छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई गवाह अपराध स्थल पर स्वाभाविक रूप से मौजूद है और वह स्वयं भी घटना में घायल हुआ है, तो उसका बयान केवल इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता कि वह पीड़ित का रिश्तेदार है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने कहा कि अदालतों को ऐसे गवाहों के बयानों की विश्वसनीयता और निरंतरता का आकलन करना चाहिए, न कि उन्हें अविश्वसनीय मानकर दरकिनार करना चाहिए।
हाईकोर्ट ने यह महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत परसराम गायकवाड़ और बृजसेन गायकवाड़ की आपराधिक अपील को खारिज करते हुए प्रतिपादित किया। इन दोनों को एक ही परिवार के तीन सदस्यों की हत्या और चार अन्य की हत्या के प्रयास के मामले में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी।
मामले की पृष्ठभूमि
घटना 11 सितंबर, 2020 की तड़के सुबह 4:00 से 5:00 बजे के बीच महासमुंद जिले के जोबा गांव में हुई थी। जमीन के बंटवारे को लेकर चल रहे विवाद के कारण, अपीलकर्ता ओसकुमार गायकवाड़ के घर में जबरन घुस गए। उन्होंने ओसकुमार और उनकी पत्नी जागृति गायकवाड़ की आंखों में मिर्च पाउडर झोंक दिया और उन पर कटार व सब्बल से हमला कर दिया।
इस हमले में जागृति गायकवाड़, उनकी बेटी टीना और बेटे मनीष की मौके पर ही मौत हो गई। हमले में ओसकुमार गायकवाड़ और उनके दो अन्य बच्चे ओमन और गीतांजलि सहित चार लोग गंभीर रूप से घायल हो गए थे। 18 जून, 2025 को प्रथम अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, महासमुंद ने अभियुक्तों को धारा 459, 302/34 और 307/34 के तहत दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी।
पक्षकारों के तर्क
अपीलकर्ताओं की दलीलें: अपीलकर्ताओं के वकील श्री एच.एस. अहलुवालिया ने तर्क दिया कि अभियोजन का पूरा मामला परिवार के सदस्यों की गवाही पर आधारित है, जो कि ‘हितबद्ध गवाह’ (interested witnesses) हैं। उन्होंने दलील दी कि:
- यह घटना जमीन विवाद के कारण उपजे आवेश का परिणाम थी और हत्या करने का कोई पूर्व नियोजित इरादा नहीं था।
- परिवारों के बीच लंबे समय से चली आ रही दुश्मनी के कारण गवाहों के बयानों को संदेह की दृष्टि से देखा जाना चाहिए।
राज्य सरकार की दलीलें: राज्य की ओर से पैनल लॉयर श्री शैलेंद्र शर्मा ने सजा का समर्थन करते हुए कहा कि यह मामला ठोस सबूतों पर आधारित है। उन्होंने तर्क दिया कि गवाहों की उपस्थिति पूरी तरह स्वाभाविक थी क्योंकि हमला उनके घर के भीतर हुआ था और घायल होने के कारण उनकी गवाही अत्यंत विश्वसनीय है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने अपने विश्लेषण में मुख्य रूप से गवाहों की विश्वसनीयता और घायल परिजनों की कानूनी स्थिति पर ध्यान केंद्रित किया। बेंच ने इस संबंध में हेड-नोट के माध्यम से स्पष्ट किया:
“एक ‘रिश्तेदार’ गवाह, जो एक घायल गवाह भी है और जो अपराध के दृश्य पर स्वाभाविक रूप से मौजूद हो सकता है, उसकी गवाही को केवल पीड़ित के साथ उसके संबंध के कारण खारिज नहीं किया जाना चाहिए। न्यायालय को उसे अविश्वसनीय बताने के बजाय उसके बयान की विश्वसनीयता, निरंतरता और सुसंगतता का आकलन करना चाहिए।”
हाईकोर्ट ने पाया कि ओसकुमार (PW-2), ओमन कुमार (PW-21) और गीतांजलि (PW-22) के बयान विश्वसनीय थे और फॉरेंसिक साक्ष्यों से मेल खाते थे। बेंच ने निम्नलिखित बिंदुओं को रेखांकित किया:
- स्वाभाविक उपस्थिति: गवाहों पर उनके अपने निवास स्थान में सुबह के समय हमला हुआ था, इसलिए घटनास्थल पर उनकी मौजूदगी विवाद से परे है।
- पुष्टि: अभियुक्तों के घर से खून से सनी कटार की बरामदगी और फॉरेंसिक रिपोर्ट में मानव रक्त की पुष्टि ने पीड़ितों के बयानों को मजबूती दी।
- हत्या का इरादा: विर्सा सिंह बनाम पंजाब राज्य और अंदा व अन्य बनाम राजस्थान राज्य के मामलों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि गर्दन रेतने जैसे कृत्य से मृत्यु कारित करने की पर्याप्त संभावना स्पष्ट होती है, जो हत्या की श्रेणी में आता है।
फैसला
डिवीजन बेंच ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष संदेह से परे अपना मामला साबित करने में सफल रहा है। हाईकोर्ट ने अभियुक्तों के उन दावों को भी खारिज कर दिया कि उन्हें संपत्ति हड़पने के लिए फंसाया गया है। कोर्ट ने कहा कि यह अकल्पनीय है कि कोई व्यक्ति अभियुक्तों को फंसाने के लिए अपनी ही पत्नी और बच्चों की हत्या कर देगा।
अपील को सारहीन पाते हुए हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई दोषसिद्धि और आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखा।
केस विवरण:
- केस टाइटल: परसराम गायकवाड़ और अन्य बनाम छत्तीसगढ़ राज्य
- केस नंबर: आपराधिक अपील संख्या 1978/2025
- बेंच: चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल
- दिनांक: 24.04.2026

