धार जिले के ऐतिहासिक भोजशाला-कमल मौला मस्जिद परिसर को लेकर चल रही कानूनी लड़ाई बुधवार को उस समय और तेज हो गई, जब मुस्लिम पक्ष ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट को सूचित किया कि यह स्थल सरकारी राजस्व रिकॉर्ड में आधिकारिक तौर पर ‘मस्जिद’ के रूप में पंजीकृत है। सूफी संत मौलाना कमालुद्दीन चिश्ती के वंशज का प्रतिनिधित्व कर रहे कानूनी सलाहकार ने तर्क दिया कि उपलब्ध ऐतिहासिक दस्तावेज या स्रोत राजा भोज द्वारा इस स्थान पर किसी सरस्वती मंदिर की स्थापना का स्पष्ट उल्लेख नहीं करते हैं।
मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित यह विवादित स्मारक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के अधीन एक संरक्षित स्थल है। जहाँ हिंदू समुदाय इस संरचना को देवी सरस्वती को समर्पित ‘भोजशाला’ मंदिर मानता है, वहीं मुस्लिम पक्ष का दावा है कि यह 11वीं शताब्दी की ‘कमल मौला मस्जिद’ है।
यह मामला तब हाईकोर्ट पहुँचा जब ‘हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस’ और अन्य व्यक्तियों द्वारा जनहित याचिकाएं (PIL) दायर की गईं। इन याचिकाओं में मांग की गई है कि इस संरचना के मंदिर होने के आधार पर हिंदुओं को यहाँ पूजा-अर्चना का अनन्य अधिकार दिया जाए।
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच के जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी के समक्ष सुनवाई के दौरान, अधिवक्ता नूर अहमद शेख ने काजी मोइनुद्दीन की ओर से पक्ष रखा। मोइनुद्दीन, जो खुद को सूफी संत मौलाना कमालुद्दीन चिश्ती का वंशज और इस स्थल का ‘सज्जादानशीं’ (आध्यात्मिक प्रमुख) बताते हैं, ने हिंदू संगठनों द्वारा दायर याचिकाओं को चुनौती दी है।
अधिवक्ता शेख ने अदालत में दलील दी कि इस परिसर को ऐतिहासिक और प्रशासनिक रूप से मस्जिद के रूप में ही माना गया है। अदालत में उठाए गए मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
- राजस्व रिकॉर्ड: वकील ने तर्क दिया कि सरकार के राजस्व रिकॉर्ड स्पष्ट रूप से विवादित परिसर को “मस्जिद” के रूप में दर्शाते हैं।
- ऐतिहासिक दस्तावेज: मुस्लिम पक्ष ने दावा किया कि उपलब्ध ऐतिहासिक स्रोतों में ऐसा कोई पुख्ता प्रमाण नहीं है कि 11वीं शताब्दी के राजा भोज ने यहाँ सरस्वती मंदिर बनवाया था।
- वंशानुगत उपाधियाँ: यह भी दावा किया गया कि मोइनुद्दीन के पूर्वजों के पास ऐतिहासिक रूप से इस परिसर के मालिकाना हक रहे हैं, जो मुस्लिम समुदाय के लिए इसके धार्मिक महत्व और पहचान की पुष्टि करते हैं।
इसके विपरीत, हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस और कुलदीप तिवारी जैसे याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह स्थल मूल रूप से एक सरस्वती मंदिर है। उन्होंने अदालत से आग्रह किया है कि हिंदुओं को परिसर के भीतर पूजा करने का एकमात्र अधिकार दिया जाए, क्योंकि यह राजा भोज द्वारा स्थापित एक प्राचीन शैक्षणिक और धार्मिक केंद्र था।
हाईकोर्ट फिलहाल स्मारक की कानूनी स्थिति निर्धारित करने के लिए ऐतिहासिक पहचान और प्रशासनिक रिकॉर्ड के इन विरोधाभासी दावों पर विचार कर रहा है।

