मद्रास हाईकोर्ट ने दिए नवविवाहिता की मौत की नई पोस्टमार्टम और एसआईटी जांच के आदेश

तमिलनाडु के शिवगंगा जिले में 24 वर्षीय नवविवाहिता की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत के मामले में मद्रास हाईकोर्ट ने नए सिरे से जांच और दोबारा पोस्टमार्टम कराने का निर्देश दिया है। अदालत ने पुलिस जांच पर सवाल उठने और पहली पोस्टमार्टम रिपोर्ट में गंभीर खामियां सामने आने के बाद यह फैसला सुनाया।

मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस एल विक्टोरिया गौरी की पीठ ने राज्य के चिकित्सा शिक्षा और अनुसंधान निदेशक को 24 घंटे के भीतर विशेषज्ञों का एक बहुविषयक मेडिकल बोर्ड गठित करने का आदेश दिया। इस बोर्ड में फॉरेंसिक मेडिसिन के वरिष्ठ प्रोफेसर, फॉरेंसिक पैथोलॉजिस्ट, रेडियोलॉजिस्ट, स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ और फॉरेंसिक साइंस एक्सपर्ट शामिल होंगे। अदालत ने स्पष्ट किया कि शव का सम्मान बनाए रखने के लिए पुदुक्कोट्टई के सरकारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल के शवगृह में रखे शरीर का दोबारा पोस्टमार्टम और नमूने एकत्र करने के तुरंत बाद शव परिजनों को सौंप दिया जाए। इसके लिए मेडिकल बोर्ड की अंतिम रिपोर्ट का इंतजार नहीं किया जाएगा।

इसके साथ ही हाईकोर्ट ने स्थानीय पुलिस से जांच छीनकर क्राइम ब्रांच-क्रिमिनल इन्वेस्टिगेशन डिपार्टमेंट (सीबी-सीआईडी) या किसी अन्य विशेष इकाई के पुलिस अधीक्षक (एसपी) या उससे ऊपर के रैंक के अधिकारी के नेतृत्व वाली विशेष जांच टीम (एसआईटी) को सौंप दी है। एसआईटी महिला के मोबाइल, लैपटॉप, जेवर, डायरी और शादी के सामान को कब्जे में लेगी। साथ ही सीसीटीवी फुटेज, अंतिम फोन कॉल, गर्भावस्था के चिकित्सा रिकॉर्ड और कमरे को बाहर से बंद किए जाने के आरोपों की गहन जांच करेगी।

दहेज उत्पीड़न के आरोप और फॉरेंसिक रिपोर्ट में अंतर

यह आदेश मृतक महिला की मां द्वारा दायर रिट याचिका पर आया है। याचिका में आरोप लगाया गया था कि शादी के बाद से ही 5.5 सवरेन अतिरिक्त सोने के आभूषणों के लिए उनकी बेटी को प्रताड़ित किया जा रहा था। इस वर्ष 25 जनवरी को हुई शादी के पांच महीने से भी कम समय में, 17 जून को महिला अपने ससुराल में फंदे से लटकी पाई गई थी। परिजनों का दावा है कि वह उस समय लगभग चार महीने की गर्भवती थी।

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परिजनों द्वारा पहली पोस्टमार्टम रिपोर्ट को खारिज किए जाने के बाद, तिरुचिरापल्ली स्थित केएपी विश्वनाथन सरकारी मेडिकल कॉलेज की फॉरेंसिक विशेषज्ञ डॉ. एस अंगायारकन्नी से इसका स्वतंत्र निरीक्षण कराया गया। लिखित रिपोर्ट और पोस्टमार्टम प्रक्रिया के 101 वीडियो क्लिप का अध्ययन करने पर विशेषज्ञ ने दोनों में कई अंतर पाए। इनमें पोस्टमार्टम के समय, कपड़ों की जांच, गर्दन की चीर-फाड़, फांसी के निशान के दस्तावेज, खोपड़ी की संरचना, जैविक नमूनों के संरक्षण और गर्भावस्था से जुड़े निष्कर्षों में भारी भिन्नता देखी गई।

वैज्ञानिक जांच पर अदालत की टिप्पणी

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अदालत ने अपने आदेश में कहा कि संदिग्ध मौत के मामलों में इंसान का शरीर ही पहला और सबसे सच्चा गवाह होता है। शव परीक्षा कोई प्रशासनिक औपचारिकता नहीं बल्कि न्याय की सेवा में विज्ञान को लाने की एक गंभीर कानूनी प्रक्रिया है। पीठ ने कहा कि अदालत का काम दो पक्षों के बयानों में से किसी एक को चुनना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि सच की खोज कानूनी और वैज्ञानिक रूप से विश्वसनीय रहे।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह आदेश किसी डॉक्टर की बदनीयती या सबूत मिटाने के पूर्व-अनुमान पर आधारित नहीं है। तात्कालिक आवश्यकता सिर्फ इतनी है कि वैज्ञानिक माध्यमों और न्यायिक देखरेख में निष्पक्षता से सच को सामने लाया जा सके।

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