‘हर परंपरा पर सवाल उठे तो धर्म टूट जाएंगे’: धार्मिक रीति-रिवाजों पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी चेतावनी

क्या अदालतों को धर्म के हर छोटे-बड़े पहलू और परंपरा में हस्तक्षेप करना चाहिए? सुप्रीम कोर्ट की एक नौ-न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ ने गुरुवार को इस विषय पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। कोर्ट ने आगाह किया कि यदि न्यायपालिका हर धार्मिक अनुष्ठान की समीक्षा करने लगी, तो इससे न केवल धर्मों का ढांचा बिखर सकता है, बल्कि भारतीय सभ्यता की निरंतरता भी खतरे में पड़ सकती है।

चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें जस्टिस बी. वी. नागरत्ना और जस्टिस एम. एम. सुंदरेश समेत नौ न्यायाधीश शामिल हैं, ने स्पष्ट किया कि भारत एक ऐसी विविधतापूर्ण सभ्यता है जहां धर्म और जनजीवन आपस में गहराई से जुड़े हुए हैं।

जस्टिस बी. वी. नागरत्ना ने सुनवाई के दौरान एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया। उन्होंने कहा, “अगर हर कोई संवैधानिक अदालत में धार्मिक प्रथाओं पर सवाल उठाने लगेगा, तो इस सभ्यता का क्या होगा?” उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भारत की असली ताकत इसकी विविधता है, और मानव व धर्म के बीच का यह रिश्ता एक ‘स्थिर सत्य’ (constant) है जिसे सुरक्षित रखना आवश्यक है।

न्यायालय ने इस बात पर भी चिंता जताई कि धार्मिक मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप की बाढ़ आ सकती है। जस्टिस एम. एम. सुंदरेश ने चेतावनी देते हुए कहा, “अगर हर विवाद को कोर्ट में जगह दी गई, तो हर धर्म टूट जाएगा और हर संवैधानिक अदालत को बंद करना पड़ेगा।” उन्होंने कहा कि एक प्रगतिशील देश में हर सदस्य को हर अनुष्ठान से असहमत होने की अनुमति देना ‘प्रतिगामी’ (regressive) हो सकता है।

यह पूरी चर्चा उन याचिकाओं पर हो रही है जो धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के प्रवेश (जैसे सबरीमाला) और दाऊदी बोहरा समुदाय में ‘बहिष्कार’ (excommunication) जैसी प्रथाओं से जुड़ी हैं। मामला मुख्य रूप से 1986 की एक जनहित याचिका से शुरू हुआ है, जो 1962 के उस फैसले को चुनौती देती है जिसमें समुदाय के प्रमुख को सदस्यों को बहिष्कृत करने का अधिकार दिया गया था।

सुधारवादी गुट का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन ने दलील दी कि कोई भी प्रथा, जो व्यक्ति के मौलिक अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है, उसे संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत पूर्ण सुरक्षा नहीं मिल सकती। उन्होंने तर्क दिया कि धर्म के नाम पर सामाजिक या धर्मनिरपेक्ष कार्यों को संवैधानिक दायरे से बाहर नहीं रखा जाना चाहिए।

अधिवक्ता रामचंद्रन ने कोर्ट की चिंताओं का जवाब देते हुए कहा कि भारत ‘संविधान के तहत एक सभ्यता’ है। इसलिए, जो कुछ भी संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ है, उसे सभ्य समाज में जारी रखने की अनुमति नहीं दी जा सकती। उन्होंने कहा कि अदालतों का काम कठिन हो सकता है, लेकिन याचिकाओं की संख्या के डर से न्यायपालिका “हाथ नहीं खड़े कर सकती।”

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फिलहाल, यह संविधान पीठ इस जटिल संतुलन को सुलझाने की कोशिश कर रही है कि धार्मिक संप्रदायों की स्वायत्तता की रक्षा करते हुए नागरिकों के मौलिक अधिकारों को कैसे सुनिश्चित किया जाए।

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