सुप्रीम कोर्ट ने एक भ्रष्टाचार मामले में पटना हाईकोर्ट द्वारा दोषी ठहराई गई पूर्व बाल विकास परियोजना अधिकारी (CDPO) अरुणा कुमारी की सजा को निलंबित कर दिया है। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को नियमित जमानत देते हुए अभियोजन पक्ष के उस दावे पर गंभीर सवाल उठाए हैं, जिसमें कहा गया था कि पुलिस हिरासत में रखे गए रिश्वत के नोटों को चूहों ने नष्ट कर दिया था।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता अरुणा कुमारी, बाल विकास परियोजना अधिकारी के रूप में कार्यरत थीं, जब उन पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 7 और 13(2) के तहत मुकदमा चलाया गया था। निचली अदालत ने शुरुआत में उन्हें सभी आरोपों से बरी कर दिया था।
इसके बाद विभाग ने पटना हाईकोर्ट में इस फैसले को चुनौती दी। हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए याचिकाकर्ता को दोषी करार दिया। हाईकोर्ट ने उन्हें धारा 13(2) के तहत 4 साल के कठोर कारावास और धारा 7 के तहत 3 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। याचिकाकर्ता ने इस सजा के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर की।
साक्ष्यों के नष्ट होने पर हाईकोर्ट की टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले के पैराग्राफ 53 पर विशेष संज्ञान लिया, जिसमें रिश्वत की रकम पेश न कर पाने का जिक्र था। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था:
“यह सच है कि अभियोजन पक्ष उन करेंसी नोटों को पेश करने में विफल रहा जो अभियुक्त के पास से जब्त किए गए थे, क्योंकि जब्त किए गए पैसों वाला लिफाफा चूहों और कृंतकों (rodents) द्वारा नष्ट कर दिया गया था। लेकिन ट्रायल के दौरान, थाना मलखाना रजिस्टर पेश किया गया और उसे सबूत के तौर पर साबित किया गया… मलखाना की खराब स्थिति और आधुनिक संरक्षण प्रणाली की कमी के कारण, नोटों वाला लिफाफा चूहों द्वारा नष्ट कर दिया गया था।”
हाईकोर्ट ने यह भी तर्क दिया था कि यदि अन्य परिस्थितियां बिना किसी संदेह के अपराध की ओर इशारा करती हैं, तो मुख्य साक्ष्य (corpus delicti) के अभाव में भी दोषसिद्धि संभव है।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने भौतिक साक्ष्यों के इस तरह गायब होने पर गहरा संदेह व्यक्त किया।
पीठ ने टिप्पणी की, “हमें यह जानकर आश्चर्य हो रहा है कि करेंसी नोट चूहों द्वारा नष्ट कर दिए गए।”
कोर्ट ने बरामद संपत्तियों के रखरखाव और सुरक्षा मानकों पर सवाल उठाते हुए कहा, “हम हैरान हैं कि इस तरह के अपराधों में बरामद कितने करेंसी नोट सुरक्षित स्थान पर न रखे जाने के कारण नष्ट हो जाते होंगे। यह राज्य के लिए राजस्व का एक बड़ा नुकसान है।”
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि “नोटों के नष्ट होने के संबंध में दी गई व्याख्या बिल्कुल भी भरोसेमंद नहीं लगती।” कोर्ट ने संकेत दिया कि जब इस मामले की मुख्य सुनवाई होगी, तब इस मुद्दे पर विस्तार से गौर किया जाएगा।
कोर्ट का निर्णय
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्री एस. नागामुथु की दलीलें सुनने के बाद, कोर्ट ने निम्नलिखित आदेश पारित किए:
- लीव ग्रांट (Leave Granted): कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील को औपचारिक रूप से स्वीकार कर लिया।
- सजा का निलंबन: हाईकोर्ट द्वारा पारित सजा के आदेश को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया।
- जमानत: याचिकाकर्ता को उन शर्तों पर जमानत पर रिहा करने का निर्देश दिया गया जो निचली अदालत उचित समझे।
कोर्ट ने याचिकाकर्ता को आत्मसमर्पण करने से पहले ही छूट दे दी थी। जब्त की गई नकदी के संरक्षण का व्यापक मुद्दा भविष्य की सुनवाई के लिए खुला रखा गया है।
केस विवरण
केस टाइटल: अरुणा कुमारी बनाम इकोनॉमिक ऑफेंसेस यूनिट
केस नंबर: स्पेशल लीव टू अपील (Crl.) No. 7601/2025
पीठ: जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन
दिनांक: 24 अप्रैल, 2026

