युवावस्था की नासमझी और मामूली लंबित मामले पुलिस नियुक्ति से इनकार करने का आधार नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने एक सिपाही अभ्यर्थी की उम्मीदवारी रद्द करने के आदेश को निरस्त कर दिया है। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि युवाओं द्वारा की गई नासमझी और सामान्य प्रकृति के लंबित आपराधिक मामलों के कारण किसी व्यक्ति को जीवन भर के लिए अपराधी नहीं माना जाना चाहिए।

न्यायमूर्ति करुणेश सिंह पवार ने कहा कि मामूली या सुलझ चुके आपराधिक इतिहास वाले उम्मीदवारों की नियुक्ति के प्रति राज्य का दृष्टिकोण “दंडात्मक होने के बजाय सुधारात्मक” होना चाहिए। हाईकोर्ट ने पुलिस अधीक्षक, देवरिया को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता आकाश सिंह को तत्काल नियुक्ति पत्र जारी करें, जो कि लंबित मुकदमों के अंतिम परिणाम के अधीन होगा।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता आकाश सिंह ने उत्तर प्रदेश पुलिस भर्ती एवं प्रोन्नति बोर्ड द्वारा 23 दिसंबर, 2023 को जारी विज्ञापन के तहत आरक्षी (नागरिक पुलिस) पद के लिए आवेदन किया था। अगस्त 2024 में लिखित परीक्षा उत्तीर्ण करने और दस्तावेज़ सत्यापन के बाद, उन्हें अप्रैल 2025 में मेडिकल परीक्षण के लिए बुलाया गया।

इस प्रक्रिया के दौरान, याचिकाकर्ता ने 24 मई, 2025 को एक शपथ पत्र के माध्यम से अपने खिलाफ दर्ज तीन आपराधिक मामलों का ईमानदारी से खुलासा किया:

  1. मुकदमा अपराध संख्या 364/2021: धारा 352, 504 आईपीसी और वन संरक्षण अधिनियम।
  2. मुकदमा अपराध संख्या 13/2022: धारा 323, 504, 506 आईपीसी और एससी/एसटी अधिनियम।
  3. मुकदमा अपराध संख्या 711/2023: धारा 406, 419, 420, 467, 468 और 471 आईपीसी।
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चयन के बावजूद, पुलिस अधीक्षक, देवरिया ने 3 सितंबर, 2025 को एक आदेश जारी कर सिंह की उम्मीदवारी रद्द कर दी। यह कार्रवाई जिला मजिस्ट्रेट, सुल्तानपुर की सिफारिश पर की गई थी, जिसमें तीसरे मामले (711/2023) को “नैतिक अधमता” (moral turpitude) से जुड़ा मामला बताया गया था।

पक्षकारों की दलीलें

याचिकाकर्ता के वकील श्री उत्सव मिश्रा ने तर्क दिया कि रद्द करने का आदेश कानूनी रूप से गलत है क्योंकि जिस मुकदमे (711/2023) को मुख्य आधार बनाया गया था, उसे हाईकोर्ट की एक खंडपीठ ने 1 फरवरी, 2024 को ही श्रीमती दीपा सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में निरस्त कर दिया था। उन्होंने दलील दी कि अधिकारियों ने इस तथ्य पर गौर नहीं किया कि उम्मीदवारी रद्द करने के समय वह मुकदमा अस्तित्व में ही नहीं था।

अन्य दो मामलों के संबंध में वकील ने कहा कि उनमें आरोप सामान्य प्रकृति के हैं और अधिकतम सजा तीन से सात साल तक है। उन्होंने अवतार सिंह बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2016) मामले का हवाला देते हुए कहा कि लंबित मामलों का सच बताने पर किसी को अयोग्य नहीं ठहराया जाना चाहिए।

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राज्य के स्थायी अधिवक्ता ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि मुकदमा अपराध संख्या 711/2023 नैतिक अधमता की श्रेणी में आता है। राज्य के अनुसार, चूंकि याचिकाकर्ता को निचली अदालत से अभी तक दोषमुक्त नहीं किया गया है, इसलिए सरकारी आदेशों के तहत उसकी उम्मीदवारी रद्द करना उचित था।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता ने अपने विवरण में पूर्णतः सत्यता बरती थी। कोर्ट ने गौर किया कि अधिकारियों ने इस तथ्य की अनदेखी की कि सबसे गंभीर माने जाने वाले मुकदमे (711/2023) को खंडपीठ पहले ही निरस्त कर चुकी है, क्योंकि वह मामला व्यावसायिक प्रकृति का था और पक्षों के बीच सुलझ चुका था।

सुप्रीम कोर्ट के अवतार सिंह बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2016) 8 SCC 471 मामले में दिए गए दिशा-निर्देशों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:

“यदि किसी अभ्यर्थी ने मामूली प्रकृति के लंबित आपराधिक मामले के बारे में सच्चाई से जानकारी दी है, तो नियोक्ता मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए अपने विवेक से उम्मीदवार को नियुक्त कर सकता है।”

हाईकोर्ट ने भारतीय स्टेट बैंक बनाम पी. सौप्रमानियन (2019) 18 SCC 135 का भी उल्लेख किया और कहा कि “मारपीट या साधारण चोट के सभी मामलों को नैतिक अधमता की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।”

न्यायमूर्ति पवार ने इस बात पर जोर दिया कि शेष दो मामलों में याचिकाकर्ता की भूमिका सामान्य है और उन पर अभी फैसला आना बाकी है। हाईकोर्ट ने कहा:

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“युवावस्था की नासमझी और छोटे अपराधों के कारण किसी व्यक्ति को जीवन भर के लिए अपराधी का ठप्पा नहीं लगना चाहिए और राज्य का दृष्टिकोण सुधारात्मक होना चाहिए।”

हाईकोर्ट ने यह भी नोट किया कि राज्य ने याचिकाकर्ता के उस दावे का कोई जवाब नहीं दिया जिसमें कहा गया था कि लंबित आपराधिक मामलों वाले छह अन्य उम्मीदवारों को पहले ही नियुक्ति दी जा चुकी है।

निर्णय

हाईकोर्ट ने 3 सितंबर, 2025 के उम्मीदवारी निरस्तीकरण आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने पुलिस अधीक्षक, देवरिया (प्रतिवादी संख्या 6) को आदेश दिया कि वह आकाश सिंह को तत्काल नियुक्ति पत्र जारी करें। यह स्पष्ट किया गया कि यह नियुक्ति शेष दो आपराधिक मामलों के अंतिम परिणाम के अधीन रहेगी।

मामले का विवरण:

  • मामले का शीर्षक: आकाश सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व 6 अन्य
  • केस संख्या: WRITA No. 14466 of 2025
  • पीठ: न्यायमूर्ति करुणेश सिंह पवार
  • दिनांक: 24 अप्रैल, 2026

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