पारिवारिक कलह और बाल शोषण के आरोपों के बीच फंसी एक बच्ची के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण निर्णय दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कस्टडी की कानूनी जंग लड़ रहे माता-पिता के आपसी दावों की तुलना में बच्चे की मानसिक सुरक्षा, गरिमा और मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य को हमेशा प्राथमिकता दी जानी चाहिए। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमीकापम कोटिस्वर सिंह की पीठ ने एक मां की अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट के उस आदेश में बदलाव किया, जिसमें 10 साल की बच्ची की मनोवैज्ञानिक जांच के लिए चार सदस्यों वाले “विशेषज्ञों के पैनल” का गठन किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि यौन शोषण की कथित पीड़िता रही बच्ची को बार-बार और कई स्तरों पर मनोवैज्ञानिक जांच से गुज़ारना उसे दोबारा मानसिक आघात (री-ट्रॉमैटाइजेशन) और दोहरे उत्पीड़न (सेकेंडरी विक्टिमाइजेशन) के खतरे में डालता है।
“इस अदालत के सामने यह विवाद दो प्रतिस्पर्धी चिंताओं के चौराहे पर खड़ा है। एक तरफ माता-पिता में से किसी एक का बच्चे से दोबारा संपर्क स्थापित करने और मुलाक़ात का अधिकार पाने का दावा है; तो दूसरी तरफ संवैधानिक अदालतों का यह दायित्व है कि माता-पिता के आपसी मतभेदों और अलगाव के कारण पहले से ही टूटे हुए परिवार में रह रही बच्ची—जो अपने ही पिता द्वारा कथित यौन शोषण की शिकार भी है—उसे ऐसी प्रक्रियाओं से न गुज़ारा जाए जो उसके मानसिक आघात को और बढ़ा दें और उसके भावनात्मक सुधार को प्रभावित करें।”
मामले की पृष्ठभूमि
मामले में अपीलकर्ता मां और प्रतिवादी पिता का विवाह 10 फरवरी, 2015 को फरीदाबाद (हरियाणा) में हुआ था, जिसके बाद वे अमेरिका चले गए। वहां 24 जून, 2016 को न्यू जर्सी में उनकी बेटी का जन्म हुआ। मां का आरोप है कि 2018–2019 के दौरान अमेरिका में रहने के दौरान पिता ने उसके साथ शारीरिक हिंसा की और अपनी ही दो वर्षीय मासूम बेटी का यौन शोषण किया। 29 दिसंबर, 2019 को घरेलू हिंसा की एक गंभीर घटना के बाद, मां अपनी जान बचाने के लिए 30 दिसंबर, 2019 को बच्ची को लेकर भारत लौट आई।
भारत लौटने के बाद मां ने आपसी सहमति से तलाक के लिए नोटिस भेजा और समझौते के तहत 2.77 करोड़ रुपये की मांग की। इसके बाद दोनों पक्षों के बीच कस्टडी और मुलाक़ात के अधिकारों को लेकर तीव्र कानूनी संघर्ष शुरू हो गया। पिता ने कस्टडी के लिए पहले सुप्रीम कोर्ट (जिसे बाद में वापस ले लिया गया) और फिर बॉम्बे हाईकोर्ट में हैबियस कॉर्पस याचिका दायर की। इसी बीच, मां ने यौन शोषण के आरोपों को लेकर पुणे के येरवडा पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई। इसके आधार पर आईपीसी की धारा 376, 323, 504, 506 और पॉक्सो (POCSO) एक्ट की विभिन्न धाराओं के तहत ज़ीरो एफआईआर दर्ज की गई। हरियाणा के फरीदाबाद में भी इसी तरह की एफआईआर दर्ज कराई गई। सुप्रीम कोर्ट ने बाद में दोनों मामलों को पुणे स्थानांतरित कर एक महिला सहायक पुलिस आयुक्त (एसीपी) की निगरानी में जांच करने का निर्देश दिया था।
