लंबित सिविल मुकदमे के दौरान कोर्ट की पूर्व अनुमति के बिना किया गया कोई भी मध्यस्थता निर्णय (आर्बिट्रेशन अवार्ड) कानूनी रूप से निष्प्रभावी होता है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि आर्बिट्रेशन अधिनियम, 1940 की धारा 21 के तहत अदालत की मंजूरी के बिना दिए गए ऐसे निर्णय को मुकदमे में तब तक बाधा नहीं माना जा सकता, जब तक कि अधिनियम की धारा 47 के परंतुक (प्रोविजो) के तहत सभी संबंधित पक्षों की बाद की सहमति (पोस्ट-अवार्ड कंसेंट) न मिल जाए। जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकार की पीठ ने यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए अपीलकर्ताओं (वादियों) की अपील को स्वीकार कर लिया। इसके साथ ही कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट और ग्वालियर की ट्रायल कोर्ट के उन फैसलों को खारिज कर दिया, जिनमें कब्जे और मेसने प्रॉफिट (मध्यवर्ती लाभ) के लिए वर्ष 1982 से लंबित मुकदमे को केवल इसलिए खारिज कर दिया गया था क्योंकि मध्यस्थता निर्णय को अंतिम मान लिया गया था।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद सराफा बाजार, लश्कर, ग्वालियर में स्थित नगर पालिका संख्या 03/10 (पुराना) वाली एक तीन मंजिला व्यावसायिक-सह-आवासीय इमारत से जुड़ा है। यह संपत्ति मूल रूप से 24 जुलाई, 1941 को पंडित कृष्ण बिहारीलाल को बेची गई थी, जिन्होंने बाद में 19 अक्टूबर, 1948 को बाबूराव सूर्यवंशी के पास इसे गिरवी रख दिया था। कृष्ण बिहारीलाल द्वारा ऋण न चुका पाने पर, निष्पादन मामला संख्या 29/56-1963 के तहत इस संपत्ति की अदालती नीलामी की गई। 7 अप्रैल, 1964 को हरिदास (मूल वादी) इस नीलामी में सबसे ऊंची बोली लगाने वाले सफल खरीदार के रूप में उभरे। इस नीलामी की पुष्टि 16 अगस्त, 1973 को हुई और 30 अगस्त, 1973 को सेल सर्टिफिकेट जारी किया गया। इसके बाद 22 सितंबर, 1973 को हरिदास को संपत्ति का प्रतीकात्मक कब्जा (सिम्बॉलिक पजेशन) सौंप दिया गया।
चूंकि इमारत में कई किराएदार रह रहे थे, इसलिए हरिदास ने उनके खिलाफ बेदखली की कई कार्रवाइयां शुरू कीं। इसी तरह की एक कार्यवाही (बेदखली मुकदमा संख्या 274/1975) के दौरान यह बात सामने आई कि प्रतिवादी संख्या 1 ने भूतल के पिछले हिस्से में स्थित दो कमरों, दो हॉल और एक आंगन पर जबरन कब्जा कर लिया था, जो कि किराएदारों के कब्जे में था। जुलाई 1981 में हुई मारपीट की घटना के बाद, जिसके संबंध में आपराधिक शिकायत दर्ज की गई थी, हरिदास ने शारीरिक कब्जे और मेसने प्रॉफिट की वसूली के लिए सिविल सूट संख्या 3ए/1982 (बाद में नया नंबर सीएस 34ए/2010) दायर किया।
इस 1982 के मुकदमे के लंबित रहने के दौरान ही, दोनों पक्षों ने 28 फरवरी, 10 मार्च और 1 अगस्त 1983 के सहमति पत्रों के माध्यम से अपने विवाद को मध्यस्थता (आर्बिट्रेशन) के लिए भेज दिया। इसके परिणामस्वरूप 15 सितंबर, 1983 को एक मध्यस्थता निर्णय (अवार्ड) आया, जिसमें प्रतिवादियों को हरिदास को 2,75,000 रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया गया था, जिसके बदले में हरिदास को प्रतिवादियों के नाम पर सेल डीड निष्पादित करनी थी।
