सिर्फ शंका के आधार पर नहीं मिल सकता तलाक: व्यभिचार के आरोपों पर झारखंड हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय

झारखंड हाईकोर्ट ने एक मामले में पति की तलाक की अपील खारिज करते हुए कहा है कि केवल शंका या निराधार आरोपों के आधार पर शादी को समाप्त नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि पत्नी पर व्यभिचार (अडल्ट्री) का आरोप सिद्ध करने के लिए स्पष्ट और विश्वसनीय साक्ष्य का होना अनिवार्य है, क्योंकि ऐसे आरोपों से जुड़े व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा पर गंभीर और दूरगामी असर पड़ता है।

सबूत के बिना आरोप अमान्य

जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने 23 जुलाई को अपने आदेश में कहा कि पति ने अपनी याचिका में पत्नी के किसी अन्य व्यक्ति के साथ संबंध होने का सामान्य दावा तो किया, लेकिन किसी विशिष्ट घटना या ठोस साक्ष्य का उल्लेख नहीं किया। अदालत के अनुसार, पति द्वारा लगाए गए आरोप केवल उसकी निजी शंकाओं और अनुमानों पर टिके हैं।

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पीठ का कहना था कि व्यभिचार को साबित करने के लिए ऐसे परिस्थितिजन्य साक्ष्य प्रस्तुत किए जाने चाहिए जो किसी स्पष्ट निष्कर्ष तक पहुंचाते हों। बिना किसी साक्ष्य के लगाए गए आरोपों को तलाक की डिक्री का आधार नहीं बनाया जा सकता।

दहेज उत्पीड़न और कानूनी कार्रवाई

मामले की जांच करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि पति द्वारा लगाए गए आरोप पत्नी द्वारा पुलिस में शिकायत दर्ज कराने के बाद जवाबी कार्रवाई के रूप में सामने आए। वहीं दूसरी ओर, पत्नी की ओर से क्रूरता, उपेक्षा और दहेज उत्पीड़न के संबंध में दी गई गवाही संगत पाई गई और उसे कानूनी साक्ष्यों से समर्थन मिला।

अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार, 1987 में शादी के बाद से ही महिला को अतिरिक्त दहेज के लिए प्रताड़ित किया गया, भोजन से वंचित रखा गया और मारपीट के कारण उसका गर्भपात भी हुआ। बाद में उसे घर से निकाल दिया गया। इसके जवाब में महिला ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A और 307 के तहत आपराधिक मामला दर्ज कराया था। हाईकोर्ट ने कहा कि महिला द्वारा कानूनी कदम उठाना उसके बयानों को और अधिक विश्वसनीय बनाता है।

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तीन दशक से जारी कानूनी जंग

यह विवाद 3 जुलाई 1987 को हिंदू रीति-रिवाज से संपन्न हुए विवाह से शुरू हुआ था। लगभग 15 साल तक साथ रहने के बाद पति ने क्रूरता और बाद में व्यभिचार के आधार पर तलाक की याचिका दाखिल की। पति ने आरोप लगाया कि पत्नी लगातार झगड़ा करती थी, दांपत्य संबंधों से मना करती थी, आत्महत्या की धमकी देती थी और बिना बताए घर छोड़कर चली गई थी। पत्नी ने इन सभी बातों का खंडन किया और कहा कि वह साथ रहने को तैयार थी, लेकिन पति ने मुकदमा जारी रखा और इस दौरान दूसरी शादी कर ली।

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इस मामले में पारिवारिक अदालत ने सबसे पहले 2011 में पति को तलाक की मंजूरी दी थी। हालांकि, हाईकोर्ट ने 2016 में उस फैसले को रद्द कर दिया और नए सिरे से साक्ष्य दर्ज करने के निर्देश के साथ मामला वापस भेज दिया। दोबारा सुनवाई के बाद पारिवारिक अदालत ने जनवरी 2019 में पति की याचिका खारिज कर दी। हाईकोर्ट के ताजा फैसले ने पारिवारिक अदालत के 2019 के उसी आदेश को बरकरार रखते हुए पति की अपील को पूरी तरह खारिज कर दिया है।

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