इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने वक्फ संपत्ति पर हो रहे कथित अवैध निर्माण के मामले में स्वत: संज्ञान (suo motu) लेते हुए कार्यवाही आगे बढ़ाने का निर्णय लिया है। हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को इस मामले से मुक्त (discharge) कर दिया है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि जनहित याचिका का इस्तेमाल किसी निजी स्वार्थ या ‘प्रॉक्सि’ मुकदमेबाजी के लिए न हो। साथ ही, हाईकोर्ट ने बिना स्वीकृत नक्शे के हो रहे निर्माण पर रोक लगाने का अंतरिम आदेश भी दिया है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला अंसार अहमद द्वारा दायर एक जनहित याचिका (PIL) से शुरू हुआ था, जिसमें दो मुख्य मुद्दे उठाए गए थे। पहला मुद्दा वक्फ संपत्ति के कथित दुरुपयोग से संबंधित था और दूसरा मुद्दा यह था कि विकास प्राधिकरण की अनुमति या स्वीकृत नक्शे के बिना उक्त संपत्ति पर निर्माण कार्य किया जा रहा है।
पक्षों के तर्क
सुनवाई के दौरान, विपक्षी संख्या 7 (बिल्डर) की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता श्री प्रीतिश कुमार और श्री अमल रस्तोगी ने एक प्रारंभिक आपत्ति दर्ज कराई। उन्होंने तर्क दिया कि याचिका के साथ संलग्न प्रतिवेदन उस व्यक्ति द्वारा जमा किए गए थे जिसने मुतवल्ली की नियुक्ति के खिलाफ अपील दायर की है। चूंकि वह अपील धारा 83(2) के तहत लंबित है, इसलिए उन्होंने तर्क दिया कि इस याचिका को ‘प्रॉक्सि पिटीशन’ मानते हुए खारिज कर दिया जाना चाहिए।
अवैध निर्माण के मुद्दे पर, विकास प्राधिकरण के वकील श्री रत्नेश चंद्र ने हाईकोर्ट को सूचित किया कि बिल्डर को नोटिस जारी किया जा चुका है और प्रथम दृष्टया यह निर्माण बिना नक्शा स्वीकृत कराए किया जा रहा है। वक्फ बोर्ड के वकील ने भी कोर्ट को बताया कि संपत्ति के दुरुपयोग के संबंध में शिकायतें मिली हैं जिन पर बोर्ड विचार कर रहा है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने मामले के दोनों पहलुओं पर विचार किया। वक्फ संपत्ति के दुरुपयोग के संबंध में हाईकोर्ट ने कहा कि इसका उपचार ‘यूनिफाइड वक्फ मैनेजमेंट, एम्पावरमेंट, एफिशिएंसी एंड डेवलपमेंट एक्ट, 1995’ के तहत उपलब्ध है।
अवैध निर्माण के गंभीर मुद्दे को देखते हुए हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की नीयत पर उठी आपत्ति के बीच जनहित को सर्वोपरि माना। खंडपीठ ने टिप्पणी की:
“न्याय के हित में यह उचित होगा कि याचिकाकर्ता को इस मामले को आगे बढ़ाने से मुक्त कर दिया जाए और हम स्वयं स्वत: संज्ञान लेकर आगे बढ़ें, क्योंकि विपक्षी संख्या 7 एक बिल्डर है, न कि मुतवल्ली या वक्फ का प्रबंधन करने वाला व्यक्ति।”
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि चूंकि विकास प्राधिकरण द्वारा नोटिस जारी किए जा चुके हैं, इसलिए अब मुख्य रूप से यह देखना होगा कि क्या वक्फ संपत्ति पर बिना स्वीकृत नक्शे के निर्माण किया जा रहा है।
हाईकोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को मामले से डिस्चार्ज करते हुए आदेश दिया कि अब इस मामले को “In RE: SUO MOTU illegal Construction on Waqf Property” के शीर्षक के तहत स्वत: संज्ञान कार्यवाही के रूप में सुना जाएगा।
हाईकोर्ट ने निम्नलिखित अंतरिम निर्देश जारी किए:
- निर्माण पर रोक: “इस बीच, यह स्पष्ट किया जाता है कि यदि वक्फ संपत्ति पर कोई ऐसा निर्माण किया जा रहा है जिसके लिए अधिनियम, 1973 की धारा 15 के तहत अनुमति की आवश्यकता है, तो वह तब तक आगे नहीं बढ़ेगा जब तक कि उसकी स्वीकृति न मिल जाए।”
- प्राधिकरण से रिपोर्ट: विकास प्राधिकरण के वकील को अगली तारीख पर यह स्पष्ट करने का निर्देश दिया गया है कि हो रहे निर्माण की प्रकृति क्या है और क्या इसके लिए अधिनियम की धारा 15 के तहत मंजूरी अनिवार्य है।
मामले की अगली सुनवाई 13 मई, 2026 को निर्धारित की गई है।
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता: अभिषेक सिंह लाल गौरव प्रताप सिंह राकेश कुमार त्रिवेदी
विपक्षियों के अधिवक्ता: सी.एस.सी. मोहम्मद तारिक सईद परवेज अख्तर खान राजीव प्रकाश सक्सेना रत्नेश चंद्र प्रीतिश कुमार (वरिष्ठ अधिवक्ता) अमल रस्तोगी
मामले का विवरण:
केस टाइटल: अंसार अहमद बनाम स्टेट ऑफ यू.पी. व अन्य (अब In RE: SUO MOTU illegal Construction on Waqf Property)
केस नंबर: पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन (PIL) संख्या 342 ऑफ 2026
बेंच: जस्टिस राजन रॉय, जस्टिस मंजीव शुक्ला
तारीख: 27 अप्रैल, 2026