इसके बाद, 23 दिसंबर, 1983 को प्रतिवादियों ने ट्रायल कोर्ट के समक्ष 1984 का मामला संख्या 43ए दायर किया और मांग की कि इस मध्यस्थता निर्णय को “कोर्ट का नियम” (रूल ऑफ द कोर्ट) बनाया जाए और इसके आधार पर डिक्री पारित की जाए। प्रतिवादियों ने 1982 के सिविल सूट को रोकने की मांग भी की। ट्रायल कोर्ट ने 1990 में 1982 के मुकदमे की कार्यवाही को 1984 के मामले के निपटारे तक रोक दिया। हालांकि, हाईकोर्ट ने 1991 की सिविल रिवीजन संख्या 43 में 24 फरवरी, 1992 को निर्देश दिया कि यदि वादी 1984 की कार्यवाही में धारा 30(सी) के तहत अपनी आपत्तियों में विफल रहते हैं, तो वे 1982 के मुकदमे में धारा 47 के परंतुक के तहत आपत्ति उठाने के लिए स्वतंत्र होंगे।
ट्रायल कोर्ट ने 2 अगस्त, 2000 को मध्यस्थता निर्णय को कोर्ट का नियम बना दिया। हाईकोर्ट ने 5 अप्रैल, 2006 को वादियों की विविध अपील संख्या 674/2000 को खारिज करते हुए दोहराया कि वादी 1982 के लंबित मुकदमे में धारा 47 के परंतुक के तहत नए सिरे से अपनी आपत्ति उठाने के लिए स्वतंत्र हैं। इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई स्पेशल लीव पिटीशन (एसएलपी) भी 14 अगस्त, 2006 को खारिज हो गई।
इसके बाद, ट्रायल कोर्ट ने वादियों को अपने वाद-पत्र (प्लेंट) में पैराग्राफ 8(ए) जोड़ने की अनुमति दी ताकि वे मध्यस्थता निर्णय के खिलाफ आपत्तियां उठा सकें। साथ ही पैराग्राफ 8(बी) के तहत 3 नवंबर, 2009 की सेल डीड को शामिल करने की अनुमति दी गई, जो निष्पादन कार्यवाही के दबाव में की गई थी लेकिन स्पष्ट रूप से 1982 के मुकदमे के अंतिम परिणाम के अधीन थी। हालांकि, 22 जुलाई, 2010 को ट्रायल कोर्ट ने इस आधार पर 1982 के मुकदमे को खारिज कर दिया कि मध्यस्थता की कार्यवाही वैध थी और दोनों मुकदमों की विषय वस्तु अलग-अलग थी, जबकि कोर्ट ने यह माना था कि वादी ने संपत्ति को नीलामी में वैध रूप से खरीदा था और प्रतीकात्मक कब्जा प्राप्त किया था। हाईकोर्ट ने 30 जनवरी, 2025 को इस फैसले की पुष्टि की।
पक्षकारों की दलीलें
अपीलकर्ताओं (वादियों) का तर्क था कि आर्बिट्रेशन अधिनियम, 1940 मध्यस्थता की तीन परस्पर अनन्य श्रेणियों की परिकल्पना करता है: अध्याय II (अदालत के हस्तक्षेप के बिना मध्यस्थता), अध्याय III (अदालत के हस्तक्षेप के साथ मध्यस्थता जहां कोई मुकदमा लंबित नहीं है), और अध्याय IV (लंबित मुकदमों में मध्यस्थता)। उन्होंने दलील दी कि चूंकि विवाद को मध्यस्थता के लिए भेजते समय 1982 का सिविल सूट लंबित था, इसलिए यह मामला पूरी तरह से अध्याय IV के तहत आता था, जिसके लिए धारा 21 के तहत अदालत से संदर्भ (रेफरेंस) का आदेश प्राप्त करना अनिवार्य था—जिसका अनुपालन कभी नहीं किया गया।
उन्होंने आगे तर्क दिया कि प्रतिवादियों को मध्यस्थता निर्णय पारित होने से पहले ही मुकदमे के लंबित होने की पूरी जानकारी थी। इसके अलावा, दोनों विवादों की विषय वस्तु पूरी तरह से समान थी और मध्यस्थता निर्णय को केवल धारा 47 के परंतुक के तहत ही स्वीकार किया जा सकता था, जिसके लिए निर्णय के बाद सभी पक्षों की सहमति (पोस्ट-अवार्ड कंसेंट) आवश्यक होती है ताकि इसे सीपीसी के आदेश XXIII नियम 3 के तहत समझौता माना जा सके। चूंकि वादियों ने शुरू से ही इस निर्णय का विरोध किया था, इसलिए ऐसी सहमति का पूरी तरह से अभाव था।
दूसरी ओर, प्रतिवादियों ने दलील दी कि 1940 के अधिनियम की धारा 21 इस मामले में लागू नहीं होती क्योंकि उन्हें मध्यस्थता के लिए मामला भेजते समय 1982 के मुकदमे की जानकारी नहीं थी, और उन्हें 21 सितंबर, 1983 तक समन भी तामील नहीं हुआ था। उन्होंने यह भी दावा किया कि मध्यस्थता के पक्षकार और 1982 के मुकदमे के पक्षकार अलग-अलग थे। इसके अलावा, उनका कहना था कि वादी बार-बार अवसर मिलने के बावजूद धारा 47 के परंतुक के तहत औपचारिक आवेदन दायर करने में विफल रहे और मध्यस्थता निर्णय पहले ही अंतिम रूप ले चुका था।
कोर्ट का विश्लेषण और निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट ने आर्बिट्रेशन अधिनियम, 1940 की वैधानिक योजना का गहन विश्लेषण किया और कई महत्वपूर्ण कानूनी सवालों का निपटारा किया:
1. विषय वस्तु की पहचान
कोर्ट ने प्रतिवादियों के इस दावे को पूरी तरह से खारिज कर दिया कि 1982 के मुकदमे और मध्यस्थता की कार्यवाही की विषय वस्तु अलग-अलग थी। वाद-पत्र (प्लेंट), 1973 के अदालती नीलामी प्रमाण पत्र और 1984 की कार्यवाही के विवरणों का विश्लेषण करने के बाद, कोर्ट ने माना कि दोनों विवाद स्पष्ट रूप से एक ही संपत्ति से संबंधित थे। कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि ट्रायल कोर्ट ने खुद 1990 में 1982 के मुकदमे को केवल इसलिए स्थगित किया था क्योंकि दोनों मामलों की विषय वस्तु बिल्कुल समान थी।
2. लंबित मुकदमे की जानकारी और धारा 21 का महत्व
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 21 को लागू करने के लिए मुकदमे के लंबित होने की ‘जानकारी’ होना कोई आवश्यक शर्त नहीं है, बल्कि मुकदमे का लंबित होना ही एकमात्र निर्णायक कारक है। अधिनियम की धारा 20 और 21 के बीच अंतर स्पष्ट करते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की: “इस प्रकार, धारा 20 और 21 अलग-अलग लेकिन एक-दूसरे के पूरक क्षेत्रों में काम करती हैं, जो मिलकर अदालत के हस्तक्षेप से होने वाली मध्यस्थता को नियंत्रित करने वाली एक संपूर्ण संहिता बनाती हैं, जो इस बात पर निर्भर करता है कि मुकदमा लंबित है या नहीं। इन प्रावधानों को संदर्भ के साथ पढ़ने से यह स्पष्ट होता है कि विधायिका ने मुकदमे के लंबित होने की ‘जानकारी’ को एक प्रासंगिक या निर्णायक विचार नहीं माना है। इसके बजाय, वैधानिक योजना मुकदमे की ‘संस्था’ या उसके ‘लंबित’ होने को ही एक निर्णायक कारक बनाती है।”
कोर्ट ने यह भी माना कि यदि जानकारी की आवश्यकता को मान भी लिया जाए, तो भी प्रतिवादियों को 6 अगस्त, 1983 को समन तामील हो चुका था, जबकि मध्यस्थता निर्णय 15 सितंबर, 1983 को पारित किया गया था। इस प्रकार, उनके पास धारा 21 के तहत ट्रायल कोर्ट से संपर्क करने का पूरा अवसर था, जिसका उन्होंने उपयोग नहीं किया।
3. 1940 के अधिनियम के अध्यायों का परस्पर अनन्य होना
कोर्ट ने जोर देकर कहा कि 1940 के अधिनियम के तहत मध्यस्थता के तीनों तरीके पूरी तरह से परस्पर अनन्य हैं: “इस त्रि-आयामी योजना का महत्व इस तथ्य में निहित है कि ये तीनों अध्याय परस्पर अनन्य (म्युचुअली एक्सक्लूसिव) हैं। इसलिए, मध्यस्थता के लिए मामला भेजना, प्रत्येक मामले के तथ्यों के आधार पर, अनिवार्य रूप से इन अध्यायों में से केवल एक ही अध्याय के अंतर्गत आना चाहिए, और लागू होने वाले अध्याय की प्रक्रियात्मक आवश्यकताओं को नजरअंदाज या दरकिनार नहीं किया जा सकता है।”
चूंकि मुकदमा लंबित था, इसलिए मामले को केवल ट्रायल कोर्ट के समक्ष धारा 21 के तहत आवेदन देकर अध्याय IV के माध्यम से ही भेजा जा सकता था। कोर्ट ने आगे जोड़ा: “…जैसे ही पक्षों को निर्णय सुनाए जाने से पहले मुकदमे के लंबित होने की जानकारी मिलती है, वैसे ही 1940 के अधिनियम की धारा 21 और अध्याय IV का अनुपालन अनिवार्य हो जाता है। इसके विपरीत राय रखने का अर्थ 1940 के अधिनियम के पीछे के विधायी इरादे को कमजोर करना होगा।”
4. धारा 47 के परंतुक (प्रोविजो) की व्याख्या
कोर्ट ने इस कानूनी बिंदु पर विचार किया कि क्या अधिनियम के दायरे से बाहर (“अन्यथा प्राप्त”) किए गए मध्यस्थता निर्णय को सभी पक्षों की सहमति के बिना लागू किया जा सकता है। कोर्ट ने नारायणदास बनाम वल्लभदास और अन्य (1971), मद्रास हाईकोर्ट की पूर्ण पीठ के फैसले अब्दुल रहमान साहिब बनाम मोहम्मद सिद्दीक (1953), और गुजरात हाईकोर्ट के फैसले मालपति सेवासंघ बनाम गुजरात राज्य खादी (2003) का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया कि निर्णय के बाद की सहमति (पोस्ट-अवार्ड कंसेंट) एक अनिवार्य आवश्यकता है।
इस परंतुक के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की: “धारा 47 के परंतुक (प्रोविजो) को एक संतुलित विधायी तंत्र के रूप में समझा जाना चाहिए, जो निर्धारित शर्तों के अधीन, एक ऐसे निर्णय को बचाने का प्रयास करता है जो अन्यथा कानून की नजर में अप्रवर्तनीय (नॉन-इनफोर्सिएबल) या अमान्य हो जाता।”
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस प्रकार के मध्यस्थता निर्णय को केवल समझौते के रूप में ही मान्यता दी जा सकती है, किसी स्वतंत्र निर्णय के रूप में नहीं: “यह निर्णय के बाद की सहमति ही है जो अन्यथा अप्रवर्तनीय मध्यस्थता निर्णय को कानून की नजर में प्रवर्तनीयता का एकमात्र आधार देती है। इसके बाद भी, इसे मध्यस्थता निर्णय के रूप में नहीं, बल्कि एक समझौते (कॉम्प्रोमाइज) के रूप में ही लागू किया जाता है।”
चूंकि वादियों ने मुकदमे के दौरान लगातार इस मध्यस्थता निर्णय का विरोध किया था, इसलिए कोर्ट ने माना कि निर्णय के बाद की सहमति की अनिवार्य आवश्यकता यहां पूरी तरह से गायब थी, और इस निर्णय को बचाव के रूप में पेश नहीं किया जा सकता था।