जब यह आपराधिक मामला लंबित था, तब पिता ने पुणे की फैमिली कोर्ट में अर्जी देकर मांग की कि एक स्वतंत्र बाल मनोवैज्ञानिक विशेषज्ञ नियुक्त किया जाए जो बच्ची की स्थिति, रहने के माहौल और माता-पिता दोनों का मूल्यांकन करे ताकि पिता का बच्ची से दोबारा संपर्क बहाल हो सके। फैमिली कोर्ट ने 28 अप्रैल, 2022 को इस अर्जी को खारिज कर दिया। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि पिता पर पॉक्सो एक्ट के गंभीर आरोप हैं, बच्ची पहले से ही एक योग्य क्लिनिकल थेरेपिस्ट (डॉ. मृदुला आप्टे) की देखरेख में है, और ऐसे में बच्ची को पिता के सामने लाना या किसी नए मूल्यांकन से गुज़ारना उसके लिए नुकसानदेह हो सकता है।
इस फैसले के खिलाफ अपील पर सुनवाई करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट ने 7 जनवरी, 2023 को फैमिली कोर्ट को निर्देश दिया कि जलगांव में बाल मनोविज्ञान के किसी स्वतंत्र विशेषज्ञ को नियुक्त किया जाए। हालांकि, पिता ने बाद में एक अंतरिम आवेदन दायर कर कहा कि जलगांव में ऐसे विशेषज्ञ उपलब्ध नहीं हैं और अपनी ओर से कुछ नाम सुझाते हुए विशेषज्ञों का एक पैनल गठित करने की मांग की। इस पर हाईकोर्ट ने 27 अप्रैल, 2023 को अपने आदेश में संशोधन कर “विशेषज्ञ” शब्द के स्थान पर “विशेषज्ञों का पैनल” शब्द जोड़ दिया। इसके बाद 7 दिसंबर, 2023 को हाईकोर्ट ने चार विशेषज्ञों का एक पैनल गठित कर दिया, जिसमें महाराष्ट्र से बाहर के और अमेरिका के विशेषज्ञ भी शामिल थे। मां ने हाईकोर्ट के इन दोनों फैसलों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता मां की ओर से कोर्ट में दलील दी गई कि हाईकोर्ट के निर्देश से बच्ची को आरोपी पिता के कहने पर कई डॉक्टरों और विशेषज्ञों के सामने बार-बार पेश होना पड़ेगा, जिससे वह गहरी मानसिक परेशानी और दोबारा आघात का शिकार होगी। यह भी तर्क दिया गया कि पैनल में शामिल डॉक्टरों के नाम मुख्य रूप से पिता द्वारा ही सुझाए गए थे, जिससे संस्थागत निष्पक्षता प्रभावित होती है। पिता इस प्रक्रिया का इस्तेमाल केवल पॉक्सो के आरोपों को झूठा साबित करने और “पेरेंटल एलीनेशन सिंड्रोम” (माता-पिता से अलगाव का सिंड्रोम) व “फॉल्स मेमोरी क्रिएशन” (झूठी यादें गढ़ने) जैसे सिद्धांतों की आड़ लेने के लिए कर रहे हैं।
दूसरी ओर, प्रतिवादी पिता ने दलील दी कि पॉक्सो के आरोप पूरी तरह से झूठे, मनगढ़ंत और वैवाहिक विवाद से प्रेरित हैं। उन्होंने कहा कि मां ने जानबूझकर बच्ची को पिता से अलग कर दिया है। मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन केवल बच्ची के साथ भावनात्मक संबंध फिर से जोड़ने के उद्देश्य से मांगा गया था और इसमें बच्ची को परेशान करने का कोई इरादा नहीं था। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि मां ने हाईकोर्ट में विशेषज्ञों के नाम सुझाने की प्रक्रिया में भाग लिया था, इसलिए अब वह इस पैनल के गठन का विरोध नहीं कर सकती।
कोर्ट का विश्लेषण और नजीरें
सुप्रीम कोर्ट ने लंबित पॉक्सो मामलों में बच्चों के न्यायिक रूप से निर्देशित मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन के कानूनी पहलुओं की गहन जांच की। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्याय प्रणाली को बच्चों के प्रति संवेदनशील और मानसिक आघात को समझने वाला (ट्रॉमा-इन्फॉर्म्ड) होना चाहिए, जिसके लिए पॉक्सो एक्ट की धारा 24, 33(5), 36 और 39 में स्पष्ट सुरक्षा उपाय दिए गए हैं।
कोर्ट ने टिप्पणी की:
“कानून का मुख्य जोर केवल साक्ष्य एकत्र करने पर ही नहीं है, बल्कि पूरी प्रक्रिया के दौरान बच्चे की भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक सुरक्षा को बनाए रखने पर भी है, विशेषकर तब जब इसमें बच्चे के साथ सीधा संवाद शामिल हो।”
पीठ ने माना कि हाईकोर्ट ने यह समझने में गंभीर चूक की कि कई विशेषज्ञों के बार-बार मूल्यांकन से बच्ची के मानसिक स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ेगा। कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट यह बताने में विफल रहा कि एकल विशेषज्ञ का मूल्यांकन क्यों पर्याप्त नहीं था और चार डॉक्टरों का पैनल न्यूनतम हस्तक्षेप के सिद्धांत के अनुकूल कैसे था। कोर्ट ने सचेत किया कि अदालतों को यह ध्यान रखना चाहिए कि ऐसे मूल्यांकन मुकदमों के हथियार न बनें।
“न्याय वितरण प्रणाली बच्चे को केवल एक साक्ष्य की वस्तु नहीं मान सकती जिसे विवाद कर रहे पक्षों के दावों को संतुष्ट करने के लिए बार-बार फॉरेंसिक या मनोवैज्ञानिक जांच से गुज़रना पड़े। बच्चे की मनोवैज्ञानिक अखंडता एक स्वतंत्र और सर्वोपरि विचार है जिसे बनाए रखने के लिए अदालतें कर्तव्यबद्ध हैं।”
कोर्ट ने कई महत्वपूर्ण पूर्व निर्णयों का हवाला दिया:
- साक्षी बनाम भारत संघ: जिसमें कोर्ट ने अदालती प्रक्रियाओं के दौरान बाल पीड़ितों के दोबारा आघात को रोकने के लिए कई दिशानिर्देश जारी किए थे।
- गौरव नागपाल बनाम सुमेधा नागपाल: जिसमें यह स्पष्ट किया गया कि बच्चे के कल्याण को नैतिक, शारीरिक, भावनात्मक और शैक्षिक विकास के व्यापक संदर्भ में देखा जाना चाहिए और कोर्ट के पेरेंस पैट्रिए (अभिभावक) क्षेत्राधिकार की पुष्टि की गई।
- यशिता साहू बनाम राजस्थान राज्य और राजेश्वरी चंद्रशेखर गणेश बनाम तमिलनाडु राज्य: जिसमें कोर्ट ने निर्णय दिया कि विदेशी अदालतों के आदेश या आपसी सौहार्द के सिद्धांत भी बच्चे के कल्याण के सर्वोपरि विचार के अधीन ही रहेंगे।
- थ्रिटी होमी दोलीकुका बनाम होशियाम शवाक्शा दोलीकुका: जिसमें सचेत किया गया कि संवेदनशील बच्चों के बार-बार साक्षात्कार या जांच से उनके कोमल मन पर गहरी उदासी, तनाव और अवसाद छा जाता है।
- विवेक सिंह बनाम रोमानी सिंह: जिसमें “पेरेंटल एलीनेशन सिंड्रोम” (पीएएस) के उन विनाशकारी मनोवैज्ञानिक प्रभावों को रेखांकित किया गया जो बच्चे को माता-पिता में से किसी एक को चुनने के लिए मजबूर करते हैं।
- कर्नल रमनीश पाल सिंह बनाम सुगंधी अग्रवाल: जिसमें स्पष्ट किया गया कि: “अदालतों को समय से पहले और अलगाववादी व्यवहार के विशिष्ट मामलों की पहचान किए बिना किसी भी माता-पिता को ऐसे व्यवहार को बढ़ावा देने वाले के रूप में चिन्हित नहीं करना चाहिए।”
इसके अतिरिक्त, कोर्ट ने बेंगलुरु के राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य और तंत्रिका विज्ञान संस्थान (NIMHANS) द्वारा 2025 में प्रकाशित एक गुणात्मक अध्ययन का हवाला दिया। इस अध्ययन में माता-पिता के विवादों के कारण बच्चों में गिरते शैक्षणिक स्तर, सामाजिक शर्मिंदगी और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को दर्शाया गया है। कोर्ट ने कहा कि माता-पिता के मानसिक स्वास्थ्य की जांच भी उतनी ही जरूरी है:
“हमारा यह भी मानना है कि अदालतों को अपना पूरा ध्यान केवल बच्चे के मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन पर ही केंद्रित नहीं करना चाहिए, बल्कि माता-पिता के मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन पर भी ध्यान देना चाहिए।”
