गुरुग्राम के जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने जीडी गोयनका सिग्नेचर स्कूल को एक महिला के दो बच्चों की दाखिला और पंजीकरण फीस के रूप में जमा कराए गए 90,000 रुपये लौटाने का निर्देश दिया है। आयोग ने 24 घंटे के भीतर आए दाखिला रद्द करने के आवेदन के बावजूद पैसे वापस न करने को स्कूल की सेवा में गंभीर कमी करार दिया है।
उपभोक्ता फोरम ने केवल पूरी फीस वापस करने का आदेश दिया, बल्कि शिकायतकर्ता को हुए मानसिक कष्ट के लिए 20,000 रुपये का मुआवजा और 11,000 रुपये कानूनी प्रक्रिया का खर्च भी स्कूल द्वारा भुगतान करने का फैसला सुनाया।
कोरोना के कारण बिगड़े हालात, रद्द करनी पड़ी योजना
यह मामला उस समय का है जब गुरुग्राम के सेक्टर-92 (क्रेसेंट पार्क) की रहने वाली एक महिला ने अपने परिवार के सोहना स्थानांतरित होने की योजना के तहत अपने दो बच्चों का दाखिला सोहना रोड स्थित जीडी गोयनका सिग्नेचर स्कूल में कराने का निर्णय लिया। महिला ने दोनों बच्चों के लिए 5,000 रुपये पंजीकरण शुल्क और 40,000 रुपये प्रवेश शुल्क के हिसाब से कुल 90,000 रुपये का भुगतान किया।
हालांकि, कोविड-19 महामारी की वजह से अचानक पैदा हुई आर्थिक तंगी के कारण परिवार को सोहना शिफ्ट होने का फैसला टालना पड़ा। फीस भुगतान करने के ठीक अगले दिन, यानी 30 जनवरी 2021 को महिला ने स्कूल प्रबंधन से संपर्क कर दाखिला रद्द करने और जमा राशि लौटाने का अनुरोध किया।
स्कूल ने नो-रिफंड पॉलिसी का दिया हवाला
स्कूल प्रशासन ने महिला की मांग को यह कहते हुए ठुकरा दिया कि उसकी फीस नीति के अनुसार पंजीकरण और प्रवेश शुल्क गैर-वापसी योग्य (नॉन-रिफंडेबल) हैं। संस्था का दावा था कि अभिभावक ने फीस जमा करते समय इन नियमों और शर्तों को स्वीकार किया था, इसलिए राशि न लौटाना कानूनन सही है।
बिना सेवा दिए फीस रोकना गैर-वाजिब
आयोग के अध्यक्ष संजीव जिंदल और सदस्य ज्योति सिवाच व खुशविंदर कौर की पीठ ने 15 जुलाई के अपने फैसले में स्कूल के तर्कों को खारिज कर दिया। आयोग ने पाया कि महिला ने भुगतान रसीद, ईमेल संचार और कानूनी नोटिस जैसे पर्याप्त दस्तावेजी सबूत प्रस्तुत किए, जबकि स्कूल अपनी सफाई में कोई ठोस साक्ष्य नहीं दे सका।
पीठ ने रेखांकित किया कि फीस वापसी की मांग नया शैक्षणिक सत्र शुरू होने और कोई भी शैक्षणिक गतिविधि प्रारंभ होने से पहले ही कर दी गई थी। इस दौरान न तो बच्चों का कोई इंटरव्यू हुआ था और न ही जन्म प्रमाण पत्र, टीसी या पिछली कक्षा की मार्कशीट जैसे कोई अनिवार्य दस्तावेज जमा कराए गए थे।
उपभोक्ता आयोग ने स्पष्ट किया कि जब तक कोई संस्थान सेवाएं देना शुरू नहीं करता, तब तक वह ‘नो-रिफंड’ क्लॉज की आड़ लेकर पूरी राशि नहीं रख सकता। आयोग के अनुसार, बिना कोई सेवा दिए उपभोक्ताओं के पैसे रोकना अनुचित व्यापारिक आचरण और सेवा में लापरवाही की श्रेणी में आता है।

