मुकदमे के खर्च का भुगतान न करने पर पति को नहीं मिलेगा राहत का लाभ: दिल्ली हाईकोर्ट ने पत्नी के बचाव के अधिकार को बहाल रखा

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में उस वैवाहिक अपील को खारिज कर दिया है जिसमें एक पति ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके जरिए उसकी पत्नी के जवाब (Written Statement) दाखिल करने के अधिकार को बहाल किया गया था। जस्टिस विवेक चौधरी और जस्टिस रजनीश कुमार गुप्ता की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि चूंकि पति ने अदालती आदेश के बावजूद समय पर मुकदमे के खर्च का भुगतान नहीं किया था, इसलिए वह पत्नी द्वारा जवाब दाखिल करने में हुई देरी का लाभ उठाकर उसके बचाव के अधिकार को खत्म करने की मांग नहीं कर सकता।

मामले की पृष्ठभूमि

अपीलकर्ता (पति) और प्रतिवादी (पत्नी) का विवाह 8 फरवरी, 2019 को हुआ था। वैवाहिक विवादों के कारण, पत्नी 2023 के उत्तरार्ध में अपने बच्चे के साथ घर छोड़कर चली गई। इसके बाद, पति ने द्वारका स्थित फैमिली कोर्ट में हिंदू विवाह अधिनियम (HMA) की धारा 13(1)(ia) के तहत तलाक की याचिका दायर की।

18 अप्रैल, 2024 को फैमिली कोर्ट ने पति को एक सप्ताह के भीतर पत्नी को मुकदमे के खर्च के रूप में ₹11,000 भुगतान करने का निर्देश दिया था और पत्नी को जवाब दाखिल करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया गया था। पति ने निर्धारित समय में भुगतान नहीं किया और पत्नी ने भी जवाब दाखिल नहीं किया। 20 सितंबर, 2024 को फैमिली कोर्ट ने पत्नी के बचाव के अधिकार (Defence) को इस आधार पर समाप्त कर दिया कि उसने जवाब दाखिल नहीं किया है। पति ने इस आदेश के पारित होने के बाद ही मुकदमे के खर्च का भुगतान किया।

बाद में, पत्नी ने इस आदेश को रद्द करने के लिए आवेदन किया। 5 फरवरी, 2026 को फैमिली कोर्ट ने पत्नी की याचिका स्वीकार करते हुए उसके बचाव के अधिकार को बहाल कर दिया। कोर्ट ने माना कि जवाब दाखिल न होने के लिए पति स्वयं जिम्मेदार है क्योंकि उसने समय पर खर्च का भुगतान नहीं किया था। पति ने इसी बहाली को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

पक्षकारों की दलीलें

अपीलकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि फैमिली कोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाला पत्नी का आवेदन अत्यधिक विलंबित था और इसे बिना किसी देरी माफी (Condonation of Delay) के आवेदन के दाखिल किया गया था। उन्होंने दावा किया कि सीपीसी के आदेश VIII नियम 1 के तहत निर्धारित वैधानिक समय सीमा का पूरी तरह उल्लंघन हुआ है। साथ ही, यह भी तर्क दिया गया कि पत्नी ने कार्यवाही में भाग लेकर और जिरह करके अपने अधिकारों को त्याग दिया था।

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वहीं, प्रतिवादी पत्नी ने स्वयं उपस्थित होकर फैमिली कोर्ट के फैसले का बचाव किया और पति द्वारा किए गए विलंब को मुख्य आधार बनाया।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

हाईकोर्ट ने पाया कि अपीलकर्ता ने स्वयं 25 अप्रैल, 2024 तक खर्च का भुगतान न करके अदालत के निर्देश का उल्लंघन किया था। खंडपीठ ने न्याय और समानता (Equity) के सिद्धांत पर जोर देते हुए कहा कि जो पक्ष सख्त समय सीमा लागू करना चाहता है, उसे पहले स्वयं अदालत के निर्देशों का पालन करना चाहिए।

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हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 23 का उल्लेख करते हुए हाईकोर्ट ने कहा:

“HMA की धारा 23 इस सिद्धांत को समाहित करती है कि किसी भी पक्ष को अपनी गलती का लाभ लेने की अनुमति नहीं दी जा सकती। हालांकि यह प्रावधान अंतिम निर्णय के चरण में लागू होता है, लेकिन इसका अंतर्निहित सिद्धांत समानता का है और इसे पूरी कार्यवाही के दौरान पक्षकारों के आचरण पर लागू होना चाहिए।”

अदालत ने आगे कहा कि पति के लिए यह अनिवार्य था कि वह समय पर मुकदमे के खर्च का भुगतान करे ताकि पत्नी अपना पक्ष ठीक से रख सके। हाईकोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा:

“अपीलकर्ता को अपने आचरण से प्रतिवादी को नुकसानदेह स्थिति में डालने और फिर उसी स्थिति का लाभ उठाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।”

जवाब दाखिल करने की समय सीमा पर हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के सलेम एडवोकेट बार एसोसिएशन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि जवाब दाखिल करने की ऊपरी समय सीमा निर्देशात्मक (Directory) है और उचित मामलों में इसमें छूट दी जा सकती है।

अदालत का निर्णय

हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के 5 फरवरी, 2026 के आदेश में कोई त्रुटि नहीं पाई। अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि फैमिली कोर्ट ने सही मायने में अपने विवेकाधिकार का उपयोग किया क्योंकि देरी के लिए पति स्वयं जिम्मेदार था।

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हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा:

“अपीलकर्ता, जिसने स्वयं अदालत के निर्देश का पालन नहीं किया, यह तर्क नहीं दे सकता कि पत्नी को देरी का परिणाम भुगतना चाहिए। ऐसी अनुमति देना अपीलकर्ता को उसकी अपनी चूक का लाभ लेने की अनुमति देने के समान होगा।”

इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने अपील और संबंधित आवेदनों को खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि ये टिप्पणियां केवल इस अपील तक सीमित हैं और फैमिली कोर्ट में लंबित मुख्य मामले के गुण-दोष को प्रभावित नहीं करेंगी।

मामले का विवरण:

  • केस शीर्षक: श्री निखिल भाटिया बनाम सुश्री सोनम सिंह भाटिया
  • केस संख्या: MAT.APP.(F.C.) 63/2026 एवं CM APPL. 12509/2026
  • पीठ: जस्टिस विवेक चौधरी और जस्टिस रजनीश कुमार गुप्ता
  • दिनांक: 5 मई, 2026

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