अगस्ता वेस्टलैंड केस: क्रिश्चियन मिशेल की रिहाई की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और जांच एजेंसियों से मांगा जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को अगस्ता वेस्टलैंड वीवीआईपी हेलीकॉप्टर घोटाले के कथित बिचौलिए क्रिश्चियन मिशेल जेम्स की जेल से रिहाई की मांग वाली याचिका पर विचार करने के लिए सहमति दे दी है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने केंद्र सरकार, केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) को नोटिस जारी कर चार सप्ताह के भीतर उनका पक्ष मांगा है।

यह कानूनी विवाद मुख्य रूप से 1999 की भारत-यूएई प्रत्यर्पण संधि की व्याख्या और मिशेल के उस दावे पर केंद्रित है, जिसमें उसने कहा है कि उसकी हिरासत अब अवैध हो चुकी है क्योंकि वह अधिकतम संभावित सजा काट चुका है।

ब्रिटिश नागरिक क्रिश्चियन मिशेल जेम्स को दिसंबर 2018 में दुबई से प्रत्यर्पित कर भारत लाया गया था। वह उन तीन कथित बिचौलियों में से एक है, जिनकी जांच 2010 के वीवीआईपी हेलीकॉप्टर सौदे में की जा रही है। सीबीआई का आरोप है कि इस सौदे से सरकारी खजाने को लगभग ₹2,666 करोड़ का नुकसान हुआ, जबकि ईडी का दावा है कि मिशेल को इस सौदे के बदले अगस्ता वेस्टलैंड से ₹225 करोड़ मिले थे।

यद्यपि मिशेल को फरवरी 2025 में सीबीआई मामले में सुप्रीम कोर्ट से और मार्च 2025 में ईडी मामले में हाईकोर्ट से जमानत मिल गई थी, लेकिन वह जमानत की शर्तों को पूरा न कर पाने के कारण अब भी जेल में है।

याचिकाकर्ता ने विशेष रूप से भारत-यूएई प्रत्यर्पण संधि के अनुच्छेद 17 की वैधता को चुनौती दी है। मिशेल के वकील ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष तर्क दिया कि दिल्ली हाईकोर्ट का यह मानना गलत था कि यह संधि किसी भी मौजूदा कानून पर हावी होगी।

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कानूनी तर्क यह है कि किसी प्रत्यर्पित व्यक्ति पर केवल उन्हीं अपराधों के लिए मुकदमा चलाया जा सकता है जिनके लिए उसका प्रत्यर्पण किया गया था। हालांकि, अनुच्छेद 17 जांच एजेंसियों को “जुड़े हुए अपराधों” (connected offences) के लिए भी मुकदमा चलाने की अनुमति देता है। मिशेल का दावा है कि इसी प्रावधान का उपयोग उसे अनिश्चितकाल तक जेल में रखने के लिए किया जा रहा है।

अपनी याचिका में मिशेल ने कहा कि 4 दिसंबर, 2025 तक उसने जेल में सात साल पूरे कर लिए हैं। उसने तर्क दिया कि जिन अपराधों के लिए उसका प्रत्यर्पण किया गया था, उनके लिए वह पहले ही अधिकतम सजा काट चुका है, इसलिए भारत में उसकी निरंतर हिरासत उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।

इसके साथ ही, याचिकाकर्ता ने 7 अगस्त, 2025 के उस ट्रायल कोर्ट के आदेश को भी चुनौती दी है, जिसमें दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 436A के तहत उसकी रिहाई के आवेदन को खारिज कर दिया गया था। धारा 436A एक विचाराधीन कैदी को रिहा करने की अनुमति देती है यदि उसने संबंधित अपराध के लिए निर्धारित अधिकतम सजा का आधा समय जेल में बिता लिया हो।

यह मामला शीर्ष अदालत में तब पहुंचा जब दिल्ली हाईकोर्ट ने 8 अप्रैल को मिशेल की याचिका खारिज कर दी थी। हाईकोर्ट ने कहा था कि मिशेल का प्रत्यर्पण उन अपराधों के मुकदमे का सामना करने के लिए किया गया था जो सीधे तौर पर इस मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि से जुड़े हैं, और इसलिए उसका अभियोजन संधि के दायरे में आता है।

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हाईकोर्ट ने यह भी टिप्पणी की थी कि मिशेल के लिए संधि से जुड़े उन मुद्दों को फिर से उठाना उचित नहीं है, जिन पर प्रथम दृष्टया सुप्रीम कोर्ट पहले ही विचार कर चुका है।

सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने निर्देश दिया है कि इस मामले को अब जुलाई में अगली सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाएगा। इससे पहले 24 अप्रैल को हुई कार्यवाही में, शीर्ष अदालत ने इस याचिका को वर्तमान बेंच के पास भेजा था क्योंकि आरोपी की पिछली याचिकाओं पर जस्टिस विक्रम नाथ की अध्यक्षता वाली बेंच ने सुनवाई की थी।

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फिलहाल, मिशेल विदेशी क्षेत्रीय पंजीकरण कार्यालय (FRRO) की निगरानी में रहेगा ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वह देश छोड़कर न जाए। साथ ही, नया पासपोर्ट तैयार होने पर उसे सीधे ट्रायल कोर्ट में जमा करने का आदेश भी प्रभावी है।

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