BNSS की धारा 168 के तहत पुलिस नहीं दे सकती ‘इंजेक्शन’ जैसा आदेश: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कंपनी परिसर में प्रवेश रोकने वाले नोटिस पर लगाई रोक

इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ बेंच) ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 168 के तहत एक थाना प्रभारी द्वारा जारी किए गए नोटिस के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी है। हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में यह विचार करने की आवश्यकता है कि क्या पुलिस अधिकारी संज्ञेय अपराधों को रोकने की आड़ में ऐसे आदेश जारी कर सकते हैं जो ‘निषेधाज्ञा’ (Injunction) के समान हों।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता सोम शंकर और एक अन्य ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाकर सुशांत गोल्फ सिटी थाने के प्रभारी द्वारा 18 अप्रैल, 2026 को जारी किए गए नोटिस को चुनौती दी थी। BNSS की धारा 168 के तहत जारी इस नोटिस के जरिए लखनऊ के सुशांत गोल्फ सिटी स्थित AAIL (याचिकाकर्ताओं की कंपनी) के परिसर में प्रवेश को सीमित कर दिया गया था। याचिकाकर्ताओं ने यह मांग भी की कि प्रतिवादियों को कंपनी के शांतिपूर्ण कब्जे और कामकाज में हस्तक्षेप करने से रोका जाए।

याचिकाकर्ताओं के तर्क

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्री गौरव मेहरोत्रा, श्री अकबर अहमद और श्री नदीम मुर्तजा उपस्थित हुए। याचिकाकर्ताओं के अन्य वकीलों में सुश्री मारिया फातिमा और श्री वली नवाज खान शामिल थे।

याचिकाकर्ताओं ने मुख्य रूप से दो आधारों पर नोटिस का विरोध किया:

  1. निर्धारित प्रारूप का अभाव: उन्होंने तर्क दिया कि BNSS की दूसरी अनुसूची में विभिन्न नोटिस और आदेशों के लिए 58 फॉर्म दिए गए हैं। जहाँ धारा 166 के लिए फॉर्म 27 और धारा 189 के लिए फॉर्म 28 मौजूद है, वहीं धारा 168 के तहत नोटिस जारी करने का कोई प्रारूप नहीं दिया गया है। ऐसे में बिना कानूनी अधिकार के जारी यह नोटिस अधिकार क्षेत्र से बाहर है।
  2. वैधानिक शक्तियों का उल्लंघन: याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि धारा 168 पुलिस को अपराध रोकने के लिए हस्तक्षेप करने का अधिकार देती है, लेकिन यह ‘इंजेक्शन’ (स्टे) लगाने की शक्ति नहीं देती। नोटिस में कहा गया था कि केवल चुनिंदा कर्मचारी ही परिसर में प्रवेश कर सकेंगे और अन्य “अनधिकृत व्यक्ति” वर्जित होंगे। अधिवक्ता ने कहा कि यह प्रभावी रूप से थाना प्रभारी को यह तय करने का अधिकार दे देता है कि कौन “अधिकृत” है, जो कि नागरिक अधिकारों में हस्तक्षेप है।
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याचिकाकर्ताओं ने बॉम्बे हाईकोर्ट के शशिकांत भूरिया कोकानी बनाम महाराष्ट्र राज्य (2015) और धर्मसिंह रामसिंह बायस बनाम महाराष्ट्र राज्य (2024) के फैसलों का हवाला दिया, जो Cr.P.C. की धारा 149 (BNSS की धारा 168 के समान प्रावधान) पर आधारित थे।

प्रतिवादियों का पक्ष

प्रतिवादियों का प्रतिनिधित्व अपर महाधिवक्ता श्री वी.के. शाही और एजीए श्री एस.एन. तिल्हाड़ी ने किया।

श्री एस.एन. तिल्हाड़ी ने नोटिस का बचाव करते हुए कहा कि इसमें अपराध रोकने के स्पष्ट कारण दिए गए हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि नोटिस कर्मचारियों को नहीं, बल्कि केवल अनधिकृत व्यक्तियों को रोकने के लिए था। हालांकि, उन्होंने यह जानकारी लेने के लिए समय मांगा कि क्या नोटिस जारी करने से पहले संबंधित सहायक/उप पुलिस आयुक्त को सूचित किया गया था।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियाँ

जस्टिस राजेश सिंह चौहान और जस्टिस जफीर अहमद की खंडपीठ ने नोट किया कि नए BNSS ढांचे के तहत पुलिस की शक्तियों के दायरे को लेकर यह मामला महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न उठाता है।

हाईकोर्ट ने पूर्व के फैसलों का संदर्भ देते हुए कहा कि “इंटरपोज़” (हस्तक्षेप) का अर्थ अपराध को रोकने के लिए कदम उठाना है, न कि किसी के प्रवेश पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना। कोर्ट ने याचिकाकर्ता के तर्क को उद्धृत किया कि:

“…उक्त प्रावधान की आड़ में पुलिस अधिकारी ऐसा कोई आदेश जारी नहीं कर सकते जो इंजेक्शन (Injunction) के समान हो, क्योंकि इंजेक्शन देने की शक्ति केवल सक्षम न्यायालय या प्राधिकारी के पास है।”

हाईकोर्ट ने शशिकांत भूरिया कोकानी मामले की टिप्पणी को भी दोहराया:

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“दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 149 प्रत्येक पुलिस अधिकारी को संज्ञेय अपराध को रोकने के लिए हस्तक्षेप करने का अधिकार देती है… लेकिन हमारे अनुसार, यह धारा पुलिस अधिकारी को किसी भी पक्ष को कृषि भूमि में प्रवेश करने से रोकने वाला पूर्ण निषेधाज्ञा आदेश जारी करने का अधिकार नहीं देती है।”

निर्णय

हाईकोर्ट ने माना कि इस मामले पर विस्तार से विचार करने की जरूरत है और प्रतिवादियों को दो सप्ताह के भीतर जवाबी हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया।

अंतरिम राहत देते हुए हाईकोर्ट ने आदेश दिया:

“अगली सुनवाई की तिथि तक, 18.4.2026 के विवादित नोटिस (अनुलग्नक संख्या 1) के प्रभाव और कार्यान्वयन पर रोक रहेगी।”

इस मामले को अब 18 मई, 2026 से शुरू होने वाले सप्ताह में सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया है।

मामले का विवरण

  • केस टाइटल: सोम शंकर और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य
  • केस नंबर: क्रिमिनल मिसलेनियस रिट पिटीशन संख्या – 3996 ऑफ 2026
  • बेंच: जस्टिस राजेश सिंह चौहान, जस्टिस जफीर अहमद
  • तारीख: 29 अप्रैल, 2026

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