राष्ट्रीय सुरक्षा सर्वोपरि: 26/11 के आरोपी फहीम अंसारी को ऑटो चलाने की अनुमति देने से बॉम्बे हाईकोर्ट का इनकार

बॉम्बे हाईकोर्ट ने 26/11 मुंबई आतंकी हमलों के मामले में बरी हो चुके फहीम अंसारी को पुलिस क्लीयरेंस सर्टिफिकेट देने से इनकार करने के फैसले को बरकरार रखा है। हाईकोर्ट ने कहा कि जन सुरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा के व्यापक हित में यह एक “एहतियाती कदम” है।

जस्टिस ए.एस. गडकरी और जस्टिस आर.आर. भोंसले की खंडपीठ ने अंसारी की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें पुलिस द्वारा ‘पब्लिक सर्विस व्हीकल’ (PSV) बैज के लिए जरूरी क्लीयरेंस न देने को चुनौती दी गई थी। मुंबई में व्यावसायिक रूप से ऑटो रिक्शा चलाने के लिए यह बैज अनिवार्य है।

फहीम अंसारी ने पिछले साल जनवरी में हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उन्होंने पुलिस के फैसले को “मनमाना, अवैध और भेदभावपूर्ण” बताते हुए तर्क दिया कि 2008 के आतंकी हमलों में बरी होने के बावजूद, अधिकारी उनके पुराने रिकॉर्ड का इस्तेमाल उनके मौलिक अधिकारों को रोकने के लिए कर रहे हैं। अंसारी का कहना था कि उन्हें सार्वजनिक सुविधाओं के माध्यम से आजीविका कमाने के अधिकार से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।

बता दें कि अंसारी पर 26 नवंबर 2008 को हुए आतंकी हमलों में लश्कर-ए-तैयबा के आतंकवादियों को लॉजिस्टिक सहायता प्रदान करने का आरोप था। हालांकि, 2010 में एक विशेष अदालत ने सबूतों के अभाव में उन्हें बरी कर दिया था, जिसे बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी बरकरार रखा। लेकिन पुलिस ने मौजूदा मामले में उनके अन्य “आपराधिक रिकॉर्ड” को आधार बनाकर सर्टिफिकेट देने से मना कर दिया।

राज्य सरकार ने याचिका का विरोध करते हुए कोर्ट के सामने एक गोपनीय खुफिया रिपोर्ट पेश की। अधिकारियों ने तर्क दिया कि चरित्र सत्यापन के दिशा-निर्देशों के अनुसार, गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि या पूर्व सजा वाले व्यक्तियों के मामले में प्रतिकूल टिप्पणी (Adverse Remark) देना अनिवार्य है।

READ ALSO  नीट पुनर्परीक्षा की मांग खारिज, राजस्थान हाईकोर्ट ने बिजली कटौती को अपर्याप्त आधार बताया

अंसारी को भले ही 26/11 मामले में बरी कर दिया गया हो, लेकिन उत्तर प्रदेश में सीआरपीएफ (CRPF) अधिकारियों पर हुए हमले के मामले में उन्हें दस साल जेल की सजा सुनाई गई थी। वह अपनी सजा पूरी करने के बाद ही ऑटो परमिट के लिए आवेदन कर रहे थे।

गोपनीय रिपोर्ट की समीक्षा करने के बाद, खंडपीठ ने माना कि पुलिस की आशंकाएं उचित हैं।

कोर्ट ने अपने फैसले में कहा, “शामिल अपराध अत्यंत गंभीर प्रकृति के थे और देश की सुरक्षा के लिए खतरा थे। पुलिस अधिकारियों ने खुफिया रिपोर्टों के आधार पर याचिकाकर्ता को ‘हाई पोटेंशियल रिस्क’ (उच्च संभावित जोखिम) माना है।”

बेंच ने आगे कहा कि “अंसारी के इस तरह की गतिविधियों में फिर से शामिल होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता” और पुलिस की सत्यापन प्रक्रिया पूरी तरह से दिशा-निर्देशों के अनुरूप थी।

READ ALSO  बॉम्बे हाईकोर्ट ने अपने साथ काम करने वाली महिला पुलिस नाइक के साथ बलात्कार करने और उसे धमकाने के बाद कथित तौर पर फरार पुलिस नाइक के खिलाफ उद्घोषणा आदेश को रद्द कर दिया

आजीविका के अधिकार पर अंसारी के दावे का जवाब देते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि उनके रोजगार के अवसर केवल “कुछ विशेष नौकरियों” तक ही सीमित हैं, जिनमें सार्वजनिक सुरक्षा जुड़ी हुई है। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि उनके लिए रोजगार के कई अन्य रास्ते अभी भी खुले हैं।

कोर्ट ने निष्कर्ष निकालते हुए कहा, “हमें सरकारी अधिकारियों की राय से अलग होने का कोई कारण नहीं दिखता और न ही इसमें कोई खामी पाई गई है।”

READ ALSO  फालता पुनर्मतदान: TMC उम्मीदवार जहांगीर खान पहुंचे कलकत्ता हाई कोर्ट, पुलिस की दंडात्मक कार्रवाई से मांगी सुरक्षा
Ad 20- WhatsApp Banner

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles