सुप्रीम कोर्ट ने कॉर्पोरेट दिवाला प्रक्रिया (CIRP) शुरू करने के नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) और नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) के आदेशों को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्ट्सी कोड (IBC) की धारा 7 के तहत आवेदन करने की समय सीमा (Limitation Period) उस तारीख से गिनी जाएगी जब खाते को गैर-निष्पादित संपत्ति (NPA) घोषित किया गया था।
जस्टिस पमिदिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि अंतरिम समाधान पेशेवर (IRP) या समाधान पेशेवर (RP) द्वारा कर्ज के दावे को स्वीकार करना केवल एक “प्रशासकीय कार्य” (Administrative Function) है। इसे सीमा अधिनियम (Limitation Act), 1963 की धारा 18 के तहत देनदारी की स्वीकृति (Acknowledgment) नहीं माना जा सकता।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद दीवान हाउसिंग फाइनेंस कॉर्पोरेशन लिमिटेड (DHFL) द्वारा 2014 में श्रीनाथजी बिजनेस वेंचर्स प्राइवेट लिमिटेड और सामरिया बिजनेस वेंचर्स प्राइवेट लिमिटेड (कॉर्पोरेट देनदार) को दिए गए ऋण से शुरू हुआ था। पुनर्भुगतान में चूक के कारण, DHFL ने 6 दिसंबर, 2016 को इन खातों को NPA घोषित कर दिया। बाद में, जब DHFL खुद दिवाला प्रक्रिया से गुजरी और उसके ऋण ओंकारा एसेट रिकंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड (वित्तीय लेनदार) को सौंप दिए गए, तो लेनदार ने 23 सितंबर, 2024 को कॉर्पोरेट देनदारों के खिलाफ धारा 7 के तहत आवेदन दायर किया।
NCLT और NCLAT ने इस आवेदन को समय सीमा के भीतर माना था। उनका तर्क था कि एक पिछली दिवाला प्रक्रिया (जो बाद में रद्द हो गई थी) के दौरान 22 मई, 2022 को IRP द्वारा दावे को स्वीकार किया जाना कर्ज की वैध स्वीकृति थी, जिससे समय सीमा बढ़ गई थी।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता के वरिष्ठ वकील: अपीलकर्ता शंकर खंडेलवाल की ओर से दलील दी गई कि तीन साल की समय सीमा 6 दिसंबर, 2016 (NPA की तारीख) से शुरू हुई और वैधानिक छूटों के बाद भी 2024 के मध्य तक समाप्त हो गई थी। उन्होंने तर्क दिया कि IRP द्वारा दावों का मिलान करना कोड की धारा 18 के तहत केवल एक लिपिकीय (Clerical) कार्य है और यह किसी समय-बाधित कर्ज को पुनर्जीवित नहीं कर सकता।
प्रतिवादी के वरिष्ठ वकील: प्रतिवादियों का तर्क था कि समय सीमा केवल SARFAESI अधिनियम के तहत नोटिस की अवधि समाप्त होने के बाद शुरू होनी चाहिए। उन्होंने कोविड-19 महामारी के दौरान सुप्रीम कोर्ट द्वारा दी गई समय सीमा विस्तार और 2022 में IRP द्वारा कर्ज की स्वीकृति का हवाला देते हुए याचिका को सही समय पर बताया।
कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियाँ
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में तीन प्रमुख कानूनी बिंदुओं पर विचार किया:
1. समय सीमा का निर्धारण: कोर्ट ने पुष्टि की कि धारा 7 के आवेदनों पर सीमा अधिनियम का अनुच्छेद 137 लागू होता है और आवेदन करने का अधिकार डिफॉल्ट की तारीख से उत्पन्न होता है।
“समय सीमा खाते को NPA के रूप में वर्गीकृत करने की तारीख से चलना शुरू होती है, जो कि डिफॉल्ट की तारीख है, न कि वसूली के लिए शुरू की गई किसी बाद की कार्यवाही से।”
तदनुसार, इस मामले में समय सीमा 6 दिसंबर, 2016 से शुरू हुई।
2. समय की गणना: कोर्ट ने नोट किया कि DHFL की दिवाला प्रक्रिया (कोड की धारा 60(6) के तहत) और कोविड-19 विस्तार की अवधि को घटाने के बाद भी, 29 जुलाई, 2024 तक केवल तीन दिन शेष थे। इसलिए, समय सीमा 1 अगस्त, 2024 को समाप्त हो गई थी, जिससे 23 सितंबर की फाइलिंग “समय सीमा के काफी बाहर” थी।
3. IRP द्वारा दावे की स्वीकृति की स्थिति: कोर्ट ने RP के प्रशासनिक कर्तव्यों और कानून के तहत ‘अक्नॉलेजमेंट’ के बीच स्पष्ट अंतर बताया। स्विस रिबन्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम भारत संघ का हवाला देते हुए पीठ ने कहा:
“RP कोड की धारा 18 के तहत अपने प्रशासनिक कर्तव्यों का पालन करता है। RP द्वारा दावे को स्वीकार करना केवल एक प्रशासनिक/लिपिकीय कार्य है… इसलिए, RP द्वारा दावे की स्वीकृति का मतलब केवल दावे की एंट्री करना है। यह सीमा अधिनियम की धारा 18 के तहत पावती (Acknowledgment) के समान नहीं है।”
कोर्ट ने यह भी जोर दिया कि धारा 18 के तहत पावती केवल उसी समय सीमा को बढ़ा सकती है जो पहले से समाप्त न हुई हो।
निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि IRP द्वारा दावे की स्वीकृति से लेनदार को कोई कानूनी लाभ नहीं मिला क्योंकि यह समय सीमा समाप्त होने के बाद हुई थी। याचिका को समय-बाधित पाते हुए, कोर्ट ने अपीलों को स्वीकार कर लिया और NCLAT (15 अक्टूबर, 2025) व NCLT (22 जनवरी, 2025) के आदेशों को रद्द कर दिया।
मामले का विवरण:
- केस का शीर्षक: शंकर खंडेलवाल बनाम ओंकारा एसेट रिकंस्ट्रक्शन प्रा. लि. एवं अन्य
- केस संख्या: सिविल अपील संख्या 13158-13159 / 2025
- पीठ: जस्टिस पमिदिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे
- तारीख: 29 अप्रैल, 2026

