अनुकंपा नियुक्ति: सरकारी लेटलतीफी की सजा आवेदक को नहीं मिल सकती, कलकत्ता हाईकोर्ट ने खारिज अर्जी पर फिर विचार करने का दिया निर्देश

कलकत्ता हाईकोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार के उस आदेश को निरस्त कर दिया है, जिसके तहत चार साल की देरी का हवाला देकर एक व्यक्ति की अनुकंपा नियुक्ति की अर्जी खारिज कर दी गई थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रशासन की लंबी निष्क्रियता और लेटलतीफी का खामियाजा आवेदक पर नहीं डाला जा सकता। इसके साथ ही अदालत ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे समय-सीमा की बंदिश लगाए बिना याचिकाकर्ता की योग्यता के आधार पर नए सिरे से विचार करें।

जस्टिस रितोब्रतो कुमार मित्रा ने 8 सितंबर को यह आदेश लक्ष्मण डोम की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। लक्ष्मण के पिता पश्चिम बंगाल सरकार में कर्मचारी थे, जिनका सेवाकाल के दौरान निधन हो गया था। हाईकोर्ट ने अधिकारियों के उदासीन रवैये पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि अनुकंपा नियुक्ति जैसे मामलों में प्रशासन को इस स्तर की संवेदनहीनता बरतने की अनुमति कतई नहीं दी जा सकती।

प्रशासनिक ढिलाई और परिवार पर दोहरी मार

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मामले के अनुसार, पश्चिम बंगाल सरकार के कर्मचारी रहे याचिकाकर्ता के पिता का निधन 28 सितंबर 2020 को हुआ था। परिवार पर अचानक आए संकट को देखते हुए मृतक कर्मचारी की पत्नी ने दिसंबर 2020 में अपने छोटे बेटे के लिए अनुकंपा के आधार पर नौकरी का आवेदन दिया था।

सरकारी अधिकारियों ने इस अर्जी पर साढ़े तीन साल से भी अधिक समय तक कोई निर्णय नहीं लिया और फाइल लंबित पड़ी रही। इसी प्रशासनिक लेटलतीफी के बीच, सितंबर 2023 में छोटे बेटे की भी असामयिक मृत्यु हो गई। छोटे भाई के निधन के बाद बड़े बेटे लक्ष्मण डोम ने अनुकंपा नियुक्ति के लिए अपना नया आवेदन प्रस्तुत किया। इसके बाद जुलाई 2024 में पूरी हुई विभागीय जांच रिपोर्ट में यह बात सामने आई कि लक्ष्मण इस पद के लिए पूरी तरह योग्य हैं।

समय-सीमा का अनुचित आधार

जांच में योग्य पाए जाने के बावजूद, अधिकारियों ने 5 दिसंबर 2024 को लक्ष्मण की अर्जी को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि पिता के निधन के चार साल बीत जाने के बाद आवेदन किया गया है, इसलिए इतने समय बाद इस पर विचार नहीं किया जा सकता। लक्ष्मण ने सरकार के इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी।

जस्टिस मित्रा ने सरकार के इस रुख को मनमाना और अन्यायपूर्ण बताया। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता अपने छोटे भाई के जीवित रहते और उसकी अर्जी लंबित रहने के दौरान खुद आवेदन नहीं कर सकता था। कोर्ट ने रेखांकित किया कि दिसंबर 2020 से सितंबर 2023 के बीच की देरी पूरी तरह से सरकारी लापरवाही के कारण हुई थी, लिहाजा राज्य सरकार अपनी ही विफलता को आधार बनाकर याचिकाकर्ता के खिलाफ समय-सीमा का डंडा नहीं चला सकती।

शोकाकुल परिवार के सम्मानजनक जीवन का सवाल

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कोर्ट ने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति देने का मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि दिवंगत कर्मचारी का परिवार सम्मानजनक जीवन जी सके। लेकिन आवेदन को वर्षों तक अटकाए रखकर प्रशासन इस मूल उद्देश्य को ही पूरी तरह समाप्त कर देता है।

अदालत ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि उदासीनता का आलम यह रहा कि छोटे बेटे की अर्जी लंबित रहने के दौरान ही उसकी जान चली गई। कोर्ट ने आगे कहा कि भले ही यह परिस्थितियों की विडंबना हो, लेकिन इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता कि अधिकारियों ने अपनी घोर उपेक्षा से इस विडंबना को और गहरा किया है।

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चूंकि सरकार ने लक्ष्मण की अर्जी को योग्यता के बजाय केवल समय बीतने के आधार पर खारिज किया था, इसलिए हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह समय-सीमा की शर्त हटाकर गुण-दोष के आधार पर इस आवेदन का नए सिरे से मूल्यांकन करे।

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