5. मध्यस्थता निर्णय की अंतिमता और आपत्ति जताने की स्वतंत्रता
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि हाईकोर्ट ने मध्यस्थता निर्णय को अंतिम मानकर 1982 के मुकदमे को खारिज करने में गंभीर कानूनी भूल की। कोर्ट ने ध्यान दिलाया कि हाईकोर्ट के खुद के 1992 और 2006 के आदेशों ने स्पष्ट रूप से वादियों को 1982 के मुकदमे के निपटारे के दौरान धारा 47 के परंतुक के तहत अपनी आपत्तियां नए सिरे से उठाने की स्वतंत्रता दी थी। इसलिए, अदालतें मध्यस्थता निर्णय को अंतिम मानकर उन आपत्तियों को खारिज नहीं कर सकती थीं।
कोर्ट का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि एक बार जब “मध्यस्थता निर्णय का ग्रहण” हट जाता है, तो वादियों का मुकदमा डिक्री होने का पात्र बन जाता है। कोर्ट ने उल्लेख किया कि ट्रायल कोर्ट ने पहले ही वादियों के पक्ष में तथ्य स्थापित कर दिए थे कि हरिदास ने 1963 में अदालती नीलामी में विवादित संपत्ति को वैध रूप से खरीदा था और 1973 में इसका प्रतीकात्मक कब्जा प्राप्त किया था। एस. नजीर अहमद बनाम स्टेट बैंक ऑफ मैसूर (2007) और सौरव जैन बनाम ए.बी.पी. डिजाइन (2022) का हवाला देते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अपील का प्रतिवादी बिना क्रॉस-ऑब्जेक्शन दायर किए भी ट्रायल कोर्ट के प्रतिकूल निष्कर्षों को चुनौती देकर डिक्री का समर्थन कर सकता है, लेकिन प्रतिवादी ट्रायल कोर्ट के वादियों के पक्ष वाले निष्कर्षों को चुनौती देने में विफल रहे।
तदनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए निम्नलिखित निर्देश दिए:
- हाईकोर्ट के 30 जनवरी, 2025 के फैसले और ट्रायल कोर्ट की 22 जुलाई, 2010 की डिक्री को खारिज किया जाता है।
- विवादित संपत्ति पर वादियों के मालिकाना हक को स्थापित करने वाले ट्रायल कोर्ट के निष्कर्षों की पुष्टि की जाती है।
- 15 सितंबर, 1983 के मध्यस्थता निर्णय को वादियों के खिलाफ कानूनी रूप से अप्रवर्तनीय (नॉन-इनफोर्सिएबल) घोषित किया जाता है।
- 3 नवंबर, 2009 की सेल डीड को, जो 1982 के मुकदमे के अंतिम परिणाम के अधीन निष्पादित की गई थी, वादियों पर बाध्यकारी नहीं माना जाएगा।
- वादियों के पक्ष में विवादित संपत्ति का खाली और शांतिपूर्ण कब्जा सौंपने की डिक्री पारित की जाती है। प्रतिवादी अगले दो महीनों के भीतर वादियों को कब्जा सौंपेंगे।
- मेसने प्रॉफिट (मध्यवर्ती लाभ) के निर्धारण के लिए मामले को सीमित जांच के लिए ट्रायल कोर्ट में वापस भेजा जाता है, जिसे नौ महीनों के भीतर पूरा करना होगा।
- प्रतिवादियों को निर्देश दिया जाता है कि वे मुकदमे के खर्च के रूप में 1,00,000 रुपये (एक लाख रुपये) चार सप्ताह के भीतर सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री में जमा करें, जो वादियों को हस्तांतरित किए जाएंगे।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: अशोक और अन्य बनाम पदम चंद और अन्य
वाद संख्या: एसएलपी (सिविल) संख्या 18146/2025
पीठ: जस्टिस जे.के. माहेश्वरी, जस्टिस अतुल एस. चांदुरकार
निर्णय की तिथि: 29 मई, 2026

