बेरोजगार पति और बेटे को व्यवसाय शुरू करने के लिए दुकान की जरूरत ‘बोनाफाइड’: दिल्ली हाईकोर्ट ने बेदखली के आदेश को बरकरार रखा

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक किराएदार द्वारा दायर पुनरीक्षण याचिका (Revision Petition) को खारिज कर दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि एक मकान मालकिन द्वारा अपने बेरोजगार पति और बड़े बेटे को ड्राई फ्रूट्स के व्यवसाय में स्थापित करने के लिए दुकान की आवश्यकता ‘बोनाफाइड’ (वास्तविक आवश्यकता) की श्रेणी में आती है। जस्टिस अमित शर्मा ने एडिशनल रेंट कंट्रोलर (ARC) के आदेश को बरकरार रखते हुए कहा कि किराएदार ‘लीव टू डिफेंड’ (बचाव की अनुमति) पाने के लिए कोई ठोस कानूनी मुद्दा उठाने में विफल रहा है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद फतेहपुरी के गांधी गली स्थित संपत्ति संख्या 43 की ग्राउंड फ्लोर पर स्थित दुकान नंबर 4 से संबंधित है। मकान मालकिन श्रीमती बबीता जैन ने यह संपत्ति 1989 में खरीदी थी, जिसमें देवेंद्र कुमार पिछले 25 वर्षों से किराएदार थे।

2019 में मकान मालकिन ने दिल्ली रेंट कंट्रोल एक्ट (DRCA) के तहत बेदखली की याचिका दायर की। उन्होंने बताया कि वह एक गृहिणी हैं और अपने पति और छोटे बेटे के साथ पीतमपुरा में रहती हैं। याचिका में कहा गया कि उनके पति और बड़ा बेटा सिद्धार्थ जैन बेरोजगार हैं। हालांकि छोटा बेटा उसी इमारत की दुकान नंबर 1 में ड्राई फ्रूट्स का काम करता है, लेकिन पारिवारिक कलह और बड़े बेटे की पत्नी के साथ वैचारिक मतभेदों के कारण पति और बड़ा बेटा उसके साथ काम नहीं कर पा रहे हैं। इस कारण, उन्हें अपना स्वतंत्र व्यवसाय शुरू करने के लिए उक्त दुकान की आवश्यकता है।

पक्षों की दलीलें

किराएदार ने बचाव की अनुमति (Leave to Defend) मांगते हुए कई तर्क दिए:

  • वैकल्पिक आवास: किराएदार ने आरोप लगाया कि इमारत पांच मंजिला है और मकान मालकिन ने विभिन्न मंजिलों पर खाली पड़ी कई दुकानों की जानकारी छिपाई है।
  • रोजगार की स्थिति: यह तर्क दिया गया कि बड़ा बेटा एक बहुराष्ट्रीय कंपनी (MNC) में सॉफ्टवेयर इंजीनियर के रूप में कार्यरत है और उसे अच्छी सैलरी मिलती है, इसलिए वह अपनी मां पर निर्भर नहीं है।
  • वित्तीय स्थिति: किराएदार ने दावा किया कि मकान मालकिन के पति के पास पास की ही एक अन्य संपत्ति (संख्या 42) है, जिसकी जानकारी छिपाई गई है।
  • दुकान का कब्जा: किराएदार के अनुसार दुकान नंबर 3 और 5 भी खाली थीं और मकान मालकिन के कब्जे में थीं।
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जवाब में, मकान मालकिन ने सेल डीड (बिक्री विलेख) पेश कर साबित किया कि इमारत की अधिकांश दुकानें वर्षों पहले बेची जा चुकी हैं। दुकान नंबर 3 और 5 के संबंध में उन्होंने रेंट रसीदें पेश कीं, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि वे पुराने किराएदारों के पास हैं, भले ही वे दुकानें बंद और जर्जर स्थिति में हों। उन्होंने बेटे या उसकी पत्नी के MNC में काम करने के दावों को पूरी तरह से खारिज कर दिया।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण

जस्टिस अमित शर्मा ने एडिशनल रेंट कंट्रोलर के निष्कर्षों और मामले के रिकॉर्ड का बारीकी से परीक्षण किया।

बोनाफाइड आवश्यकता (Bona fide Requirement) के संबंध में हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि आवश्यकता को वर्तमान परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। हाईकोर्ट ने कहा:

“यदि यह मान भी लिया जाए कि याचिकाकर्ता का बेटा किसी MNC में काम कर रहा था और अच्छी सैलरी पा रहा था, तो भी यह उसे अपना स्वतंत्र व्यवसाय शुरू करने के अधिकार से वंचित नहीं करता है।”

पारिवारिक निर्भरता के मुद्दे पर हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि केवल वैचारिक मतभेदों के कारण अलग रहने का मतलब यह नहीं है कि मकान मालकिन की अपने बेटे के प्रति कोई नैतिक या सामाजिक जिम्मेदारी नहीं है।

वैकल्पिक आवास के सवाल पर हाईकोर्ट ने पाया कि मकान मालकिन ने सेल डीड और रेंट रसीदों के माध्यम से इमारत की प्रत्येक दुकान की स्थिति स्पष्ट कर दी है। चौथी मंजिल खाली होने के तर्क पर हाईकोर्ट ने स्थापित कानूनी स्थिति को दोहराया:

“यह सर्वविदित है कि मकान मालिक अपने हितों का सबसे अच्छा निर्णायक होता है और किराएदार उसे यह निर्देश नहीं दे सकता कि उसे अपनी संपत्ति का उपयोग कैसे करना है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि व्यवसाय के लिए चौथी मंजिल की तुलना में ग्राउंड फ्लोर अधिक उपयुक्त और लाभदायक होता है।”

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हाईकोर्ट ने यह भी नोट किया कि किराएदार यह साबित करने के लिए कोई दस्तावेजी सबूत नहीं दे सका कि मकान मालकिन या उनके पति पास की संपत्ति संख्या 42 के मालिक हैं।

हाईकोर्ट का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट के आबिद-उल-इस्लाम बनाम इंदर सैन दुआ और सरला आहूजा बनाम यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड के फैसलों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि उसका पुनरीक्षण क्षेत्राधिकार (Revisional Jurisdiction) सीमित है। हाईकोर्ट ने कहा:

“हाईकोर्ट से यह अपेक्षा नहीं की जाती है कि वह अपीलीय अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करते हुए निचली अदालत के विचारों को अपने विचारों से प्रतिस्थापित करे। इसकी भूमिका केवल अपनाई गई प्रक्रिया की शुद्धता की जांच करना है।”

मामले में कोई “गंभीर अवैधता” या रिकॉर्ड पर “स्पष्ट त्रुटि” न पाते हुए हाईकोर्ट ने 5 जनवरी 2023 के आदेश को सही ठहराया और पुनरीक्षण याचिका को खारिज कर दिया। बेदखली पर लगा अंतरिम स्टे भी हटा दिया गया है।

मामले का विवरण:

  • केस टाइटल: देवेंद्र कुमार बनाम श्रीमती बबीता जैन
  • केस नंबर: RC.REV. 192/2023 और CM APPL. 36212/2023
  • बेंच: जस्टिस अमित शर्मा
  • तारीख: 28 अप्रैल, 2026

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