‘स्क्रिप्टेड जांच से निर्दोषों को चढ़ाया जा रहा सूली पर’: 2008 के असम मर्डर केस में सुप्रीम कोर्ट ने 16 आरोपियों को किया बरी

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को दोषपूर्ण आपराधिक जांच प्रणालियों पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि जहां एक ‘अकुशल जांच’ नुकसानदेह होती है, वहीं ‘स्क्रिप्टेड जांच’ के परिणाम ‘घातक’ होते हैं, खासकर तब जब निर्दोष व्यक्तियों को ‘सूली पर चढ़ाए जाने’ की आशंका हो।

जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने जुलाई 2008 में असम में दर्ज एक हत्या के मामले में आरोपियों को बरी करते हुए यह टिप्पणियां कीं। कोर्ट ने गहरा खेद व्यक्त किया कि 15 साल से अधिक समय बीतने और भारी सार्वजनिक धन खर्च होने के बावजूद वास्तविक अपराध अनसुलझा रह गया, जबकि आरोपियों को लंबे समय तक जेल की सलाखों के पीछे रहना पड़ा।

यह मामला जुलाई 2008 का है, जब अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया था कि एक पीड़ित और पांच अन्य लोग चार मोटरसाइकिलों पर घर लौट रहे थे। कथित तौर पर उन पर धारदार हथियारों से लैस व्यक्तियों के एक समूह ने हमला किया था। इस हमले में एक व्यक्ति की मौत हो गई थी और दो अन्य घायल हो गए थे।

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इस घटना के बाद 16 लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई। ट्रायल के दौरान एक आरोपी की मृत्यु हो गई। ट्रायल कोर्ट ने अंततः भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 (हत्या) सहित विभिन्न धाराओं के तहत 12 व्यक्तियों को दोषी ठहराया। मार्च 2021 में, गुवाहाटी हाईकोर्ट ने 11 व्यक्तियों की सजा को बरकरार रखा, जबकि एक को बरी कर दिया। इसके बाद दोषियों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, जिस दौरान दो और अपीलकर्ताओं की मृत्यु हो गई।

अपने विश्लेषण में, सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष के दावों की पुष्टि करने के लिए विश्वसनीय साक्ष्यों का भारी अभाव था। पीठ ने पुलिस द्वारा की गई कई प्रक्रियात्मक विफलताओं को रेखांकित किया:

  • साक्ष्य जुटाने में विफलता: जांच के दौरान जब्त किए गए हथियारों को कभी भी फोरेंसिक विश्लेषण के लिए नहीं भेजा गया।
  • प्रक्रियात्मक लापरवाही: हथियारों को न तो चश्मदीद गवाहों को दिखाया गया और न ही पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर के सामने रखा गया, ताकि यह पुष्टि हो सके कि वे अपराध में इस्तेमाल किए गए हथियार थे।
  • प्रारंभिक प्रतिक्रिया में त्रुटियां: कोर्ट ने नोट किया कि जो पुलिस अधिकारी घटना के तुरंत बाद मौके पर पहुंचे थे, वे दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC), 1973 के अनुसार आपराधिक जांच शुरू करने की अनिवार्य प्रक्रियाओं का पालन करने में विफल रहे।
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कोर्ट ने इस बात पर स्पष्ट राय नहीं दी कि ये खामियां “अज्ञानता, अक्षमता या दुर्भावनापूर्ण मंशा” का परिणाम थीं, लेकिन यह स्पष्ट किया कि परिणाम वही रहा: एक विफल अभियोजन और आरोपियों को फंसाने के लिए एक “स्क्रिप्टेड” कोशिश।

पीठ ने पूर्व-निर्धारित या मनगढ़ंत जांच से उत्पन्न होने वाले गंभीर खतरों पर जोर दिया।

कोर्ट ने टिप्पणी की, “एक अकुशल जांच या स्क्रिप्टेड जांच, दोनों ही आपराधिक अभियोजन के लिए घातक हैं; लेकिन बाद वाले के परिणाम तब और भी अधिक घातक हो जाते हैं जब पूरी तरह से निर्दोष व्यक्तियों को सूली पर चढ़ाए जाने की संभावना हो।”

जजों ने इस विफल प्रक्रिया की मानवीय कीमत पर दुख व्यक्त करते हुए कहा कि कई आरोपी “लंबे समय तक जेल में रहे” जबकि अन्य अपनी बेगुनाही साबित होने से पहले ही दुनिया छोड़ गए।

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सुप्रीम कोर्ट ने अपीलों को स्वीकार करते हुए सभी जीवित अपीलकर्ताओं को बरी कर दिया और गुवाहाटी हाईकोर्ट के 2021 के फैसले को रद्द कर दिया।

राज्य को दिए गए अंतिम सुझाव में, पीठ ने कहा कि असम राज्य और उसके गृह विभाग को जांच अधिकारियों को बेहतर ढंग से शिक्षित और प्रशिक्षित करने पर ध्यान देना चाहिए। कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि कर्मियों को कानूनी प्रक्रियाओं का उचित प्रशिक्षण देना अनिवार्य है ताकि वास्तविक अपराध अनसुलझे न रहें और निर्दोषों को अनावश्यक रूप से कानूनी प्रताड़ना न झेलनी पड़े।

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