अदालतों को चेतावनी देते हुए कोर्ट ने कहा:
“जिस क्षण यह मूल्यांकन बच्चे द्वारा लगाए गए आरोपों की पुष्टि करने या उन्हें खारिज करने के उद्देश्य से एक प्रतिकूल या विरोधाभासी प्रक्रिया का रूप ले लेता है, तो यह अपनी उपचारात्मक प्रासंगिकता खो देता है। इससे न्यायिक प्रक्रिया में शामिल बच्चे का विश्वास, आराम और मनोवैज्ञानिक सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है।”
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेशों में संशोधन किया और मामले को पुणे की फैमिली कोर्ट को वापस भेजते हुए निम्नलिखित निर्देश जारी किए:
- माता-पिता का मूल्यांकन: फैमिली कोर्ट एक योग्य मनोवैज्ञानिक नियुक्त करेगी जो माता-पिता दोनों (विशेषकर मां, जिसके पास वर्तमान में कस्टडी है) के मानसिक और मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य का आकलन करेंगे।
- मौजूदा थेरेपिस्ट से परामर्श: नियुक्त मनोवैज्ञानिक बच्ची का इलाज कर रहे वर्तमान थेरेपिस्ट से बात करेंगे और बच्ची की स्थिति का पता लगाएंगे, उसे सीधे किसी नए मूल्यांकन में शामिल नहीं किया जाएगा।
- रिपोर्ट सौंपना: मनोवैज्ञानिक अपनी रिपोर्ट फैमिली कोर्ट को सौंपेंगे।
- बच्ची के मूल्यांकन पर फैसला: फैमिली कोर्ट माता-पिता और थेरेपिस्ट की रिपोर्ट के आधार पर तय करेगी कि क्या इस स्तर पर बच्ची का प्रत्यक्ष मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन आवश्यक है। यदि आवश्यक नहीं है, तो कोई जांच नहीं होगी। यदि आवश्यक हुआ, तो यह न्यूनतम हस्तक्षेप के साथ किसी एक स्वतंत्र बाल मनोवैज्ञानिक द्वारा ही किया जाएगा।
- नियमित समीक्षा: फैमिली कोर्ट बच्ची की बढ़ती उम्र के साथ समय-समय पर उसकी आवश्यकताओं की समीक्षा करेगी।
- अलगाव के प्रभाव की जांच: कोर्ट बिना बच्ची को सीधे परेशान किए उसके थेरेपिस्ट की रिपोर्ट के आधार पर यह सुनिश्चित करेगी कि मां के प्रभाव में बच्ची के भीतर पिता के प्रति कोई झूठी यादें या अलगाव की भावना तो विकसित नहीं हो रही है।
सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे मामलों के लिए 20 सूत्रीय मार्गदर्शक सिद्धांत भी जारी किए, जो न्यूनतम हस्तक्षेप, गोपनीयता, थेरेपिस्ट की निरंतरता, और संवेदनशील अदालती प्रक्रियाओं पर जोर देते हैं। कोर्ट ने अंत में निर्देश दिया:
“ऐसा करते समय अदालत को यह सुनिश्चित करना होगा कि बच्चे को बेवजह के हस्तक्षेप, बार-बार की जांच या अनावश्यक मनोवैज्ञानिक बोझ से बचाया जाए। हर स्तर पर सबसे मुख्य विचार बच्चे का सर्वोत्तम हित, गरिमा, भावनात्मक सुरक्षा और मनोवैज्ञानिक कल्याण होना चाहिए।”
कोर्ट ने दोनों पक्षों को निर्देश दिया कि वे फैमिली कोर्ट को पिता के खिलाफ लंबित पॉक्सो मामले की प्रगति से अवगत कराते रहें, क्योंकि इसका बच्ची से मिलने या कस्टडी के अधिकार पर गहरा प्रभाव पड़ेगा।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: शीतल वसंत ठाकुर बनाम चिराग अरोड़ा
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 2026 (विशेष अनुमति याचिका (सिविल) संख्या 18701-18702 ऑफ 2024 से उत्पन्न)
पीठ: जस्टिस संजय करोल, जस्टिस नोंगमीकापम कोटिस्वर सिंह
निर्णय की तिथि: 11 जून, 2026

