सुप्रीम कोर्ट ने देश में कानूनी शिक्षा के नियमन और समीक्षा के लिए एक समर्पित विशेषज्ञ निकाय गठित करने की आवश्यकता पर बल दिया है। शीर्ष अदालत ने कहा कि वर्तमान दौर विशेषज्ञ संस्थाओं का है, लिहाजा विधि शिक्षा के लिए भी एक अलग विशेषज्ञ समिति होनी चाहिए। अदालत ने पाठ्यक्रम और कोर्स की अवधि से जुड़े इस मुद्दे को बेहद अहम बताते हुए स्पष्ट किया कि इस पूरी व्यवस्था में केंद्र सरकार की बड़ी भूमिका है और उसे इस दिशा में ठोस योजना के साथ आगे आना चाहिए।
यह टिप्पणी चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन सदस्यीय बेंच ने मंगलवार को की। अदालत वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें वकालत की पढ़ाई के ढांचे में व्यापक सुधार की मांग की गई है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति और मौजूदा व्यवस्था पर सवाल
याचिका में कहा गया है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 सभी अकादमिक और पेशेवर क्षेत्रों में चार वर्षीय स्नातक पाठ्यक्रमों को बढ़ावा देती है। इसके बावजूद बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने एलएलबी और एलएलएम जैसे अहम पाठ्यक्रमों के मौजूदा सिलेबस, कैरिकुलम और अवधि की समीक्षा करने के लिए कोई जरूरी कदम नहीं उठाए हैं।
याचिकाकर्ता ने अदालत से अनुरोध किया है कि वह केंद्र सरकार को एक कानूनी शिक्षा आयोग या विशेषज्ञ समिति गठित करने का निर्देश दे। इस प्रस्तावित समिति में प्रख्यात शिक्षाविदों, न्यायविदों, रिटायर्ड जजों, वकीलों और प्रोफेसरों को शामिल किए जाने की मांग की गई है, जो एलएलबी और एलएलएम पाठ्यक्रमों के प्रारूप की गहन समीक्षा कर सकें।
पांच वर्षीय इंटीग्रेटेड कोर्स की अवधि और लागत पर चिंता
याचिका में पांच साल के बीए-एलएलबी और बीबीए-एलएलबी जैसे इंटीग्रेटेड पाठ्यक्रमों के समय पर भी गंभीर आपत्ति जताई गई है। याचिका के अनुसार, इन कोर्सों की पांच साल की अवधि उनमें पढ़ाए जाने वाले पाठ्यक्रम के लिहाज से बहुत अधिक और असंगत है।
अदालत को अवगत कराया गया कि कोर्स का समय लंबा होने की वजह से छात्रों और उनके परिवारों पर भारी आर्थिक बोझ पड़ता है। याचिका में दावा किया गया कि पढ़ाई की यह अत्यधिक लंबी अवधि और भारी-भरकम खर्च वकालत की पढ़ाई करने के इच्छुक छात्रों को हतोत्साहित कर रहा है, जिसके चलते इस पूरी व्यवस्था की नए सिरे से समीक्षा जरूरी हो गई है।

