाग के प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष हैं। वह स्वीडिश नागरिक हैं और उनके पास ओवरसीज सिटीजन ऑफ इंडिया (OCI) कार्ड है। यह कानूनी विवाद तब शुरू हुआ जब 8 फरवरी, 2024 को भारतीय दूतावास ने नागरिकता अधिनियम के तहत उनका OCI कार्ड रद्द कर दिया था।

स्वैन ने अपनी याचिका में कहा है कि उन्हें इस ‘ब्लैकलिस्टिंग’ आदेश के बारे में तब पता चला जब केंद्र ने उनकी एक पिछली याचिका के दौरान जवाबी हलफनामा दायर किया था। उनका आरोप है कि अधिकारियों ने बिना किसी उचित कानूनी प्रक्रिया का पालन किए उन्हें भारत आने से रोकने के लिए इस आदेश का सहारा लिया है।

याचिका में इस कानूनी लड़ाई के मानवीय पक्ष को भी रेखांकित किया गया है। स्वैन ने अदालत को बताया कि उनकी वृद्ध मां भारत में रहती हैं और काफी बीमार हैं, लेकिन ‘ब्लैकलिस्ट’ होने के कारण वह पिछले कई सालों से उनसे मिलने में असमर्थ रहे हैं।

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कानूनी तौर पर स्वैन का तर्क है कि अधिकारियों ने एक “अघोषित” ब्लैकलिस्टिंग आदेश के आधार पर कार्रवाई की है। याचिका के अनुसार, इस प्रतिबंध का कानूनी आधार उन्हें कभी नहीं बताया गया और न ही इसकी वैधता को नागरिकता अधिनियम के सुरक्षा उपायों या संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत मिले मौलिक अधिकारों की कसौटी पर परखा गया है।

याचिका में कहा गया, “न्यायिक समीक्षा के दो दौर होने के बावजूद, प्रतिवादियों ने केवल व्यापक और निराधार आरोपों के आधार पर आदेश पारित करना और ब्लैकलिस्टिंग थोपना जारी रखा, जिसकी सामग्री का खुलासा इस अदालत के सामने भी नहीं किया गया।” स्वैन के अनुसार, तथ्यों को गुप्त रखना “मनमानेपन” का प्रतीक है और साक्ष्य देने से इनकार करना संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत प्रशासनिक कार्रवाई को दूषित करता है।

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याचिका में उद्धृत केंद्र के पिछले हलफनामों के अनुसार, सरकार का रुख है कि स्वैन को उनके “भारत-विरोधी लेखन और भड़काऊ भाषणों” के कारण ब्लैकलिस्ट किया गया है। अधिकारियों का दावा है कि उनके सार्वजनिक बयानों ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की छवि को खराब किया है।

यह पहली बार नहीं है जब OCI रद्द करने का मामला अदालत पहुंचा है। इससे पहले हाईकोर्ट दो बार स्वैन का OCI कार्ड रद्द करने के केंद्र के आदेशों को खारिज कर चुका है। हालांकि, हर बार अदालत ने अधिकारियों को यह छूट दी थी कि वे स्वैन को नए सिरे से ‘कारण बताओ नोटिस’ (Show Cause Notice) जारी कर सकते हैं।

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स्वैन ने अब हाईकोर्ट से मांग की है कि उन्हें उनके OCI कार्ड पर भारत आने की अनुमति दी जाए और कथित ब्लैकलिस्टिंग से संबंधित रिकॉर्ड तलब कर उस आदेश को रद्द किया जाए।

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